प्रभु, यह कथा स्कन्द महापुराण के प्रभास खंड की है, जिसमें देवी कात्यायनी, पिण्डारक तीर्थ और कनखल पर्वत के महात्म्य का वर्णन किया गया है। कथा का आरंभ इस प्रकार होता है—एक गुफा के मध्य में देवी कात्यायनी सदा लोककल्याण के लिए कार्य करती हैं। राजाओं में श्रेष्ठ, जो कोई भी शुक्ल पक्ष की अष्टमी को एकाग्रचित्त होकर उनका दर्शन करता है, उसे महान फल की प्राप्ति होती है। इसी के साथ चौबीसवें अध्याय का समापन होता है, जिसमें कात्यायनी देवी की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसके पश्चात्, कथा में उस स्थान का उल्लेख आता है जहाँ पूर्वकाल में मंकि और एक अन्य ब्राह्मण ने तपस्या की थी। हे राजन्, मंकि नामक ब्राह्मण वास्तव में केवल नाम से ही ब्राह्मण था। एक समय वह एक सुंदर पर्वत पर निवास करता था। कालांतर में उसने वहाँ संपत्ति प्राप्त की। फिर उसने दो बैलों को वश में किया और एक ऊँट को पकड़कर उसकी गर्दन में बलपूर्वक बाँध लिया। उस समय वह अपने गले में बंधे बैलों के साथ था। किन्तु शीघ्र ही मंकि के मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसने गाँव छोड़कर वन का आश्रय लिया। वहाँ वह प्रतिदिन तीन बार स्नान करता और उत्तम गायत्री मंत्र का जप करता। उसी मार्ग से एक दिन भगवान शंकर का आगमन हुआ। वहाँ पिण्डार नामक महात्मा ने आकस्मिक रूप से शंकर को देखा और प्रार्थना की—"हे ब्राह्मण, मेरा यह दर्शन व्यर्थ न जाए; मुझे वर दीजिए।" शंकर ने कहा, "जो तुम चाहो, वह मांगो।" पिण्डार ने कहा, "मुझे और कुछ नहीं चाहिए; बस, यह स्थान मेरे नाम से पिण्डारक तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हो जाए।" शंकर ने उसे वर दिया—"यह स्थान पिण्डारक तीर्थ कहलाएगा। यहाँ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मैं स्वयं निवास करूँगा। जो भी यहाँ आएगा, उसे मेरा परम धाम प्राप्त होगा।" इसके बाद मंकि, जो अब पिण्डारक के नाम से प्रसिद्ध हुआ, दिन-रात कठोर तपस्या करने लगा। दीर्घकाल बाद, उसने अपना शरीर त्याग दिया और स्वर्ग को प्राप्त हुआ। अतः, जो भी श्रद्धालु यहाँ श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, विशेषकर अष्टमी के दिन, और वहाँ गाय का दान करता है, उसे महान पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी के साथ पच्चीसवें अध्याय का समापन होता है, जिसमें पिण्डारक तीर्थ के महात्म्य का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसके आगे कथा कनखल पर्वत की ओर बढ़ती है, जो पापों का नाश करने वाला है। एक बार, वहाँ एक अद्भुत घटना घटी। सूर्यग्रहण के समय, राजा कनखल के पवित्र तीर्थ पर स्नान करने गया। वहाँ उसकी असावधानी के कारण बहुत सा सोना जल में गिर गया। स्नान के बाद वह घर लौट आया, परंतु हृदय में पश्चाताप से भर गया। पुनः सूर्यग्रहण के समय, वह फिर से स्नान के लिए उसी स्थान पर गया, किंतु जो स्वर्ण उसके हाथ से गिरा था, वह किसी भी प्रकार से वापस नहीं मिला। हे राजाओं में श्रेष्ठ, इस स्थान पर न तो इस लोक में और न ही परलोक में कोई हानि होती है। यहाँ प्राचीन काल का सोना करोड़ों गुना बढ़ जाता है। इसलिए, यहाँ श्राद्धादि कर्म विशेष रूप से स्वर्ण से करने चाहिए। जो भी ब्राह्मणों को दान देता है, उसका पुण्य असीमित होता है। जब यह बात राजा ने सुनी, तो वहाँ आकाश से वाणी प्रकट हुई। तब राजा ने संतुष्ट होकर, अत्यंत पवित्र और महान दान पूर्वजों और देवताओं के लिए दिया, जिसमें करुणा और श्रद्धा थी। उस दान की शक्ति से उस राजा को महान फल की प्राप्ति हुई। जो भी वहाँ सूर्य के संक्रमण के समय श्राद्ध करता है, और वहाँ स्नान करता है, वह ऋषियों, देवताओं और महान नागों को संतुष्ट करता है। इस प्रकार, इन तीन अध्यायों में देवी कात्यायनी, पिण्डारक तीर्थ और कनखल पर्वत के अद्भुत महात्म्य का विस्तार से वर्णन किया गया है, जिनकी कथा सुनना और स्मरण करना भी महान पुण्यदायक है।