श्री वराह पुराण के इन अध्यायों में एक गहन और रहस्यमय प्रसंग का वर्णन मिलता है, जिसमें पापकर्मों का प्रायश्चित विस्तार से बताया गया है। सबसे पहले, यह स्पष्ट किया गया है कि कुछ कर्मों में दोष नहीं होता, इसमें कोई संदेह नहीं है। एक अध्याय समाप्त होता है, जिसमें दंतधारी लकड़ी चबाने के प्रायश्चित का वर्णन हुआ था। इसके पश्चात्, मृतक को स्पर्श करने के प्रायश्चित पर चर्चा आरंभ होती है। श्री वराह भगवान कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति सहवास के बाद स्नान किए बिना मृत शरीर को छूता है, तो वह दोषी होता है। इस प्रसंग में पृथ्वी माता, नारायण से सुनकर, एक वर्ष तक कठोर व्रत का पालन करती हैं। पृथ्वी माता पूछती हैं, "मनुष्य इस प्रकार वीर्यपान की प्रवृत्ति में कैसे प्रवृत्त होता है?" यह उनके लिए अत्यंत दुःख का कारण है। भगवान कहते हैं, "हे देवी, यह सर्वोच्च और गुप्त उपदेश है। यह उस अलौकिक अपराध का संकेत है। जो व्यक्ति इसे देखता है, वह उसी अपराध का फल प्राप्त करता है। ऐसे अपराध के कारण शुद्धि नहीं होती।" भगवान आगे बताते हैं कि गृहस्थ, जो उनके कार्यों में लगे रहते हैं, यदि वे एक दिन केवल वायु का सेवन करें, तो वे पाप से मुक्त हो जाते हैं। जब व्यक्ति अपने कर्म के अपराध को समझ लेता है, तो पाप उसे नहीं छूता। प्रायश्चित से पृथ्वी को सुख मिलता है। फिर भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति उनकी शास्त्रों को छोड़कर श्मशान में प्रवेश करता है, वह श्मशान में सियार बन जाता है और शवों को खाता है। भगवान मधुर वचन कहते हैं, "हे प्रभु, जो आपके शरणागत हैं, उनके लिए पाप कहाँ है? कृपया वह प्रायश्चित बताएं जिससे पाप से मुक्ति मिले।" भगवान कहते हैं, "मैं तुम्हें अब वह श्रेष्ठ पाप-नाशक उपाय बताता हूँ। पंचगव्य पीने से पाप से मुक्ति मिलती है। हर प्रकार से, भगवान के भक्तों को इसे अवश्य टालना चाहिए। जब वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है, तो उसके लिए कोई अपराध नहीं रहता।" यदि कोई व्यक्ति काम, मोह और इच्छा के वशीभूत होकर अपराध करता है, तो वह देवी के अनुसार अंधा, निर्धन और ज्ञानहीन जन्म लेता है। इस अपराध को करने के बाद भी, भगवान के भक्तों के लिए संसार के समुद्र से मुक्ति निश्चित है। फिर श्री वराह कहते हैं, "तीन रातों तक तपस्या करके, खुले आकाश के नीचे शय्या पर रहना चाहिए। तब वह शुद्ध और भक्त बनकर मेरे कार्यों में लगे रहता है। तब वह पाप से मुक्त हो जाता है, चाहे आचरण से निष्कासित हो।" भगवान बताते हैं, "जो व्यक्ति मृतक को स्पर्श करता है और मेरे पवित्र स्थानों में रहता है, वह दस हजार वर्षों तक चांडाल के रूप में जन्म लेता है। तीन वर्षों तक मक्खी, ग्यारह वर्षों तक टिटिहरी, सौ वर्षों तक हाथी और बत्तीस वर्षों तक गधे के रूप में जन्म लेता है।" इस प्रकार, अपने ही दोष के कारण वह मेरे कार्यों में प्रवृत्त होता है। फिर, श्री हरि के वचन सुनकर, पृथ्वी माता दुःखी होकर प्रश्न करती हैं, "ये वचन अत्यंत भयानक हैं, मेरे हृदय को चीर देते हैं। आचरण से गिरकर भी वह आपके कार्यों में लगा रहता है।" पृथ्वी माता के वचन सुनकर, जगत के स्वामी श्री जनार्दन कहते हैं, "अब उसे पंद्रह दिनों तक एक ही भोजन लेना चाहिए। फिर, इस विधि को करने के बाद, पंचगव्य का सेवन करना चाहिए।" अंत में, भगवान कहते हैं, "हे देवी, यह सब मैंने तुम्हें बताया, और मृतक को स्पर्श करने के प्रायश्चित के विषय में भी।" इस प्रकार, श्री वराह पुराण में पापकर्म और उसके प्रायश्चित का विस्तारपूर्वक, श्रद्धापूर्वक वर्णन हुआ है।