यह सुंदरकाण्ड का चौथा सर्ग है, जिसमें वाल्मीकि रामायण की दिव्य कथा आगे बढ़ती है। पराक्रमी और महाप्रतापी हनुमान, जो वानरों में श्रेष्ठ हैं, अपने अद्भुत साहस से लंका नगरी और उसकी मायावी रक्षिका को पराजित कर चुके थे। रात्रि के समय, महान आत्मा हनुमान, जो वानर और गज के समान बलशाली थे, नगर के द्वार का उपयोग किए बिना, दीवार फांद कर लंका में प्रविष्ट हुए। वानरराज सुग्रीव के हित के लिए नगर में प्रवेश करते ही, उन्होंने अपने शत्रुओं के सिरों पर अपना बायां पांव रख दिया, जैसे विजयी वीर अपने विरोधियों को रौंदता है। इसके बाद हनुमान उस अद्भुत और सुंदर लंका नगरी के निकट पहुँचे, जहाँ हँसी-ठिठोली की गूंज और ऊँचे स्वर में बजते वाद्ययंत्रों की ध्वनि गूँज रही थी। लंका की भव्यता देखते ही बनती थी—मकानों में वज्र के समान मजबूत झरोखे, हीरे की जालियों से सजे हुए भवन, जो आकाश में बादलों की तरह लग रहे थे। राक्षसों के दिव्य भवनों से सुसज्जित लंका उस समय बादलों के समान श्वेत, कमल और स्वस्तिक की आकृतियों से अलंकृत, दिपदिपाती हुई प्रतीत हो रही थी। चारों ओर रंग-बिरंगे हारों और आभूषणों से सजी, बढ़ती हुई अट्टालिकाओं वाली वह पुरी, हनुमान के नेत्रों में बस गई। राघव के हित के लिए नगर में विचरते हुए, हनुमान ने एक-एक भवन को देखा और मन ही मन प्रसन्न हुए। एक स्थान से दूसरे स्थान जाते हुए, उन्होंने विविध आकार-प्रकार के महल देखे और वहाँ से तीनों स्वर-युक्त मधुर गीतों की ध्वनि सुनी। रति में मग्न स्त्रियों की करधनियों की झंकार और पायल की ध्वनि, मानो स्वर्ग की अप्सराएँ स्वयं रास रच रही हों, उनके कानों में पड़ी। उन्होंने महलों में महान आत्माओं के चरणों की आहट, तालियाँ, और सीटी की ध्वनियाँ भी सुनीं। राक्षसों के घरों में वेद-मंत्रों का उच्चारण सुनाई दिया, जहाँ रात्रि में विचरण करने वाले राक्षस अपने अध्ययन में लीन थे। एक स्थान पर हनुमान ने देखा—राक्षसों की विशाल सेना, जो गर्जना कर रही थी और रावण की जय-जयकार कर रही थी, राजपथ को भर रही थी। नगर के मध्य भाग में उन्होंने राक्षसों के अनेक गुप्तचरों को देखा—कोई जटा-जटाधारी, कोई मुंडित, कोई मृगचर्म पहने हुए। कुछ के हाथों में कुश की घास, कुछ के पास अग्निकुंड, कोई गदा-शूल, तो कोई दंड लिए हुए खड़े थे। वहाँ एक-आंख वाले, रंग-बिरंगे, मोटे-पेट वाले, विशाल-वक्षस्थल वाले, विकराल मुख वाले, राक्षसी रूप, बौने और विचित्र आकृतियों वाले भी उपस्थित थे। हनुमान ने धनुर्धारी, खड्गधारी, मूसल और लोहे की गदा वाले, विविध कवचों से सजे हुए योद्धाओं को देखा। वहाँ न तो बहुत मोटे, न बहुत दुबले, न बहुत लंबे, न बहुत छोटे, न बहुत गोरे, न बहुत काले, न कुबड़े, न बौने—ऐसे संतुलित रूप वाले राक्षस भी थे। उन्होंने सुंदर, विकृत, विविध रूपों वाले, ध्वजाओं और पताकाओं से सजे, नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से युक्त राक्षसों को देखा। कुछ के पास भाले, वृक्ष, शस्त्र, खड्ग, वज्र, फंदे