काव्य जब अत्यंत तपस्या के कारण दुःखी, दुर्बल और क्षीण हो गए, फिर भी वे अपने स्वरूप में दृढ़, ध्यान में लीन और महिमा में प्रतिष्ठित थे। उस समय, उनकी पत्नी ने अपने पिता के निर्देशानुसार काव्य की सेवा करना आरंभ किया। वह मधुर वचनों से उनकी प्रशंसा करती, समयानुसार कोमल स्पर्श और सुख-सुविधाओं से उनकी देखभाल करती, और उनके व्रत के अनुसार सभी अनुष्ठान पूरी श्रद्धा से निभाती रही। इस प्रकार, उसने अनेक वर्षों तक काव्य की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया। अंततः, जब धुएँ का वह भयानक व्रत सहस्र वर्षों के बाद पूर्ण हुआ, तब काव्य अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी पत्नी को इच्छित वरदान देने का प्रस्ताव किया। उन्होंने कहा, ‘‘यह व्रत केवल तुमने ही किया है, अन्य किसी ने नहीं। अतः तुम्हारे तप, ज्ञान, विद्या, बल और ऊर्जा के कारण, तुम समस्त देवताओं से श्रेष्ठ हो जाओगी। हे ब्राह्मण, हे भृगुपुत्र, जो भी तुम चाहो, वह सब तुम्हारे लिए सुलभ है।’’ काव्य ने आगे कहा, ‘‘तुम्हें जो भी चाहिए, वह सब तुम्हें प्राप्त होगा, किंतु इसे किसी से प्रकट मत करना। इस प्रकार, तुम सब पर श्रेष्ठता प्राप्त करोगी, हे द्विजश्रेष्ठ।’’ इन वरदानों को देकर भगवान भव ने भृगुपुत्र काव्य को प्रजापति, धनपति और अभेद्यता का सामर्थ्य भी प्रदान किया। ये दिव्य वरदान पाकर काव्य अत्यंत प्रसन्न हुए और हर्षित होकर उन्होंने महेश्वर की स्तुति करते हुए, नीले-लाल वर्ण वाले भगवान की पार्श्व से खड़े होकर एक दिव्य स्तोत्र अर्पित किया। काव्य ने कहा, ‘‘शितिकंठ को प्रणाम, जो सबसे छोटे, तेजस्वी, चाटने वाले, काव्यों के ऋषि, संवत्सर, सोम के स्वामी हैं। जटाजूटधारी, उग्र, ताम्रनेत्र, वरदाता, स्तुत्य, पावन, देवाधिदेव, शीघ्रगामी—आपको नमस्कार है।’’ ‘‘पगड़ीधारी, सुंदरमुख, अनेक रूपों वाले, सृष्टिकर्ता, धनबीजस्वरूप, रुद्र, तपस्वी, विविध वस्त्रधारी—आपको प्रणाम है। छोटे, खुले केश, सेनापति, लालवर्ण, मुनि, राजवृक्ष, सर्पप्रिय—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘सहस्त्रशीर्ष, सहस्त्रनेत्र, उदार, वरदाता, शुभवपु, श्वेत, पुरुष—आपको प्रणाम है। पर्वतराज, सूर्य, बलवान, घृतपायी, संतुष्ट, उत्तमवस्त्रधारी, धनुर्धर, भर्ग—आपको नमस्कार है।’’ ‘‘खड्गधारी, तारा, सुंदरनेत्र, तपस्वी, ताम्रवर्ण, भयानक, उग्र, मंगलकारी—आपको नमस्कार है। महादेव, शर्व, विश्वरूप, शुभ, सुवर्ण, श्रेष्ठ, ज्येष्ठ, मध्य—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘गृहपति, पिनाकधारी, मोक्षक, एकाकी, मृगयुव, कुशल, स्थिर, भयानक—आपको प्रणाम है। बहुनेत्र, धारक, त्रिनयन, कपालधारी, वीर, मृत्यु, त्रिनेत्रधारी—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘कपिल, चित्र, रोहित, रक्त, पिनाकधारी, शीघ्रगामी, विविधवर्ण, रक्त—आपको