दक्षिणी समुद्र से शीघ्रता से प्रस्थान करते ही, आकाश में अचानक गम्भीर गर्जना जैसी एक दिव्य वाणी गूंजी। वह स्वयं भगवान रुद्र की थी। रुद्र ने कहा, ‘‘हे राम, तुम्हारा कल्याण हो! मैं यहाँ उपस्थित हूँ। जब तक यह संसार और यह पृथ्वी रहेगी, तब तक तुम्हारा यह सेतु और यह तीर्थस्थल भी सदा बना रहेगा, हे राघव।’’ देवों के देव महादेव के ये अमृतमय वचन सुनकर राम अत्यंत भावविभोर हो उठे। उन्होंने आदरपूर्वक कहा, ‘‘देवों के स्वामी, भक्तों को अभय देने वाले प्रभु, आपको बार-बार प्रणाम! हे गौरीपति, दक्ष के यज्ञ का संहार करने वाले महादेव, आपको बार-बार नमस्कार! ‘‘हे भव, हे शर्व, हे रुद्र, वरदान देने वाले प्रभु, नित्य पशुपति, उग्ररूपधारी, जटाधारी प्रभु, आपको बार-बार प्रणाम! हे महादेव, भयानक रूपधारी, त्र्यम्बक, दिशाओं के स्वामी, ईशान, भगनाशक, अंधकासुर के संहारक, आपको बार-बार प्रणाम! ‘‘नीलकण्ठ, विकराल, सृष्टिकर्ता द्वारा स्तुत्य, कुमार के शत्रुओं के संहारक, कुमार के जनक, आपको प्रणाम! अरुणवर्णी, धूम्रवर्णी, शिव, संहारक, नीलशिखरधारी, त्रिशूलधारी, दैत्यों के विनाशक, आपको बार-बार नमस्कार! ‘‘उग्र, त्रिनेत्री, सुवर्णबीजधारी, निष्कलंक, अम्बिका के पति, समस्त देवताओं द्वारा वंदित, आपको प्रणाम! सुलभ, सर्वप्रिय, सद्योजात, वृषध्वज, कपालधारी, जटाधारी, ब्रह्मचारी, आपको नमस्कार! ‘‘तपस्वी, तप के योग्य, ब्राह्मणों के रक्षक, विजयी, विश्वात्मा, जगत्कर्ता, सर्वव्यापी प्रभु, आपको बार-बार प्रणाम! शरणागतों के दुःख हरने वाले, भक्तवत्सल, सर्वत्र प्रकाशित तेजस्वी देव, आपको बार-बार नमस्कार!’’ पुलस्त्य मुनि कहते हैं—जब इस प्रकार देवों के देव हर की स्तुति हो रही थी, उस समय रघुकुलशिरोमणि राम उनके समक्ष विनम्रता से झुके हुए खड़े थे। तब रुद्र ने कहा, ‘‘राघव, तुम्हारा मंगल हो! जो भी तुम्हारे मन में है, कहो। निःसंदेह, तुम स्वयं नारायण हो, जो मानव रूप में प्रकट हुए हो। देवताओं के कार्य के लिए तुम्हारा अवतरण हुआ था और वह कार्य अब पूर्ण हो चुका है। अब, हे शत्रुनाशक, अपने धाम को लौट जाओ। ‘‘हे रघुवंशशिरोमणि, तुम्हारे द्वारा यह परम तीर्थ सेतु स्थापित हुआ है। जो मनुष्य यहाँ समुद्र के तट पर आकर इसे देखेंगे, उनके महान से महान पाप भी नष्ट हो जाएंगे—even ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी। केवल दर्शनमात्र से ही पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। अब, हे श्रेष्ठ रघुकुलनायक, गंगा के तट पर वामन की स्थापना करो। ‘‘पृथ्वी पर आठ भागों में स्थापना कर, फिर अपने स्थान—श्वेतद्वीप—को जाओ। हे देव, तुम्हें मेरा प्रणाम!’’ इसके बाद राम ने विनम्रता से प्रणाम किया और पवित्र पुष्कर क्षेत्र पहुँचे, किंतु वहाँ दिव्य पुष्पक विमान आकाश में ऊपर नहीं उठा। वह किसी अदृश्य घेरे में रुक गया। राम ने हनुमान से कहा, ‘‘यह विमान बिना सहारे आकाश में क्यों रुक गया है? अवश्य कोई कारण है, जाकर देखो।’’ राम की आज्ञा पाकर सुग्रीव पृथ्वी पर उतरे और देखा कि स्वयं ब्रह्मा देवता, सिद्धों और ऋषियों के साथ वहाँ उपस्थित हैं। वे समस्त लोकों के पितामह, चारों वेदों और ब्रह्मर्षियों से घिरे हुए थे। सुग्रीव ने उन्हें देखा और राम के पास लौटकर बताया। तब राम, स्वर्णमय पुष्पक से उतरकर, विनम्रता से ब्रह्मा—विरिंचि—के समीप गए, जो गायत्री के साथ वहाँ खड़े थे। राम ने अष्टांग प्रणाम कर, पाँच अंगों से भूमि को स्पर्श किया और अत्यंत विनम्र होकर देवों के देव ब्रह्मा की स्तुति की। राम बोले, ‘‘मैं उन सृष्टिकर्ता को प्रणाम करता हूँ, जो प्रजापतियों और देवताओं द्वारा पूजित हैं; देवों के स्वामी, लोकों के स्वामी, प्राणियों के स्वामी, जगत्पति। आपको बार-बार प्रणाम, जो देवताओं और दैत्यों दोनों द्वारा पूजित हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी, सिंह के समान ताम्रनेत्र वाले प्रभु! ‘‘आप बालरूपधारी, वृद्धरूपधारी, मृगचर्मवस्त्रधारी, मृगचर्मासनस्थ, त्रैलोक्यनाथ, उद्धारकर्ता, देवस्वरूप हैं। आप हिरण्यगर्भ, कमलज, वेदों के मूल, स्मृति देने वाले, महाकुशल, महाकमलधारी, महादण्डधारी और यज्ञोपवीतधारी हैं। ‘‘आप काल हैं, कालस्वरूप, नीलकण्ठ, श्रेष्ठ ज्ञानी, वेदकर्ता, सनातन बालक, अजर-अमर, प्रजापतियों के अधिपति। आप कुशधारी, हंसध्वज, सृष्टिकर्ता, संहारकर्ता, हरि, जटाधारी, मुंडित, शिखी, दण्डधारी, गदाधारी, महायशस्वी हैं। ‘‘आप प्रजापतियों के स्वामी, देवों के अधीक्षक, सबके आत्मा, समर्थ, सर्वव्यापी, सर्वग्राही, सृष्टिकर्ता, अविनाशी गुरु हैं। आप कमण्डलु, अर्घ्यपात्र, यज्ञोपकरण धारण करने वाले, यज्ञ में आह्वान और पूजन के योग्य, ओंकारस्वरूप, ज्येष्ठसाम के श्रेष्ठ गायक हैं। ‘‘आप मृत्यु और अमरत्व दोनों हैं, परियात्र पर्वतवासी, श्रेष्ठ व्रती, ब्रह्मचारी, व्रतधारी, गुहावासी, कमलनयन। आप अमर, मनोहर रूपवाले, उदित सूर्य के समान, दोनों ओर पत्नियों से सेवित हैं। ‘‘आप भिक्षु, याचक, त्रिजटा, धैर्यवान, मन के गमन के नियंत्रक, स्वयं काम, मधुर, भ्रमर के समान हैं। आप वनवासी, तपस्वी, पूज्य, जगत के पालनकर्ता और सृष्टिकर्ता, सनातन, अचल पुरुष हैं। ‘‘आप धर्म के अधीक्षक, एक नेत्र वाले, त्रैगुण्य धर्म के धारक, प्रजाओं के पोषक, त्रैवेद्य, अनेक रूपधारी, दस हजार सूर्य के समान प्रकाशमान हैं। आप मोहक, बंधनकर्ता, विशेषतः असुरों के, देवों के देव, पद्मचिह्नधारी, त्रिनेत्री, कमल के समान केशधारी हैं।’’ इस प्रकार राम ने भगवान ब्रह्मा की महान श्रद्धा से स्तुति की।