एक बार एक व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा, “मेरे पास घोड़े, हाथी, असीम संपत्ति और अन्न है, लेकिन किस पुण्य या कर्म के फलस्वरूप मेरी जवानी इतनी स्थिर है?” उसने आगे कहा, “यह तो दिन में दिखती है, पर रात होते ही अदृश्य हो जाती है। हे ब्राह्मण, मुझे बताइए कि बुरे कर्मों से कैसे बचा जाए।” तब ब्राह्मण ने स्नेहपूर्वक कहा, “पुत्री, सुनो, बहुत समय पहले बचपन की नादानी में जो कुछ हुआ, वह बताता हूँ। तुम्हारे पति वास्तव में विदुरथ के पुत्र हैं। राजकुमार ने अनेक मुर्गियाँ खा ली थीं। कई वर्षों तक वह इन्हें खाते रहे, लेकिन जब मुर्गियाँ आना बंद हो गईं, और उनसे इसका कारण पूछा गया, तो कोई उत्तर नहीं मिला। तब किसी ने बताया कि राजा ने बिना कारण सभी मुर्गियाँ खा ली हैं। यह सुनकर ताम्रचूड़ा अत्यंत क्रोधित हुईं और उस दुष्ट बुद्धि वाले पर शाप दे दिया। तभी से राजकुमार का शरीर प्रतिदिन दुर्बल होने लगा। किसी इच्छा के वशीभूत होकर वह वामदेव के आश्रम गए और बार-बार प्रणाम कर प्रश्न किया, ‘भगवन्, किस पाप के कारण मेरा शरीर दिन-रात क्षीण होता जा रहा है?’ वामदेव ने उत्तर दिया, ‘तुमने मुर्गियाँ खाई हैं। अब ताम्रचूड़ा की शरण में जाओ, वही उपाय बताएंगी।’ राजकुमार ने ताम्रचूड़ा के सामने अत्यंत भक्ति से हाथ जोड़कर कहा, ‘प्रभो, अज्ञानवश और अपने भरण-पोषण के लिए ही मुर्गियाँ खाई थीं।’ ताम्रचूड़ा ने कहा, ‘राजन्, क्योंकि तुमने निवेदन किया है… राजा दंड का धारक, लोकों का शासक, गुरु और रक्षक होता है। अतः, पुत्री, वह अब पशु योनि में चला गया है, इसलिए दिखाई नहीं देता।’ महात्मा गालव के वचनों को सुनकर उसने अत्यंत भक्ति से पूछा, ‘यह शाप कैसे समाप्त होगा?’ गालव ने ध्यानपूर्वक जानकर कहा, ‘महाकाल वन में जो “पक्षीयोनि-मोचन” नामक लिंग है, केवल उसका दर्शन करने से शाप समाप्त हो जाएगा।’ वह कन्या महर्षि को प्रणाम कर शीघ्र वहाँ से चल पड़ी। उसकी आँखें प्रसन्नता से खिली थीं, और उसके प्रियतम ने उसे चंचल दृष्टि से देखा। उस समय राजा ने उस मृगनयनी से बात की। उसने कहा, ‘हे महाबली राजन्, आज मैं आपके साथ चलूँगी।’ उसके वचन सुनकर राजा अत्यंत प्रसन्नता से शीघ्र वहाँ पहुँचे। उन्होंने उस “पक्षीयोनि-मोचन” लिंग की विधिपूर्वक पूजा की। उस रात, जो मुर्गा प्रतिदिन दिखाई देता था, वह नहीं आया। सौंदर्य और अद्भुत तेज से मोहित होकर राजा ने सोचा, ‘यह कौन-सी शक्ति है, जिसके कारण मैं इतने कठिन शाप से मुक्त हो गया?’ राजा ने अपनी प्रिया से, जिसका मुख पूर्णिमा के चंद्रमा सा था, गंभीरता से पूछा। तब उसने संपूर्ण कथा हर्षपूर्वक विस्तार से सुनाई, ‘राजन्, आप इस लिंग के प्रभाव से शाप से मुक्त हुए हैं।’ इसके बाद, राजा अपनी प्रिया के साथ स्वर्ग को गए, जहाँ देवताओं ने उनकी प्रशंसा की। गालव ने कहा, ‘हे देवी, यह लिंग संसार में सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला प्रसिद्ध है। यहाँ आने वाला न तो पशुयोनि को प्राप्त करता है, न वियोग होता है, न नरक की प्राप्ति, न दुख, न बुढ़ापा, न भय।’ ‘वे हर युग में सौंदर्य और सौभाग्य से संपन्न रहते हैं, और उनके वंश के जो भी पूर्वज हैं, चाहे वे नरक में हों, पशु योनि में हों या किसी भी जीव के रूप में हों—’ ‘—केवल इस लिंग के दर्शन से ही वे भी पशु योनि से छूट जाते हैं।’ इस प्रकार यह पावन कथा पूर्ण हुई।