प्रणाम है। डमरू, एकपाद, अजात, ज्ञानदाता, वनचारी, गृहस्थ, तपस्वी, ब्रह्मचारी—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘सांख्य, योग, सर्वव्यापी, दीक्षित, अनाहत, शर्व, शुभपति, यम—आपको प्रणाम है। संयमी, ज्ञानी, ब्राह्मणश्रेष्ठ, महर्षि, चतुष्पद, शुद्ध, रक्षक, तीव्रगामी—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘शिखी, उग्र, दंष्ट्रधारी, सृष्टिकर्ता, दीप्तिमान, प्रसिद्ध, प्रज्वलित, ज्ञानी—आपको प्रणाम है। क्रूर, अचल, भयानक, शुभ, सौम्य, प्रधान, धर्मनिष्ठ, पुण्यात्मा—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘आपको प्रणाम, जो अभेद्य, अमर, शाश्वत, नित्य, सदा व्यस्त, विशिष्ट, भारतों के साक्षी हैं। रक्षक, धैर्यवान, सत्यवादी, अमर, कर्ता, फरधारी, त्रिशूलधारी, दिव्यदृष्टि—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘सोमपायी, हविप्रदाता, धूम और तापभक्षक, शुद्ध, वस्त्रधारी, तत्क्षणजन्मा, मृत्यु—आपको प्रणाम है। मांसभक्षी, सर्वव्यापक, मेघ, विद्युत, निवृत्त, श्रेष्ठ, परिपूर्ण, तारकेश—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘त्रिपुरांतक, तीर्थ, वक्र, केशी, तीक्ष्णास्त्रधारी, व्याख्याता, सिद्ध, पुलस्त्य—आपको प्रणाम है। दीप्तिमान, उग्र, प्रचुर, वृषभ, व्रती, युक्त, शुद्ध, ऊर्ध्वबीज—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘असुरनाशक, श्वननाशक, मृत्युनाशक, यज्ञयोग्य, ज्वलंत, ज्ञानी, अग्नि, निर्मल—आपको प्रणाम है। असुरनाशक, पशुनाशक, विघ्नहर्ता, प्राण, विचरणशील, महत्, सागर, दुर्गम—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘कृष्ण, विजयी, लोकपति, निरपेक्ष, वेधनीय, समभावस्थ—आपको प्रणाम है। सुवर्णबाहु, सर्वव्यापी, महान, सुकर्मी, अजेय, स्वामी, शुभदृष्टि—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘तीक्ष्णबाण, सदा अश्वारूढ़, शुभ, मोक्षदाता, ताम्र, कपिल, महादेव, ज्ञानी—आपको प्रणाम है। महाकाय, दीप्तिमान, रुदनकारक, साथी, दृढ़धनुष, कवचधारी, सारथी, गणपति—आपको प्रणाम है।’’ ‘‘भृगुपति, शुक्र, गुहावासी, सृष्टिकर्ता, अच्युत, शांत, ज्ञानी, वृषभ—आपको प्रणाम है। हे प्रभो, जो सर्वस्वरूप, चर्मधारी, पशुपति, प्रजापति हैं—आपको नमस्कार है।’’ ‘‘ॐकार, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, स्वाहा, स्वधा, वषट् स्वरूप, मंत्रस्वरूप—आपको नमस्कार है।’’ ‘‘विधाता, धारक, कर्ता, दृष्टि-श्रवणमय, भूत-भविष्यत- वर्तमान के स्वामी, कर्मस्वरूप—आपको नमस्कार है।’’ इस प्रकार, काव्य ने भगवान महेश्वर की विविध रूपों में, विविध नामों से, हृदय से स्तुति की और अपने हर्ष और कृतज्ञता को प्रकट किया।