भगवान श्रीराम ने, इन्द्र के राजा द्वारा पूजित होकर, मुनि अरण्यक का चंदन से अभिषेक किया और उन्हें दुग्धवती गौ दान में दी। फिर प्रभु ने कोमल वचन कहे, ‘‘भगवन्, अश्वमेध यज्ञ मैंने संपन्न किया है; अब आपके चरणों में आगमन से यह आज पूर्ण होगा। आपके पावन चरणों के स्पर्श से आज यह अश्वमेध यज्ञ मेरे ब्रह्महत्या के पाप को हर लेगा।’’ जब श्रीराम, श्रेष्ठ राजाओं द्वारा सेवा किए जा रहे थे, ये वचन कह रहे थे, तब मुनि अरण्यक मधुर मुस्कान के साथ बोले, ‘‘राजन्, आपके वचन यथार्थ हैं। आप ब्रह्म में निष्ठावान हैं और वेदों में निपुण ब्राह्मण आपके ही स्वरूप हैं। जब भी आप ब्रह्म की पूजा जैसे शुभ कर्म करते हैं, तब समस्त पृथ्वी के राजा ब्राह्मण का सम्मान करते हैं।’’ मुनि ने आगे कहा, ‘‘हे महाबाहो, आपने जो कहा कि शुद्ध यज्ञ से ब्रह्महत्या का पाप दूर होगा—यह बात हास्यास्पद है। मूर्ख, जो शास्त्रों से रहित है, वह केवल आपके नाम का स्मरण करके समस्त पापों के सागर को पार कर परम पद को प्राप्त कर लेता है। यही वेदों और इतिहासों का सार है—राम नाम का स्मरण पाप का नाश करता है।’’ ‘‘ब्रह्महत्या जैसे महान पाप भी तब तक गर्जना करते रहते हैं, जब तक कि ‘रामचंद्र’ नाम स्पष्ट रूप से उच्चरित नहीं होता। आपके नाम की गर्जना सुनकर, हे महाबली, महान पापों के हाथी भाग जाते हैं और छुपने का स्थान खोजते हैं। इसलिए, जो आपके पुण्य स्वरूप का दर्शन करता है, उसके लिए पाप कहाँ टिक सकता है? आपकी मधुर कथा का श्रवण करते ही मनुष्य पावन हो जाता है।’’ मुनि ने बताया, ‘‘प्राचीन काल में, कृतयुग में, मैंने गंगा के तट पर निवास करने वाले मुनियों से ये वचन सुने थे—जब तक कोई व्यक्ति, जो पाप से भयभीत और पापग्रस्त है, राम नाम का मंत्रमुग्ध कर देने वाला उच्चारण नहीं करता, तब तक पाप बने रहते हैं।’’ ‘‘इसलिए, आज मैं धन्य हूँ, क्योंकि आपके दर्शन से संसार-सागर से पार होना मेरे लिए सहज हो गया, हे रामचंद्र।’’ इन वचनों के बाद, वहाँ उपस्थित सभी ऋषियों ने मुनि अरण्यक की प्रशंसा की, ‘‘बहुत उत्तम, बहुत उत्तम वचन हैं।’’ शेषनाग बोले, ‘‘वहाँ एक अद्भुत घटना घटी, जिसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ, हे वत्स्यायन, जो राम के भक्तों में अग्रगण्य हो। जब मुनि ने ध्यानावस्थित श्रीराम का दर्शन किया, तो वे अत्यंत हर्षित हो गए और उपस्थित मुनियों से बोले, ‘‘हे श्रेष्ठ मुनियों, मेरे समान भाग्यशाली कौन है? न मुझ जैसा कोई था, न है, न होगा, क्योंकि राम स्वयं मेरे पास आए, मुझसे कुशल पूछी और मेरे चरणोदक को ग्रहण कर स्वयं को पावन मान लिया, जबकि वेद सदा उनके चरणों की धूल की कामना करते हैं।’’ जैसे ही उन्होंने यह कहा, ब्राह्मी तेजस्विता प्रकट हुई, वह सार-तत्व निकलकर रघुनायक श्रीराम में प्रविष्ट हो गया। सरयू तट के मंडप में, समस्त लोकों के सामने, मुनि ने योगियों के लिए भी दुर्लभ परम मोक्ष और एकत्व को प्राप्त किया। उसी क्षण आकाश में दिव्य नगाड़ों और वीणाओं की ध्वनि गूँज उठी, फूलों की वर्षा होने लगी—यह दृश्य बड़ा ही अद्भुत था। वहाँ उपस्थित सभी ऋषियों ने यह देखकर उस तपस्वी श्रेष्ठ की प्रशंसा की, ‘‘इस महान मुनि ने अपना जीवन सफल कर लिया, क्योंकि उन्होंने राम के दिव्य स्वरूप का साक्षात् दर्शन किया।’’ सूतजी बोले, ‘‘यह कथा सुनकर वत्स्यायन मुनि अत्यंत हर्षित हुए और शेषनाग से बोले, ‘‘हे नागराज, यह कथा सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती, क्योंकि यह रघुनाथ की कथा है, जिनका यश भक्तों के दुःख का नाश करता है। मुनि अरण्यक धन्य हैं, वे वेदों के परम ज्ञाता थे; रघुनाथ के दर्शन के पश्चात उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।’’ वत्स्यायन ने आगे पूछा, ‘‘फिर, राजा का घोड़ा कहाँ गया और किसने उसे रोका? वहाँ रामनाथ की कीर्ति कैसे प्रकट हुई, हे नागराज? कृपया सत्य-सत्य बताइए, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं और पर्वत के समान स्थिर हैं।’’ व्यासजी ने कहा, ‘‘इन वचनों को सुनकर शेषनाग ने हर्षित होकर श्रीराम के विविध गुणों की कथा सुनाई। शेषजी बोले, ‘‘हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, आप बार-बार रघुनाथ के गुणों को पूछते हैं—यद्यपि आपने सुना है, फिर भी आप पुनः पूछकर अपनी उत्सुकता प्रकट करते हैं।’’ फिर वह अश्व अनेक वीर सैनिकों से घिरा हुआ, ऋषियों से रमणीय रेवा नदी के तट की ओर गया। सारी सेना के गुप्तचर, घोड़े के पीछे-पीछे, उसकी गति पर दृष्टि रखते हुए, युद्ध-कौशल में निपुणता दिखाते हुए चलने लगे। वह घोड़ा, मस्तक पर स्वर्णपट्ट धारण किए, सुसज्जित होकर, रेवा की गहराइयों में जा पहुँचा। वहाँ उपस्थित सभी महान योद्धा विस्मित हो गए, जब उन्होंने देखा कि वह श्रेष्ठ अश्व जल में डूब गया है। वे आपस में विचार करने लगे, ‘‘हम घोड़े को कैसे प्राप्त करें? कौन उस महान अश्व को जल से निकालकर लाएगा?’’ जब वे चिंता में डूबे परामर्श कर रहे थे, तभी रघुकुल-नायक श्रीराम, सैकड़ों वीरों के साथ वहाँ पहुँचे। सबको उदास देखकर शत्रुघ्न, जो वीरों में श्रेष्ठ थे, गंभीर स्वर में बोले, ‘‘आज आप सब यहाँ जल में खड़े क्यों हैं? रघुनाथ का वह स्वर्णपट्ट से सुसज्जित अश्व कहाँ गया?