एक बार महर्षि व्यास और जैमिनि के बीच धर्म की गूढ़ बातें हो रही थीं। व्यासजी ने बताया कि भगवान गोविंद, जिन्होंने मधु और कैटभ का वध किया, उनकी पूजा में यदि शाखा के अग्रभाग से गिरा हुआ कोई पुराना पत्ता भी चढ़ाया जाए, तो वह भी स्वीकार्य होता है। किंतु जो व्यक्ति भगवान को कोमल तुलसी दलों से पूजता है, उसे अपने हृदय की सभी इच्छाएँ शीघ्र ही प्राप्त होती हैं। जैमिनि ने जिज्ञासा प्रकट की, ‘‘हे सत्यवतीपुत्र! क्या तुलसी के समान कोई अन्य वृक्ष भी है?’’ तब व्यासजी बोले, ‘‘जैसे तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, वैसे ही आंवला (आमलकी) भी उन्हें प्रिय है और यह समस्त पापों का नाश करता है। हे द्विजश्रेष्ठ, जहाँ तुलसी के समीप देवता निवास करते हैं, वहीं वे आमलकी के नीचे भी वास करते हैं। जहाँ शुद्ध आमलकी वृक्ष स्थित होता है, वहाँ गंगा आदि सभी तीर्थस्थान विद्यमान रहते हैं।’’ फिर व्यासजी ने कहा, ‘‘आमलकी के नीचे मनुष्य जो भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, वह अवश्य सत्य और अक्षय होता है। जो व्यक्ति ताजे और शुद्ध आमलकी पत्रों से हरि की पूजा करता है, वह पापजाल से मुक्त हो जाता है और भगवान से एकाकार हो जाता है। हे जैमिनि, जहाँ आमलकी और तुलसी देवी निवास नहीं करतीं, वह स्थान अपवित्र है और वहाँ किए गए कर्मों का कोई फल नहीं मिलता। किसी आश्रम में यदि आमलकी और तुलसी न हों, तो वहाँ के सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं। जहाँ ये दोनों अनुपस्थित हैं, वह गृह दुर्भाग्य, पाप और कलियुग की प्रियता से ग्रस्त रहता है। जहाँ न आमलकी है, न तुलसी, उस स्थान को ज्ञानी लोग श्मशान के समान समझें।’’ व्यासजी ने आगे कहा, ‘‘जहाँ आमलकी और तुलसी हैं, वहाँ सभी देवता निवास करते हैं, पर जहाँ इनके पत्ते नहीं, वहाँ सब पाप एकत्र होते हैं। जो बुद्धिमान व्यक्ति आमलकी के फलों की माला धारण करता है, उसके शरीर में स्वयं विष्णु और लक्ष्मी निवास करते हैं। आमलकी की लकड़ी की माला धारण करने से सभी देवता उसके शरीर में वास करते हैं। जो व्यक्ति आमलकी फलों की माला धारण करके कोई भी कर्म करता है, वह कर्म अक्षय हो जाता है, चाहे वह शुभ हो या अशुभ। जो धात्री (आंवला) का फल तत्वज्ञान के साथ खाता है, उसके शरीर में स्थित सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो धात्री फलों की माला धारण करता है, वह समस्त पापों का नाशक और परम फल देने वाली है।’’ ‘‘यहाँ तक कि यदि उसका देहावसान श्मशान में भी हो जाए, तो भी उसे गंगा-तीर पर मृत्यु का पुण्य फल प्राप्त होता है। उसे देखकर अन्य पापी भी, चाहे वे कितने भी जन्मों के पापी क्यों न हों, अपने पापजाल से तुरंत मुक्त हो जाते हैं। जो प्रतिदिन धात्री फल का गूदा ग्रहण करता है, वह प्रतिदिन पुण्य प्राप्त करता है। जो धात्री वृक्ष का नाश करता है, वह समस्त देवताओं के निवास स्थान का नाश करता है और स्वयं हरि को कष्ट पहुँचाता है। धात्री समस्त देवताओं का स्वरूप है और केशव को अत्यंत प्रिय है, इसके गुणों का वर्णन स्वयं ब्रह्मा भी नहीं कर सकते। जो तत्वज्ञान पूर्वक धात्री और तुलसी की सेवा करता है, वह सभी भोग भोगकर अंत में भगवान हरि की कृपा से मोक्ष प्राप्त करता है।’’ इसके बाद जैमिनि ने पुनः पूछा, ‘‘हे महाभाग! विस्तार से तुलसी के पाप-नाशक प्रभाव और अतिथि-सत्कार के महत्त्व को बताइए।’’ तब सूतजी ने कहा, ‘‘व्यासजी ने तब ब्राह्मणों के समक्ष तुलसी की महिमा का वर्णन करना आरंभ किया। उन्होंने कहा—यह तुलसी प्रत्यक्ष महालक्ष्मी हैं, भगवान की अति प्रिय हैं; अतः हे जैमिनि, इसे केवल वृक्ष के रूप में न देखो।’’ ‘‘जैसे मनुष्य पृथ्वी पर तुलसी की सेवा करता है, वैसे ही उसे देवताओं के लोक में इंद्र सहित देवगण सेवा करते हैं। जहाँ तुलसी स्थित है, वहाँ वह परब्रह्म का स्वरूप है; वहाँ सब प्रकार का कल्याण निश्चित रूप से होता है। यहाँ तक कि यदि कोई पापी मरते समय तुलसी पत्र से छना जल प्राप्त करता है, तो वह हरि के धाम को प्राप्त होता है। जो मरते समय तुलसी की मिट्टी का तिलक लगाए होता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान के नगर को जाता है। मरते समय जिसके मुख में, सिर पर या कानों में तुलसी पत्र होते हैं, उसका स्वामी सूर्य नहीं होता।’’ इसके बाद व्यासजी ने एक कथा सुनाई—एक थे, परम ज्ञानी, पवित्र ब्राह्मण ‘पवित्र’ और उनकी पत्नी थीं बहुला, जो श्रेष्ठ कुल की, पतिव्रता और धर्मनिष्ठा थीं। उनके मित्र थे एक ब्राह्मण अनपत्यपति, जो निष्कलंक, ब्राह्मण सेवा में रत थे, किंतु न पत्नी थी, न संतान। वे कथा-प्रेम से प्रेरित होकर, स्नेहवश एक आसन पर बैठे थे। उसी समय वहाँ तेजस्वी, महान ऋषि लोंमश उपस्थित हुए। दोनों मित्र आपस में वार्ता कर ही रहे थे कि लोंमश को आते देख वे उठकर उनका स्वागत करने गए। उन्होंने लोंमश का पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदि से सत्कार किया। नारायण-भक्त लोंमश प्रसन्न हुए। फिर वे बैठकर हरि की स्तुति करने लगे। दोनों मित्र, हाथ जोड़कर, उनके पास गए। तब निःसंतान पवित्र ने श्रद्धापूर्वक लोंमश से कहा, ‘‘हे धर्मज्ञ महात्मन, आपके चरणों के दर्शन से...