जब अग्नि के नेतृत्व में सभी देवताओं ने उस तेजस्वी बालक का दिव्य सेनाओं का सेनापति बनाकर अभिषेक किया, तब यह अद्भुत घटना घटी। इसके बाद महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम से गंगा की कथा और उस पुण्यशाली बालक के जन्म की सम्पूर्ण कथा विस्तार से कह सुनाई। उन्होंने कहा—"हे ककुत्स्थ, जो मनुष्य पृथ्वी पर श्रद्धाभाव से कार्तिकेय की उपासना करता है, वह पुत्र-पौत्र से सम्पन्न होकर स्कन्द के लोक को प्राप्त होता है।" इसी प्रकार बालकाण्ड के सैंतीसवें सर्ग का समापन होता है और अड़तीसवाँ सर्ग आरम्भ होता है। महर्षि विश्वामित्र ने रामचन्द्र जी को मधुर वाणी में कथा सुनाने के पश्चात आगे कहना आरम्भ किया, "हे महाबाहो! अयोध्या में एक प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा हुए, जिनका नाम सगर था। वे संतान की अभिलाषा रखते थे, परंतु निःसंतान थे। सगर की पहली रानी केशिनी, जो विदर्भराज की पुत्री थीं, सत्यनिष्ठा और पुण्यात्मा थीं। दूसरी रानी सुमति थीं, जो सुपर्ण की बहन और अरिष्टनेमि की कन्या थीं।" राजा सगर ने अपनी दोनों पत्नियों के साथ हिमालय पर्वत के भृगुप्रस्रवण शिखर पर जाकर कठोर तप किया। सौ वर्षों के बाद, सत्यप्रतिज्ञ महर्षि भृगु तपस्या से प्रसन्न हुए और सगर को वरदान दिया—"हे निष्पाप! तुम्हें महान संतति प्राप्त होगी और तुम्हारी कीर्ति संसार में अतुलनीय होगी। तुम्हारी एक पत्नी से एक पुत्र उत्पन्न होगा, जो वंश को आगे बढ़ाएगा, और दूसरी से साठ हजार पुत्र होंगे।" यह सुनकर दोनों रानियाँ हाथ जोड़कर महर्षि से बोलीं, "हे ब्राह्मण! हम जानना चाहती हैं कि किसे एक पुत्र और किसे अनेक पुत्र होंगे? कृपया स्पष्ट करें, आपकी वाणी सत्य हो।" महर्षि भृगु ने उत्तर दिया, "जैसी तुम दोनों की इच्छा हो, वैसा ही हो। एक को एक पुत्र और दूसरी को अनेक बलशाली, प्रसिद्ध एवं तेजस्वी पुत्र प्राप्त हों।" राजा सगर की उपस्थिति में केशिनी ने वंश को आगे बढ़ाने वाला एक पुत्र माँगा, और सुमति ने साठ हजार पुत्रों की इच्छा व्यक्त की। फिर दोनों रानियाँ महर्षि की परिक्रमा कर, प्रणाम कर, राजा के साथ अपने नगर लौट गईं। समय आने पर केशिनी से सगर को प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम असमञ्जस रखा गया। सुमति ने कुम्हड़े के आकार का एक गर्भ धारण किया, जिसे फाड़ने पर उसमें से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए। दाइयों ने उन्हें घी से भरे घड़ों में पाला, और समय आने पर वे सभी युवा, सुंदर और तेजस्वी हो गए। इस प्रकार राजा सगर के साठ हजार पुत्र हुए। सबसे बड़ा पुत्र असमञ्जस था, जो बालकों को पकड़कर सरयू नदी में फेंक देता और उनके डूबने पर हँसता था। उसके ऐसे पापपूर्ण आचरण से प्रजा व्याकुल हो उठी। अतः राजा सगर ने उसे नगर से निष्कासित कर दिया। असमञ्जस का पुत्र अंशुमान था, जो अत्यंत बलशाली, सबको प्रिय और बुद्धिमान था। राजा सगर ने एक बार महान यज्ञ करने का निश्चय किया और अपने पुरोहितों के साथ वेदविहित अनुष्ठान की तैयारी की। अब बालकाण्ड के उनचालीसवें सर्ग का आरम्भ होता है। विश्वामित्र की कथा सुनकर श्रीराम प्रसन्न हुए और बोले, "हे ब्रह्मर्षि! कृपा करके विस्तार से बताइए कि मेरे पूर्वज सगर ने वह यज्ञ किस प्रकार पूर्ण किया?" विश्वामित्र मुस्कराकर बोले, "हे राम! ध्यानपूर्वक सुनो। सगर के ससुर हिमवान थे। जब वे विंध्याचल पर्वत पहुँचे, तब दोनों पर्वतों के बीच वह महायज्ञ सम्पन्न हुआ। वह क्षेत्र यज्ञों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। वहीं, सगर के आदेशानुसार, धनुर्धर अंशुमान यज्ञ के अश्व की रक्षा कर रहे थे।" उसी समय, इन्द्र ने राक्षसी का रूप धारण कर यज्ञ के घोड़े को चुरा लिया। जब अश्व को ले जाया जा रहा था, सभी ऋत्विजों ने यजमान सगर से कहा, "यज्ञ का अश्व शीघ्रता से चुराया जा रहा है। हे ककुत्स्थ! चोर का वध कर घोड़े को वापस लाओ, अन्यथा यज्ञ में दोष उत्पन्न होगा और हम सबको अनिष्ट भोगना पड़ेगा।" इस प्रकार, महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को सगर, उनके वंश, उनकी संतानों और यज्ञ की कथा विस्तार से, क्रमबद्ध रूप से सुनाई।