श्री वराह पुराण में गाय के दान और उसकी महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से केवल एक बार भी गाय की प्रदक्षिणा करता है, वह उसी क्षण पुण्य का भागी बन जाता है। यदि शुद्धचित्त व्यक्ति गौमूत्र से स्नान करता है, तो उसे गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान करने के समान फल प्राप्त होता है। ऐसे भक्तिपूर्वक किए गए एक स्नान से भी मनुष्य महान पुण्य अर्जित कर लेता है। जो व्यक्ति हज़ार गायों का दान करता है, या केवल एक कपिला (गौर वर्ण की) गाय का दान करता है, उसे भी महान फल प्राप्त होता है। परंतु यदि वह गाय मृत्यु की गंध, जैसे कि हड्डी आदि से अपवित्र हो जाए, तो उसका पुण्य नष्ट हो जाता है। गाय की सेवा में सबसे उत्तम सेवा है—उसे सहलाना और उसकी रक्षा करना। जो प्रतिदिन भूखी गाय को घास आदि देता है, उसे स्वर्गलोक में विविध दिव्य विमानों में सुंदर अप्सराओं से घिरे हुए विहार करने का सौभाग्य मिलता है। गायों के विभिन्न रूपों का भी उल्लेख है—पहली स्वर्णवर्ण कपिला है, दूसरी गौर वर्ण और ताम्रवर्ण की है; पाँचवी बहुवर्णी है, छठी श्वेत और ताम्रवर्ण की है; नवमी लालिमा लिए हुए है, और दसवीं की पूँछ ताम्रवर्ण की है। ये सभी शुभ लक्षणों से युक्त, अलंकृत और अत्यंत सुंदर होती हैं। इन गायों में से कपिला गाय भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती है तथा विष्णुपद की ओर ले जाती है। इसी प्रसंग में 'कपिला गाय के दान की महिमा' नामक अध्याय का समापन होता है। इसके पश्चात् दोमुखी गाय, सुवर्णकलश और पुराणों के दान की महिमा का वर्णन प्रारंभ होता है। श्री वराह भगवान् कहते हैं—राजन! अब तुम दोमुखी गाय के दान के विषय में सुनो। कपिला गाय के संबंध में जो पुण्य तुम्हारे द्वारा पूछा गया था, उसे मैं बताता हूँ। वह सदैव यज्ञ की गाय मानी जाती है, सदा शुद्ध और कपिला लक्षणों से युक्त होती है। हे माधव! जो कपिला गाय बछड़ा देने योग्य अवस्था में दान की जाती है, उससे क्या फल मिलता है? इस विषय में सुनने मात्र से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं है। कपिला गाय अग्निहोत्र और यज्ञ के लिए परम आवश्यक है, वह सबसे शुद्ध और सर्वाधिक मंगलमयी है। वह तपस्याओं में सर्वोच्च और व्रतों में श्रेष्ठ है। पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ और गुप्त स्थान हैं, उन सबका पुण्य भी उसमें समाहित है। द्विजजन संध्या और प्रातःकाल में अग्निहोत्र के लिए विभिन्न मंत्रों से आहुति देते हैं, और वे श्रेष्ठ द्विजजन सूर्य के समान प्रकाशमान विमानों में चढ़कर स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं। कपिला गाय, जिसकी आँखें ताम्रवर्ण की होती हैं, वह सूर्य के समान आनंद देती है। ये कपिला गायें, जो सभी शुभ लक्षणों से युक्त हैं, तीर्थसंगमों में पूजनीय हैं और सभी पापों का नाश करती हैं। इन्हीं के समान अग्निजन्मा और सुवर्णा देवी का भी उल्लेख हुआ है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अधर्म में लिप्त होकर पतित हो जाता है, वह चांडाल के समान निम्न माना जाता है। ऐसे लोगों से, जैसे यज्ञ में कुत्तों से दूर रहते हैं, वैसे ही दूर रहना चाहिए। जो शूद्र पापकर्म में लिप्त होते हैं, उनसे न बात करनी चाहिए, न उन्हें स्वीकार करना चाहिए। वे पृथ्वी की मलिनता का भक्षण करते हैं और दीर्घकाल तक गोबर खाने वाले जीवों के रूप में जन्म लेते हैं। ऐसे शूद्रों की गति सुनो—वे भयानक रौरव नामक नरक में करोड़ों वर्षों तक रहते हैं। कुत्ते के गर्भ से जन्म लेकर वे फिर से मलभक्षी कीड़े बनते हैं, बार-बार जन्म लेते हैं, किंतु मुक्त नहीं होते। उनके पितर भी अपवित्र स्थानों में निवास करते हैं। ऐसे मनुष्यों से ब्राह्मणों को सदैव दूर रहना चाहिए। इस प्रकार, श्री वराह पुराण में कपिला गाय के दान, उसकी सेवा और उससे प्राप्त होने वाले पुण्य की महिमा तथा अधर्मी जीवन की निंदा का विस्तार से वर्णन हुआ है।