उस महर्षि की बात सुनकर वह स्त्री उनके पास आई और विनम्रता से बोली, “हे मुनिवर, मैं दुर्भाग्यवश संतान-सुख से वंचित हूँ।” तब महर्षि ने करुणा से कहा, “देवी की कृपा से तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।” यह सुनकर वह सुंदर कटि वाली स्त्री श्रद्धा से झुक गई और मुनि से आशीर्वाद माँगा। महर्षि ने प्रसन्न होकर कहा, “हे देवी, मेरी भी यही राय है, जो मुनि ने कही है।” फिर दोनों पति-पत्नी सरस्वती के संगम पर स्नान कर गोकार्ण की पूजा करने लगे। इस प्रकार पुत्र की प्राप्ति के लिए वे दस वर्षों तक तपस्या और उपासना करते रहे। आखिरकार, देवताओं की कृपा से उन्हें संदेश मिला, “तुम दोनों को सुंदर और गुणवान पुत्र की प्राप्ति होगी; जो कहा गया है, वह पूर्ण होगा।” भोर के समय उन्होंने देवताओं के स्वामी को अपार धन अर्पित किया। फिर उस पुण्यवती स्त्री के गर्भ में संतान का संचार हुआ और दसवें महीने में उसने चंद्रमा के समान तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। उस समय पिता ने सहर्ष हजार गायें, स्वर्ण और वस्त्र दान किए। उन्होंने पुत्र के जन्मोत्सव और नामकरण संस्कार संपन्न किए। आगे चलकर अन्नप्राशन, मुंडन और उपनयन संस्कार भी विधिपूर्वक किए। इन सब अवसरों पर वे देवी की पूजा और दान करते रहे। समय के साथ वह बालक यौवन में प्रवेश कर गया, किंतु उसे कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नियाँ भी यौवन, सौंदर्य, सद्गुण और मनोहारी नेत्रों से सुशोभित थीं। उस युवक ने धर्म की स्थापना प्रारंभ की, जिससे प्रजा और देवताओं की सेवा हो सके। उसने जलाशय, भोजन, अन्न और आजीविका के साधन उपलब्ध कराए। उसके द्वारा सभी कार्यों का उचित प्रबंध सदा किया जाता था। उसने हरि को समर्पित पाँच मंदिरों के साथ एक भव्य देवालय का निर्माण कराया। बाग-बगिचों की सिंचाई हेतु कुओं से जल निकालने की प्रथा भी उसी ने प्रारंभ की। स्नान, पूजा, स्वच्छता, दीपदान आदि कार्य भी उसी प्रकार संपन्न होते थे। उसकी चार बहनें अपने पतियों के प्रति समर्पित और अत्यंत सौभाग्यशाली थीं। मालाकार सदा वृक्षों पर जल छिड़कता था, जिससे वे पेड़ खूब फूल और फल देने लगे। वहाँ सबको इंद्र के समान सुख-संपत्ति और आनंद प्राप्त था। किंतु जो सदा दान करता था, उसकी संपत्ति धीरे-धीरे घटने लगी। उसे माता-पिता और परिवार का भरण-पोषण भी करना था। यह सोचकर उसने मन में निश्चय किया कि अब वह वाणिज्य करेगा। वह उत्तरी प्रदेशों से उत्तम वस्तुएँ खरीद लाया। लाभ-हानि का विचार कर उसने व्यापार के लिए बहुमूल्य रत्न, श्रेष्ठ घोड़े, कीमती वस्त्र और उपयुक्त सामान खरीदा। एक बार उसका काफिला विश्राम के लिए रुका। नदी के तट पर एक सुंदर स्थान पर उन्होंने डेरा डाला। वहाँ वह अपने कुछ सेवकों के साथ आवश्यक कार्यों का निर्देश देता था। मनोरंजन के लिए घूमते हुए उसने एक अद्भुत स्थान देखा, जहाँ फलदार वृक्ष और सुगंधित पुष्प थे। वहाँ चढ़कर वह दूर तक गुफा के द्वार की ओर निहारने लगा।