और गोफन थीं। कई राक्षस हार, गंध, दिव्य आभूषणों से अलंकृत, रंग-बिरंगे वस्त्र धारण किए, अपने मन के अनुसार विचर रहे थे। अनेक तेज भाले और महान वज्रधारियों सहित, एक लाख सतर्क राक्षस, अपने कर्तव्य में अडिग, पहरा दे रहे थे। हनुमान ने देखा कि रावण के अंतःपुर के आगे, राक्षसराज द्वारा निर्दिष्ट भवन स्थित है। वह महल, जो पर्वत की चोटी पर निर्मित था, कमलमालाओं से सुसज्जित खाइयों से घिरा हुआ था। दिव्य स्वरूप वाला वह महल, ऊँची प्राचीरों से घिरा, स्वर्गीय संगीत से गूंजता, देवताओं के लोक के समान प्रतीत हो रहा था। वहाँ घोड़ों की हिनहिनाहट, आभूषणों की झंकार, रथों, विमानों, श्रेष्ठ घोड़ों और हाथियों की भीड़ थी। चार दांतों वाले विशाल, श्वेत बादलों जैसे हाथी, सुंदर द्वारों पर सजे-धजे खड़े थे; साथ ही मदमस्त पशु-पक्षी भी थे। हजारों बलशाली राक्षसों द्वारा संरक्षित, राक्षसराज की रक्षा में वह महल सुरक्षित था। हनुमान ने उस भवन में प्रवेश किया। रावण के अंतःपुर में वे प्रविष्ट हुए, जहाँ सोने और रत्नों की जाली, मोती और बहुमूल्य रत्नों से सुसज्जित द्वार, और अगरु-चंदन की दिव्य गंध फैली हुई थी। अब सुंदरकाण्ड का पाँचवाँ सर्ग आरंभ होता है। हनुमान ने आकाश में उज्ज्वल चंद्रमा को देखा, जो अपनी शीतल चाँदनी बिखेरता, बार-बार उदित और अस्त होता, मानो उन्मत्त वृषभ चरागाह में घूम रहा हो। वह शीतल किरणों वाला चंद्रमा, जो संसार के पापों का नाशक है, समुद्र को उद्वेलित करता है और समस्त प्राणियों को प्रकाशित करता है, हनुमान के समक्ष प्रकट था। जैसे लक्ष्मी पृथ्वी पर मंदार पर्वत पर, या सायंकाल समुद्र में, या जल में कमलों के मध्य शोभायमान होती है, वैसे ही आकाश में चंद्रमा भी शोभायमान था। वह चंद्रमा जैसे रजत पिंजरे में हंस, मंदार की गुफा में सिंह, या गर्वीले हाथी पर वीर शोभित होता है, वैसे ही आकाश में चमक रहा था। निर्मल, उज्ज्वल, ओस-रहित, पाले और बड़े ग्रहों की छाया से रहित, वह चंद्रमा अपनी अपूर्व आभा बिखेर रहा था। जैसे सिंह शिला पर, हाथी महान वन में, या राजा राज्य पाकर चमकता है, वैसे ही चंद्रमा आकाश में प्रकाशमान था। आकाश में फैली हुई वह दिव्य संध्या, चंद्रमा के उदय से अंधकार को दूर कर रही थी, राक्षसों और मांसाहारियों को हटाकर, राम के प्रेम में मग्न मन को शांति दे रही थी। वीणा आदि तार वाद्यों की मधुर ध्वनि गूंज रही थी, कुलीन स्त्रियाँ अपने पतियों के साथ सो रही थीं, और रात्रि में विचरने वाले, विचित्र व क्रूर आचरण वाले राक्षस अपने क्रीड़ा के लिए निकल पड़े थे। बुद्धिमान हनुमान ने देखा कि वहाँ के कुलों में मदिरा के कारण उन्माद और अव्यवस्था छाई थी, रथ, घोड़े, श्रेष्ठ आसनों की भीड़ थी, और वीरों की कीर्ति से वह नगरी ओतप्रोत थी। इस प्रकार, हनुमान ने लंका के वैभव, राक्षसों की विविधता, रावण के महल की दिव्यता और रात्रि के समय चंद्रमा की अनुपम छटा का साक्षात्कार किया। यहीं सुंदरकाण्ड के पाँचवें सर्ग का समापन होता है।