अजेयत्वं धनेशत्वमवध्यत्वं च वै ददौ। एतान् लब्ध्वा वरान् काव्यः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।। ३५.
हर्षात् प्रादुर्बभौ तस्य देवस्तोत्रं महेश्वरम्। तदा तिर्यक्स्थितस्त्वेवं तुष्टुवे नीललोहितम् ।। ३५.
नमोऽस्तु शितिकण्ठाय सुरापाय सुवर्चसे। रिरिहाणाय लोपाय वत्सराय जगत्पते ।। ३५.
कपर्दिने ह्यूर्द्ध्वरोम्णे हयाय करणाय च। संस्कृताय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे ।। ३५.
उष्णीषिणे सुवक्राय सहस्राक्षाय मीढुषे। वसुरेताय रुद्राय तपसे चीरवाससे ।। ३५.
ह्रस्वाय मुक्तकेशाय सेनान्ये रोहिताय च ।। ३५.
कवये राजवृद्धाय तक्षकक्रीडनाय च। गिरिशायार्कनेत्राय यतिने जाम्बवाय च। सुवृत्ताय सुहस्ताय धन्विने भार्गवाय च ।। ३५.
सहस्रबाहवे चैव सहस्रामलचक्षुषे। सहस्रकुक्षये चैव सहस्रचरणाय च ।। ३५.
सहस्रशिरसे चैव बहुरूपाय वेधसे। भवाय विश्वरूपाय श्वेताय पुरुषाय च ।। ३५.
निषङ्गिणे कवचिने सूक्ष्माय क्षपणाय च। ताम्राय चैव भीमाय उग्राय च शिवाय च ।। ३५.
बभ्रवे च पिशङ्गाय पिङ्गलायारुणाय च। महादेवाय शर्व्वाय विश्वरूपशिवाय च ।। ३५.
हिरण्याय च शिष्टाय श्रेष्ठाय मध्यमाय च । पिनाकिने चेषुमते चित्राय रोहिताय च ।। ३५.
दुन्दुभ्यायैकपादाय अर्हाय बुद्धये तथा। मृगव्याधाय सर्पाय स्थाणवे भीषणाय च ।। ३५.
बहुरूपाय चोग्राय त्रिनेत्रायेश्वराय च। कपिलायैकवीराय मृत्यवे त्र्यम्बकाय च ।। ३५.
वास्तोष्पते विनाकाय शङ्कराय शिवाय च। आरण्याय गुहस्थाय यतिने ब्रह्मचारिणे ।। ३५.
साङ्ख्याय चैव योगाय ध्यानिने दीक्षिताय च। अन्तर्हिताय शर्व्वाय मान्याय मालिने तथा ।। ३५.
बुद्धाय चैव पुण्याय धार्मिकाय शुभाय च। रोधसे चेकितानाय ब्रह्मिष्ठाय महर्षये ।। ३५.
चतुष्पादाय मेध्याय धर्मिणे शीघ्रगाय च। शिखण्डिने कपालाय दंष्ट्रिणे विश्वमेधसे ।। ३५.
अप्रतीघाताय दीप्ताय भास्कराय सुमेधसे। क्रूराय विकृतायैव बीभत्साय शिवाय च ।। ३५.
सौम्याय चैव पुण्याय धार्मिकाय शुभाय च। अवध्याय मृताङ्गाय नित्याय शाश्वताय च ।। ३५.
साद्याय शरभायैव शूलिने च त्रिचक्षुषे। सोमपायाज्यपायैव धूमपायोष्मपाय च ।। ३५.
शुचये रेरिहाणाय सद्योजाताय मृत्यवे। पिशिताशाय खर्वाय मेधाय वैद्युताय च ।। ३५.
व्याश्रिताय श्रविष्टाय भारतायान्तरिक्षये। क्षमाय सह मानाय सत्याय तपनाय च ।। ३५.
त्रिपुरघ्नाय दीप्ताय चक्राय रोमशाय च। तिग्मायुधाय मेध्याय सिद्धाय च पुलस्तये ।। ३५.
रोचमानाय खण्डाय स्फीताय ऋषभाय च। भोगिने पुञ्जमानाय शान्तायैवोर्द्ध्वरेतसे ।। ३५.
अघघ्नाय मख्घ्नाय मृत्यवे यज्ञियाय च। कृशानवे प्रचेताय वह्नये किशलाय च ।। ३५.
सिकत्याय प्रसन्नाय वरेण्यायैव चक्षुषे। क्षिप्रेगवे सुधन्वाय प्रमेध्याय प्रियाय च ।। ३५.
रक्षोघ्नाय पशुघ्नाय विघ्नाय शयनाय च। विभ्रान्ताय महन्ताय अन्तये दुर्गमाय च ।। ३५.
दक्षाय च जघन्याय लोकानामीश्वराय च। अनामयाय चोर्द्ध्वाय संहत्याधिष्ठिताय च ।। ३५.
हिरण्यबाहवे चैव सत्याय शमनाय च। असिकल्याय माघाय रीरिण्यायैकचक्षुषे ।। ३५.