वे महान् ऋषि राघव के निवास स्थान पर पहुँचे। अगस्त्य मुनि के आदेश से द्वारपाल ने शीघ्रता से श्रीराम को उनके आगमन का समाचार दिया। द्वारपाल ने ऋषियों के आगमन की सूचना देते हुए, श्रीराम को देखा—मानो पूर्णिमा का चंद्रमा उदित हुआ हो। उसने कहा, ‘‘कौसल्या पुत्र, आपके लिए शुभ हो; आज का प्रभात अत्यंत मंगलमय है। रघुनंदन के दर्शन के लिए ये महात्मा पधारे हैं।’’ द्वारपाल ने आगे कहा, ‘‘राजन! अगस्त्य मुनि अन्य ऋषियों के साथ द्वार पर उपस्थित हैं।’’ यह सुनकर श्रीराम, जो सूर्य के समान तेजस्वी थे, स्वयं आगे बढ़े और उन ऋषियों के स्वागत के लिए तत्पर हुए। उन्होंने द्वारपाल से कहा, ‘‘तुमने इन महान् ऋषियों को द्वार पर क्यों रोका? शीघ्र उन्हें भीतर ले आओ।’’ श्रीराम के आदेश पर द्वारपाल ने उन ऋषियों को सम्मानपूर्वक भीतर प्रवेश कराया। ऋषियों के आगमन पर श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया। फिर उन्होंने आदरपूर्वक उन्हें सुंदर, स्वर्णमय और सुखद आसनों पर बैठाया। श्रेष्ठ ऋषि कुशा से सुशोभित आसनों पर विराजमान हुए। उनके पूज्य पुरोहित ने उनके लिए पाद्य, आचमनीय जल और अर्घ्य की व्यवस्था की। श्रीराम ने ऋषियों की कुशलक्षेम पूछी। वे सभी वेदज्ञ महर्षि बोले, ‘‘रघुनंदन, सब कुशल है। सौभाग्य से हम आपको शत्रुओं का वध कर सुरक्षित देख रहे हैं। सीता का हरण उस पापी रावण ने किया था, परंतु हे रघुकुल शिरोमणि, उसकी मृत्यु उसी के पाप और आपके पराक्रम से हुई। आपने अकेले ही उसका वध किया—ऐसा कार्य कोई अन्य नहीं कर सकता था।’’ ऋषियों ने आगे कहा, ‘‘हम आपके दर्शन एवं संवाद के लिए आए थे। आपको देखकर, हे राजन, हम सब तपस्वी धन्य हुए। रावण का वध कर आपने आज संसार से आँसू मिटा दिए; आपने इस पावन पृथ्वी को निर्भयता का वरदान दिया है। सौभाग्य से, हे ककुत्स्थ, आप विजय और अपार पराक्रम से संपन्न हैं। हमने आपको देखा, संवाद किया, अब हम अपने आश्रमों को लौटेंगे।’’ अगस्त्य मुनि ने स्मरण दिलाया, ‘‘जब आप वन में गए थे, तब मैंने आपको इंद्रधनुष, दो अक्षय तूणीर और महान कवच सौंपा था। हे रघुनायक, आपको पुनः मेरे आश्रम में आना चाहिए।’’ ऐसा कहकर वे सभी ऋषि अदृश्य हो गए। ऋषियों के प्रस्थान के बाद धर्मनिष्ठ श्रीराम मन ही मन विचार करने लगे कि मुनि ने उनके लिए कौन-सा कार्य इंगित किया है। वे सोचने लगे, ‘‘मुझे अवश्य ही अगस्त्य मुनि के आश्रम में पुनः जाना चाहिए और उनके मुख से दिव्य रहस्य एवं अन्य कर्तव्य सुनने चाहिए।’’ श्रीराम ने निश्चय किया, ‘‘मैं अवश्य धर्म का पालन करूँगा, क्योंकि धर्म ही परम लक्ष्य है।’’ इसी प्रकार, श्रीराम ने दस हज़ार वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य किया। वे दान देते, यज्ञ-अनुष्ठान करते और प्रजाजनों की रक्षा करते हुए समय बिताते, मानो एक ही वर्ष बीत गया हो। इसी दिन एक वृद्ध ब्राह्मण अपने मृत पुत्र को लेकर गाँव से श्रीराम के द्वार पर आया। वह करुण स्वर में बोला, ‘‘मेरे पुत्र ने पूर्व जन्म में कौन-सा पाप किया था? मैं तो एकमात्र पुत्र का पिता हूँ, फिर भी मुझे उसे बाल्यावस्था में मृत्यु को प्राप्त होते देखना पड़ा—वह तो अभी पाँच वर्ष का ही था, युवावस्था तक भी नहीं पहुँचा।’’ ब्राह्मण ने विलाप किया, ‘‘मेरा छोटा पुत्र समय से पूर्व ही चला गया। उसने पितृ-श्राद्ध भी नहीं किया और यमलोक चला गया। यह निश्चय ही श्रीराम के किसी दोष के कारण हुआ है। बालक, ब्राह्मण या स्त्री की मृत्यु से रघुकुल का सर्वनाश हो जाता है। यदि मैं मर जाऊँ, तो श्रीराम और उनकी पत्नी का भी अंत निश्चित है।’’ श्रीराम ने यह सब सुनकर गहन शोक में डूब गए। उन्होंने ब्राह्मण को शांत किया और वशिष्ठ से पूछा, ‘‘अब मुझे क्या करना चाहिए? ऐसी स्थिति में मेरा कर्तव्य क्या है?’’ श्रीराम ने कहा, ‘‘मैं अपने प्राण अग्नि में अर्पित कर दूँगा या पर्वत से कूद जाऊँगा; ब्राह्मण के इन वचनों को सुनकर मैं कैसे शुद्धि प्राप्त करूँ?’’ तभी वहाँ उपस्थित वशिष्ठ के समक्ष नारद जी ने श्रीराम को सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘हे राघव, सुनो—बालकों की मृत्यु का कारण कैसे हुआ। पहले सतयुग में ब्राह्मण ही प्रधान थे; कोई अन्य तप नहीं करता था। उस समय सभी अमर और दीर्घायु थे।’’ ‘‘जब त्रेता युग आया, तब श्रेष्ठ ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग प्रभावशाली हुए। द्वापर में अधर्म का प्रवेश हुआ—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों में असत्य और अधर्म फैल गया। तीन भाग अधर्म और एक भाग धर्म रह गया।’’ ‘‘तब ब्राह्मणों के नेतृत्व में सभी वर्ण भयभीत हो उठे। पुनः धर्म का एक भाग और स्थापित हुआ। द्वापर में तपस्या वैश्य वर्ग में आई और तीनों युगों में धर्म का अंतर बना रहा।’’ ‘‘फिर जब यह वर्तमान और अंतिम कलियुग आया, हे पुरुषश्रेष्ठ, तब अधर्म और असत्य की वृद्धि हुई। कलियुग में शूद्र जाति में भी कठोर तपस्या होगी; आपके राज्य में भी ऐसी तपस्या होगी।’’ ‘‘एक दुष्टचित्त शूद्र ने तपस्या की, जिससे बालक की मृत्यु हुई। राजन, राज्य में जहाँ भी अधर्म या अनुचित कर्म होते हैं...