महर्षि ने मंत्रों के विविध स्वरूपों और उनके गुण-अवगुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उन्होंने समझाया कि कुछ मंत्र ऐसे होते हैं जिनमें न तो कोई विधिवत अनुष्ठान होता है, न ही उनमें दृष्टि (नेत्र) होती है, वे बंधे हुए या जड़वत् होते हैं। कुछ मंत्र टूटे हुए, सुप्त, मदमस्त, विक्षिप्त या मूर्छित स्थिति में पाए जाते हैं। कोई मंत्र बालक के समान, कोई युवा, कोई परिपक्व, कोई वृद्ध या कोई शस्त्रहीन की तरह होता है। कुछ मंत्र प्राणहीन, कंठहीन, बीजरहित या कांपते हुए होते हैं। कई मंत्र ऐसे होते हैं जिनमें अंग नहीं होते, वे अत्यंत क्रोधित, अति निर्दयी या लज्जित रूप में भी प्रकट होते हैं। कुछ मंत्र अत्यधिक वृद्ध, स्नेहरहित या पुनः दुःख से पीड़ित रहते हैं। कोई मंत्र संयुक्त, पृथक् या त्रैगुण्ययुक्त—ध्वनि के साथ—हो सकता है। चार या पाँच प्रकार से जब मंत्र विकृत होता है, तो उसे 'भ्रष्ट' (टूटा हुआ) कहा जाता है। यदि कोई मंत्र अवरुद्ध हो जाए तो वह बहुत कठिनाई से ही सिद्धि देता है। जो मंत्र शक्तिहीन है, वह बहुत समय बाद फल देता है। जो मंत्र विमुख हो गया है, वह उपासकों को भी देर से ही सिद्धि देता है। 'बधिर' मंत्र बहुत कठिनाई से अल्प फल देता है। 'नेत्रहीन' मंत्र तो कठिन प्रयास से भी सिद्धि नहीं देता। मंत्र के स्वरूप में 'हंस', 'इन्दु', 'स' या 'फट्' अथवा कवच के साथ—ऐसे विशेष रूप पाए जाते हैं। कुछ मंत्रों के मध्य में, या शीर्ष पर, 'ल' और 'क' नहीं होते। अग्नि और वायु का संयोग मनु के मंत्र के शीर्ष पर माना गया है। दो, तीन, छह या आठ अक्षरों वाले मंत्रों में 'विदारण' (आंसू/विच्छेद) देखा जाता है। 'ह' अक्षर शक्ति का प्रतीक है, अन्यथा मंत्र भयावह हो जाता है। जो मंत्र अपवित्र है, वह भी बहुत कठिनाई से ही सिद्धि देता है। यदि मंत्र में विदारण हो, तो उसे छिपकर जपना चाहिए। यदि मंत्र टूटा हुआ हो, तो उसे त्याग देना चाहिए क्योंकि वह अशुभ फल देता है। चाहे वह कोई विद्या हो या मंत्र, यदि उसमें सत्रह अक्षर हों और बीच में विदारण हो, तो वह मंत्र क्षीण या मंद हो जाता है। मंत्र के आरंभ, मध्य और शीर्ष पर चार विदारण हो सकते हैं। बीस अक्षरों वाला मंत्र, जो इच्छा से संयुक्त हो, भी वर्णित है। सात अक्षरों वाला मंत्र 'बाल-मंत्र', आठ अक्षरों वाला 'युवक-मंत्र' कहा गया है। तीस, चौंसठ और सौ अक्षरों वाले मंत्र भी होते हैं। नौ अक्षरों का मंत्र, 'त' से संयुक्त, 'तीसगुणित' कहलाता है। जिस मंत्र के अंत में शिखा, कवच, नेत्र और विदारण हों, वह विशेष माना गया है। आरंभ, मध्य और अंत में 'फट्' छह बार आता है। एकाक्षरी 'कूट' मंत्र अविभाज्य माना गया है। छह अक्षरों वाला, बीजरहित या साढ़े सात अक्षरों वाला मंत्र भी होता है। डेढ़ बीज और तीन बीज से युक्त बीस अक्षरों वाला मंत्र भी होता है। जिस मंत्र के अक्षर दंत्य (दांत से उच्चरित) हों, वह मंत्र भ्रमित माना जाता है। ऐसा मंत्र 'भूखा' है, उसमें मंत्रशक्ति की सिद्धि नहीं होती। तेईस अक्षरों वाला मंत्र 'अहंकारी' कहलाता है। उनतीस अक्षरों वाला मंत्र 'अंगहीन' माना गया है। ऐसा मंत्र अत्यंत क्रूर होता है और सभी अनुष्ठानों में निंदित है। वह लज्जित माना गया है और किसी भी अनुष्ठान के लिए उपयुक्त नहीं है। अंत में, महर्षि कहते हैं कि पैंसठ अक्षरों से लेकर नौ अक्षरों तक के आनंददायक मंत्रों का भी विधान है। इस प्रकार, मंत्रों के विविध स्वरूप, उनके गुण-दोष और सिद्धि-असिद्धि के रहस्य विस्तार से बताए गए।