एक दिन किसी ने उससे पूछा, ‘‘तुम दिन-रात क्या करते हो? मुझे बताओ, क्या तुम पांचाल देश के हो, ब्राह्मणपुत्र हो या व्यापार में लगे हो?’’ वह व्यक्ति दक्षिण दिशा से चलकर मथुरा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर, स्नान करने के बाद उसने त्रिगर्तेश्वर नाम से प्रसिद्ध महेश्वर भगवान के दर्शन किए। सुमंतु ने कहा, ‘‘जब वह स्नान नहीं करता था, तब उसके शरीर में कीड़े पड़ जाते थे, किंतु स्नान के बाद वह निर्मल और तेजस्वी दिखाई देता था। निश्चय ही, तुम्हारे भीतर कोई गंभीर, छुपा हुआ पाप है। कालिंजर के स्पर्श से तुम्हारा शरीर शुद्ध प्रतीत होता है। अपने उस गुप्त पाप को पहचानो और हमें बताओ। इस पुण्यस्थल की महिमा देखकर मैं तुम्हारी भलाई के लिए ही पूछ रहा हूँ।’’ किन्तु जब उससे यह पूछा गया, तो वह मौन रहा और उसी प्रकार वहाँ से चला गया। कुछ समय बाद, उसने अपनी प्रिय से पूछा, ‘‘भाग्यशालिनी, तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो, मधुरभाषिणी? और किस देश से आई हो?’’ बार-बार आग्रह करने पर, वह स्त्री कठिनाई से उत्तर देती है। वह कहती है, ‘‘गंगा के उत्तरी तट पर पांचाल नाम का एक रमणीय नगर है। जब वहाँ दुर्भिक्ष पड़ा, तो हम दोनों दक्षिण दिशा की ओर चले गए। वहाँ मेरे पिता के पाँच पुत्र थे और मैं भी उनके साथ थी। मेरा सबसे छोटा भाई है और सबसे बड़ा पाँचवां। जब वह चला गया, तब मेरे माता-पिता ने भी अपना अंतिम समय पा लिया। यहाँ मैं सदा स्नान, देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा में लगी रहती थी।’’ फिर वह दुखी होकर कहती है, ‘‘गिरी हुई स्त्री की भांति आचरण करके मैंने अपने कुल का नाश कर दिया। मेरे अत्यंत पापपूर्ण कर्मों के कारण मैंने उसे भयंकर नरक में पहुँचा दिया।’’ अपने पूर्वज कुल की स्मृति कर वह स्त्री जोर-जोर से विलाप करने लगी। उसकी यह व्यथा सुनकर वहाँ की स्त्रियाँ एकत्रित हो गईं। उन्होंने विभिन्न उपायों द्वारा उस पुरुष को पुनः जीवित किया। तब उस व्यक्ति ने अपनी पूरी कथा और अपने महान वंश का परिचय दिया। उसके बाद वह अपने अनुचित संबंध के कारण बहुत दुखी हुआ। फिर कहा गया, ‘‘यदि कोई ब्राह्मण ब्रह्महत्या करता है या मद्यपान करता है, माता, गुरु-पत्नी, बहन, पुत्री या पुत्रवधू के साथ अनुचित संबंध करता है, ब्रह्महत्या, मद्यपान, स्त्रीहत्या करता है या गुरु के शयन में जाता है...’’ यह सब सुनकर पांचाली ने केवल अपने सबसे बड़े भाई को ही स्वीकार किया। वहाँ जो भी रत्न, वस्त्र, धन, अन्न आदि था, वह सब कालिंजर के अलंकरण और विशेष रूप से बगीचों के लिए समर्पित कर दिया। अपनी शुद्धि के लिए उसने यज्ञाग्नि प्रज्वलित की। पांचाल देश के उस पुरुष ने भी विधिपूर्वक अपने गुरु ऋषि को प्रणाम किया। उसने वहाँ मृत्युकाल के लिए उपयुक्त संस्कार किए। वहाँ गाँव खरीदकर ब्राह्मणों को दान में दिए। यज्ञ के लिए धन भी वितरित किया। फिर कृष्ण की पावन स्थली पर स्नान करके, देवता के दर्शन कर, प्रणाम किया। उसने वहाँ एक मंदिर बनवाया और व्यापारियों को निर्देश दिए। फिर किसी ने कहा, ‘‘हे देवता! आपकी दिव्य विद्या अद्भुत और रोमांचकारी है। मैं उसी समय से, मथुरा से आरंभ करते हुए, यहाँ आया हूँ, हे आचार्य।’’ इस प्रकार, उन पुण्यात्माओं की कथा क्रमशः आगे बढ़ती रही।