यह कथा वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा काण्ड के सत्तावनवें और अठावनवें सर्ग की है। जब हनुमान, अंगद और वानर सेना के अन्य प्रमुख सदस्य सीता माता की खोज में असफल होकर अत्यंत दुखी एवं निराश हो गए, तब वे सभी उपवास करने के लिए बैठ गए। उस समय उन्होंने एक गिद्ध को देखा, जिसकी उपस्थिति से वे संदेह में पड़ गए और सोचने लगे कि कहीं यह हमें खा न जाए। उन्होंने निश्चय किया कि यदि उपवास करते समय यह गिद्ध हमें नहीं खाता, तो हमारा कार्य सिद्ध हो जाएगा और हम सफलता प्राप्त कर लेंगे। इस विचार के साथ अंगद पर्वत शिखर से उतरकर उस गिद्ध से बोले, “हे पक्षिराज! मेरे पूर्वज ऋक्षराज नामक बलशाली वानर राजा थे। उनके दो पुत्र थे—सुग्रीव और वालि। वालि मेरे पिता थे, जिनका यश संसार में प्रसिद्ध है। इक्ष्वाकु वंश के महान धनुर्धर श्रीराम, जो दशरथ के पुत्र हैं, अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ दंडक वन में आए। वहीं रावण ने जनस्थान से उनकी पत्नी सीता का अपहरण कर लिया। उस समय राम के पिता के मित्र, गिद्धराज जटायु, रावण से युद्ध करते हुए मारे गए। रावण ने उन्हें मार डाला, परंतु श्रीराम ने उनका सम्मान कर उन्हें परम गति दी। बाद में श्रीराम ने मेरे चाचा सुग्रीव से मित्रता की और उन्होंने ही मेरे पिता वालि का वध किया। पूर्व में वालि ने सुग्रीव को उनके मंत्रियों सहित बंदी बना लिया था। तब श्रीराम ने वालि का वध कर सुग्रीव को वानरों का राजा बना दिया। सुग्रीव ने हमें, वानर प्रमुखों को, सीता माता की खोज में भेजा। हम सब जगह खोजते रहे, किंतु सीता माता का पता नहीं चला, जैसे रात में सूर्य की किरणें नहीं दिखतीं। हमने दंडक वन को छान मारा, पर अनजाने में पृथ्वी के गर्भ में खुली एक गुफा में प्रवेश कर गए। वहीं राजा द्वारा निर्धारित एक मास का समय बीत गया। अब हम सब भयवश उपवास कर रहे हैं, क्योंकि हमने समय सीमा पार कर दी है। यदि काकुत्स्थ श्रीराम, सुग्रीव और लक्ष्मण हमसे क्रोधित हो गए, तो हमारे लिए जीवन की कोई आशा नहीं बचती।” वानरों के ये दुःखभरे वचन सुनकर, उस गिद्ध की आंखों में आंसू आ गए और उसका स्वर गूंज उठा। उसने कहा, “हे वानरों! मेरा छोटा भाई जटायु था, जिसे तुमने बताया कि रावण ने युद्ध में मार डाला। वृद्धावस्था और पंख झुलसने के कारण मैं असहाय हूं, अन्यथा अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध अवश्य लेता। बहुत समय पहले, जब वृत्रासुर का वध हुआ था, तब मैं और जटायु विजय की इच्छा से सूर्य की ओर उड़ चले। आकाश के मार्ग को तीव्र गति से पार करते हुए जब हम सूर्य के मध्य भाग तक पहुंचे, तो जटायु की शक्ति क्षीण होने लगी। मैंने स्नेहवश अपने पंखों से उसे ढंक लिया, जिससे मेरे पंख जल गए और मैं विंध्याचल पर्वत पर गिर पड़ा। तभी से मैं यहीं रह रहा हूं और जटायु की कोई खबर नहीं मिली।” संपाति की यह बात सुनकर अंगद ने पूछा, “यदि आपने जटायु के विषय में जो मैंने बताया, वह सुना है, तो यदि आपको ज्ञात हो तो कृपया हमें रावण का निवास स्थान बताइए।” अंगद के आग्रह पर जटायु के बड़े भाई संपाति ने, जो अब वृद्ध और निर्बल हो चुके थे, प्रसन्नता से कहा, “हे वानरों! मेरे पंख जल गए हैं, मेरी शक्ति क्षीण हो गई है, किंतु मैं वचन से श्रीराम की सहायता करूंगा। मैं वरुण के लोकों को जानता हूं, विष्णु के त्रिविक्रम रूप को जानता हूं, देवताओं और दैत्यों के युद्ध तथा समुद्र मंथन को भी जानता हूं। श्रीराम का जो भी कार्य है, उसे सबसे पहले मैं ही करूंगा, भले ही अब मुझमें बल नहीं रहा। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि एक सुंदर स्त्री, जो आभूषणों से सजी थी, दुष्ट रावण द्वारा आकाश मार्ग से ले जाई जा रही थी। वह बार-बार ‘राम! राम!’ और ‘लक्ष्मण!’ पुकार रही थी, अपने आभूषण गिराती जा रही थी और उसके अंग कांप रहे थे। उसका पीला रेशमी वस्त्र पर्वत शिखर पर सूर्य की किरणों की भांति उस काले राक्षस रावण पर चमक रहा था, जैसे मेघ पर बिजली चमकती है। मुझे विश्वास है कि वह सीता ही थी, क्योंकि उसने राम का नाम लिया था। ध्यान से सुनो, मैं उस राक्षस के निवास का वर्णन करता हूं—रावण, जो विश्वश्रवा का पुत्र और कुबेर का भाई है, लंका नगरी में रहता है।” इस प्रकार संपाति ने वानरों को सीता माता और रावण के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी दी, जिससे उनके मन में नई आशा का संचार हुआ।