एक बार एक श्रद्धालु साधक ने उत्तम फल की प्राप्ति के लिए विधिपूर्वक यज्ञ का संकल्प लिया। उसने छः रसों से युक्त स्वादिष्ट पिंडों के साथ दो हज़ार आहुति समर्पित की। फिर, आचार्य ने दही-चावल में मिश्री मिलाकर दस हज़ार बार हवन किया। इसके बाद साधक बिल्व वृक्ष के समीप आसन ग्रहण कर कमल के अक्षरों से अलंकृत चावल अर्पित करता है। फिर वह एक लाख बार मीठे चावल का नैवेद्य समर्पित करता है। ऐसा करने से वह वाणी में बृहस्पति के समान प्रखर हो जाता है। जब वह उसी लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित करता है, तो उसे उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है। उस विधान में कमल के आठ सुंदर पंखुड़ियाँ और दमकते पुंकेसर होते हैं, जो मंत्राक्षरों के युग्म से बने हैं। उसके बाहर मातृका अक्षरों से बना मंडल पुरुष को समृद्धि प्रदान करता है। आचार्य दस हज़ार बार आहुति देता है, जिससे वह सर्वत्र विजयी बनता है। उसे सर्वलक्षणयुक्त निष्कंटक राज्य की प्राप्ति होती है। इच्छित फल के लिए वह दस हज़ार बार आहुति देता है और धनवान तथा आज्ञाकारी बन जाता है। सात दिन तक इस प्रकार पाठ करने से वह कठिन रोगों से मुक्त हो जाता है। अंत में 'सर्ववर्गेश्वर' और फिर 'ईश्वर' का उच्चारण करना चाहिए। यह मंत्र, तारा आदि द्वारा उद्घाटित, दो भागों में प्रतिष्ठित है। उपास्य देवता हैं हयग्रीव, जो वाणी के स्वामी और सिद्धिदाता हैं। उनका स्वरूप हिमगिरि के समान उज्ज्वल है और तुलसी की माला से विभूषित है। इस प्रकार ध्यान कर साधक को दस हज़ार बार मंत्र का जप करना चाहिए, फिर उसका दशांश हवन करना चाहिए। फिर विष्णु की मूर्ति की, जो मूल में स्थित है, आसन पर पूजा करनी चाहिए। उसके साथ सनंदन, सनक, श्री और पृथ्वी की भी उपासना करें। निरुक्त और ज्योतिष के बाद व्याकरण की पूजा करें। फिर आठ पंखुड़ियों वाले कमल के मूल में आठ माताओं की पूजा करें। इसके बाद पंखुड़ियों के छोर पर आठ भैरवों की पूजा करें—बटुक, कालदमन, दन्तुरा, विकट, शंख, चक्र, गदा, पद्म, नंदक, शारंग, वज्र आदि। उनके बाहर योगिनियाँ, जो प्रकटादि हैं, एकत्र विराजती हैं। उनके बाहर आठ पर्वत और फिर तारागण स्थित हैं। इस विधि से साधक वाणी में वागीश्वर के समान और धन में कुबेर के समान हो जाता है। एक हज़ार आठ बार शुद्ध जल को मंत्र से अभिमंत्रित करना चाहिए। यहां तक कि जो मनुष्य जन्म से मूक हो, वह भी वाणी की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। चंद्र या सूर्यग्रहण के समय उसे उस जल को स्वर्णपात्र में डालना चाहिए। जल के स्पर्श से लेकर अंत तक श्रद्धापूर्वक मंत्र का जप करना चाहिए। ज्योतिष्मती लता के बीज को प्रतिदिन एक-एक कर बढ़ाना चाहिए। तब साधक पृथ्वी पर साक्षात सरस्वती का अवतार बन जाता है। वह समस्त वेद, आगम और शास्त्रों का मर्मज्ञ व्याख्याता बन जाता है। जिसकी पूजा से साधारण मनुष्य भी संसार-सागर को पार कर जाते हैं, उसी की यह साधना है। गणपति, सौर, शक्त और शैव विधियों में ये सभी इच्छित फल प्रदान करती हैं। गणपति आदि अन्य मंत्रों की तुलना में ये करोड़ों गुना अधिक प्रभावशाली हैं। यह श्रीराम के लिए महापापों का नाश करने वाली अंतरतम रहस्य है। ब्रह्महत्या जैसे हज़ारों ज्ञात-अज्ञात महापाप और करोड़ों लघु पाप भी इससे नष्ट हो जाते हैं।