हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! 'शत्रुध्न' का यह सात-अक्षरीय मंत्र सभी इच्छित सिद्धियाँ प्रदान करता है। जो पुरुष इसे विधिपूर्वक पूजन करते हैं, वे अत्यंत फल प्राप्त करते हैं। इस मंत्र में 'ह', 'स', 'फ', 'आग्नि', 'निषाद', 'ईश'—ये बीजाक्षर बताए गए हैं। आगे 'वि', 'यद्', 'भृगु', 'अग्नि', 'मन' और 'बिंदु'—ये चौथे अक्षर के रूप में हैं। फिर 'मन', 'विंद', 'वाढ्य', 'ह', 'स'—ये छठे में 'ङेंतः' के साथ, और उसके बाद 'हनुमान' का उच्चारण होता है। 'रामचन्द्र' और 'मुनि' भी इसमें सम्मिलित हैं; इसकी छंद 'जगती' है। यह मंत्र छह बीजाक्षर और छह अंगों से युक्त है, जिन्हें सिर, ललाट, नेत्र और मुख पर स्थापित किया जाता है। ध्वज पर, दोनों घुटनों और दोनों पैरों पर रंगों को क्रमशः स्थापित करना चाहिए। फिर नाभि, जंघा, पिंडली और पैरों पर भी इन्हें क्रम से सजाना चाहिए। यह देवता उदित होते सूर्य के समान तेजस्वी हैं, जिनकी प्रभा से संसार में हलचल उत्पन्न होती है। ऐसे महाबलशाली मारुति, जो अपने गर्जन से दैत्यों को भयभीत करते हैं, उनका पूजन करना चाहिए। अर्घ्य, पाद्य आदि से उनका सत्कार करें और चावल, दूध तथा घृत से युक्त दशांश आहुति समर्पित करें। हनुमान जी राम के प्रति परम भक्त, अतुल तेजस्वी, वानरराज और अपार बलशाली हैं। वे दक्षिण दिशा के सूर्य हैं और समस्त विघ्नों का संहार करते हैं। इसके साथ ही सुग्रीव, अंगद, नील, जाम्बवान और नल का भी सम्मानपूर्वक पूजन करें। वज्र आदि का पूजन कर इस मंत्र की सिद्धि होती है। जो पुरुष यह अनुष्ठान करता है, उसके राजशत्रुजनित भय नष्ट हो जाते हैं। उसे चाहिए कि बाईस शुद्ध ब्रह्मचारी पुरोहितों को भोजन करवाए। शत्रु ग्रह और दैत्य तत्काल नष्ट हो जाते हैं। भूत-प्रेतजन्य ज्वर, अपस्मार और तंत्रादि दोष भी इन मंत्रों से दूर हो जाते हैं। तीन दिनों के भीतर ज्वर चला जाता है और साधक सुख प्राप्त करता है। सभी रोग नष्ट हो जाते हैं और उसी क्षण प्रसन्नता आती है। यदि कोई मंत्री युद्ध में जाता है तो शस्त्रों की भीड़ से बाधित नहीं होता। मंत्र का तीन बार उच्चारण कर स्पर्श करने से शस्त्र निष्क्रिय हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। सात दिन तक भस्म और कील के साथ मंत्र का प्रयोग करने से, जो आपस में शत्रुता रखते हैं, उनके शत्रु शीघ्र भाग जाते हैं। जिसको भी यह मंत्रयुक्त भोजन आदि दिया जाता है, वह व्यक्ति सेवकवत् हो जाता है। भोजनशाला से पात्र और करंज की जड़ लेकर, प्राण-प्रतिष्ठा कर, सिंदूर आदि से पूजन करें। तब ग्रह, तंत्र, रोग, अग्नि, विष, चोर या राजा से उत्पन्न कष्ट नष्ट हो जाते हैं। उस घर में धन, पुत्र आदि का निरंतर और दीर्घकालीन वृद्धि होती है। यदि शत्रु की मूर्ति बनाकर, उसका नाम हृदय में अंकित किया जाए और मंत्र के अंत में उसका नाम लेकर 'छेद! भेद!' का उच्चारण किया जाए, फिर दोनों हथेलियों के बीच दबाकर त्यागकर घर लौट आए, तो शत्रु का नाश होता है। खुले बाल, सरसों के दाने, नमक लेकर पितृवन में, उल्लू, कौआ, गिद्ध के पंख और कौए की आंख का मलबा लेकर सात दिन तक यह प्रयोग करें, तो अभिमानी शत्रु का विनाश संभव है। तब एक प्रेत प्रकट होता है, जो भविष्य में शुभ या अशुभ घटना की सूचना देता है। रात्रि में भस्म, जल और मंत्र का सहस्र बार जप करने से इच्छित फल सिद्ध होता है।