इस कथा में, स्कंद महापुराण के अवंती खंड की महिमा का वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि जो व्यक्ति महेश्वर के लिए वस्त्र बांधता है, वह निष्पाप होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है। महेश्वर की पूजा में कपूर, केसर, कस्तूरी और चंदन का अर्पण भी किया जाता है। श्रेष्ठ ब्राह्मणों को, अपनी शक्ति अनुसार, स्वयं की उपस्थिति में भोजन कराना चाहिए और ब्राह्मण को उसकी पत्नी सहित सम्मानपूर्वक भोजन कराना चाहिए। अवंती क्षेत्र की महिमा का दसवां अध्याय, जिसमें कुटुंबिकेश्वर की महिमा का वर्णन है, पूर्ण होता है। इसके बाद, विद्यानिधि तीर्थ का वर्णन आरंभ होता है। एक ब्राह्मण, अपने गुरु से विनम्रता से पूछता है कि वह इस पवित्र स्थान का विस्तार से वर्णन करें। एक समय की बात है, एक विद्यातर ने पारिजात पुष्पों की मनोहर माला बनाई और उसे लेकर वासव (इंद्र) के निवास स्थान पर गया। वहां उसने वह माला मेनका को दी। मेनका उस सुंदर माला को पहनकर सभा में नृत्य करती है और सभी द्वारा प्रशंसा पाती है। इससे इंद्र को क्रोध आ जाता है और वह विद्यातर को शाप देता है। शाप के कारण विद्यातर अपनी पूर्व स्थिति छोड़कर अब अन्य अवस्था में आ जाता है। वह विनम्रता से कहता है, "हे प्रभु, मुझसे अनजाने में अपराध हो गया।" तब इंद्र उसे उत्तर देते हैं कि उस स्थान के उत्तर भाग में एक उत्तम तीर्थ है। वहां श्रद्धा से स्नान करने पर वह विद्यातरों का स्वामी बन सकता है। इंद्र के निर्देश अनुसार, वह विद्यातर अवंती क्षेत्र में पहुंचता है और उस तीर्थ के प्रभाव से अपनी मूल स्थिति पुनः प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति वहां फूल और चंदन का लेप अर्पित करता है, उसे भी विशेष पुण्य प्राप्त होता है। सनत्कुमार कहते हैं, उस तीर्थ की महिमा प्रसिद्ध है—वह सभी इच्छाओं की पूर्ति करता है। वहां स्नान करने से सौ गौदान के बराबर पुण्य मिलता है। वहां मसूर को नापकर पीसना चाहिए। जो भक्तिपूर्वक शीतला देवी के दर्शन करते हैं, वे रोग और ग्रहों की पीड़ा से मुक्त रहते हैं। इस प्रकार अवंती क्षेत्र में शीतला देवी की महिमा का वर्णन पूर्ण होता है। अगले अध्याय में बताया गया है कि वहां श्रद्धा से पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति अपने पितरों को तथा स्वयं को उन्नति प्रदान करता है। भैरव के सामने पूर्व दिशा में देवी अंबिका विराजमान हैं। महान नवमी के दिन, भक्तिभाव से एक पात्र अर्पित कर देवी को समर्पित करने से सभी सिद्धियां प्राप्त होती हैं। वहां स्नान करके भक्तिपूर्वक महेश्वर की पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार स्वर्ग के द्वार की महिमा का वर्णन भी पूर्ण होता है। फिर बताया गया है कि केवल दर्शन से ही व्यक्ति पुत्रों से संपन्न हो जाता है। चार समुद्रों का उल्लेख है—लवण, क्षीर, दधि और मधुर। ऋषि से पूछा जाता है कि ये समुद्र किसने स्थापित किए। सुंदर जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन तक है। शाकद्वीप में क्षीर समुद्र दो लाख योजन तक है, शाल्मली में शर्करासागर आठ लाख योजन तक है। ये चारों समुद्र पृथ्वी मंडल में वर्णित हैं। उस व्यक्ति की पत्नी, जिसका नाम सुंदर और स्वरूप उत्तम है, सुदर्शना कहलाती है। वह ऋषि डाल्भ्य से पुत्र प्राप्ति की इच्छा लेकर प्रश्न करती है—“मैं कैसे सभी गुणों से युक्त पुत्र प्राप्त कर सकती हूँ?” यह सब स्वयंभू ब्रह्मा, जो सृष्टि के कर्ता हैं, के द्वारा बताया गया है। इस प्रकार, स्कंद महापुराण के अवंती क्षेत्र की महिमा और वहां के तीर्थों, देवी-देवताओं, और पवित्र अनुष्ठानों का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है, जिससे श्रद्धालुजन को पुण्य, सिद्धि, और सुख की प्राप्ति होती है।