वराह पुराण के इस प्रसंग में, भगवान वराहदेव धर्म के रहस्यों को प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि जो वैश्य उनके पथ का अनुसरण करना चाहता है, उसे सबसे पहले दंतधावन के लिए उदुम्बर की दातुन अपने दाएँ हाथ में लेनी चाहिए। फिर वह ज़मीन पर अपने घुटनों से स्पर्श करते हुए एक विशेष मंत्र का उच्चारण करता है—“मैं, एक वैश्य, आपके पास आया हूँ, अपने सभी वैश्य कर्तव्यों और संबंधों को त्यागकर।” जब वह इस प्रकार संकल्प करता है, तो वह भी भगवान की सेवा में पूर्णतः समर्पित हो जाता है। इसके बाद, वह कृषि, पशुपालन और व्यापार—इन सब क्रियाओं को छोड़ देता है। फिर वह देवताओं और भगवद्भक्तों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता है। इस प्रकार, जो वैश्य भगवान के पथ का अनुसरण करना चाहता है, उसके लिए यही दीक्षा का विधान है। फिर भगवान वराहदेव देवी पृथ्वी से कहते हैं, “हे पुण्यवती, अब मैं तुम्हें शूद्र के लिए दीक्षा की विधि बताता हूँ।” यदि कोई शूद्र भगवान की भक्ति में दीक्षित होना चाहता है, तो उसके लिए ये संस्कार शीघ्र किए जाने चाहिए। पहले, उसके शरीर को आठ हाथ लंबाई तक लेपित किया जाता है, फिर उसे आगे ले जाया जाता है। उसे वैष्णव दंड और नील वस्त्र दिया जाता है। फिर वह भगवान में ही शरण लेकर यह मंत्र बोलता है, और जो कुछ खाने योग्य, न खाने योग्य है तथा शूद्र के सभी कर्तव्यों को भी त्याग देता है। इस प्रकार, वह समस्त पापों से मुक्त, जागरूक और इच्छारहित हो जाता है। अपने गुरु को प्रसन्न करने के लिए वह एक मंत्र का उच्चारण करता है—“भगवान विष्णु की कृपा से, मैं संसार से मुक्ति के लिए यह कर्म करता हूँ, जैसा पहले कृपावान गुरु से रहस्य प्राप्त किया था; आप प्रसन्न हों।” इस मंत्र का स्पष्ट उच्चारण कर वह परिक्रमा करता है, फिर सुगंध और पुष्पमालाओं से पूजन करता है। यही शूद्र के लिए दीक्षा का विधान है। इसके बाद भगवान वराहदेव कहते हैं, “हे वसुधरा, अब मैं तुम्हें अन्य बात बताता हूँ। ब्राह्मण के लिए श्वेत छत्र, क्षत्रिय के लिए रक्तवर्ण छत्र उपयुक्त है।” तब सूतजी कहते हैं कि वराहदेव ने पृथ्वी को प्रणाम कर पुनः वचन कहे। पृथ्वी ने प्रश्न किया, “आपके वे भक्त, जो दीक्षित हो चुके हैं, उन्हें आगे क्या करना चाहिए?” पृथ्वी के वचन सुनकर आकाश में बादलों और नगाड़ों की गड़गड़ाहट जैसी ध्वनि हुई। श्री वराहदेव बोले, “मुझे सर्वत्र, किंतु गुप्त रूप से, सभा के बीच भी ध्यान किया जाना चाहिए।” नारायण के वचन सुनकर पृथ्वी, जो व्रत में अडिग, पवित्र और भक्तों में श्रेष्ठ थी, सदा उनके कार्य में लगी रहती थी। उसने हाथ जोड़कर भगवान से पूछा, “हे माधव! आपके चिंतन में लीन होकर यहाँ क्या करना चाहिए? आपको, जो चिन्तनातीत और मनुष्यों से परे हैं, किस प्रकार और किसके द्वारा ध्यान किया जाए?” पृथ्वी के इन वचनों को सुनकर, आदिपुरुष वराहदेव ने कहा, “जिस प्रकार भी तुम मेरे कार्य में लगकर मुझे स्मरण करती हो, वही ‘गुप्त सभा’ की दीक्षा कहलाती है, जो संस्कार के बीज से उत्पन्न होती है। जो शुद्ध, दीक्षित और मेरे कार्य में अडिग है, और जिसने यह गुप्त सभा दीक्षा प्राप्त की है, उसके लिए अन्य कोई कर्तव्य नहीं रहता; यह दीक्षा महान फलदायिनी है। जिस दीक्षा से धर्म की स्थापना होती है, वही आसुरी दीक्षा कहलाती है। जो गुप्त सभा में मेरा ध्यान करता है, वह विद्वानों में श्रेष्ठ है।” फिर वराहदेव कहते हैं, “अब मैं बताता हूँ कि यह दीक्षा शिष्य को किस प्रकार दी जाती है। कौमुद मास, मार्गशीर्ष या वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को, यह विधि सम्पन्न होती है।” इस प्रकार भगवान वराहदेव ने पृथ्वी को दीक्षा की गूढ़ विधि, उसके रहस्य और फल विस्तार से समझाए।