नरके पच्यमानस्तु यमेन परिभाषितः । किन्त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः ॥ १,२२९.
नरक में यम द्वारा तड़पाए जाते समय उससे कहा जाता है—'तूने केशव, जो कष्ट हरने वाले हैं, की पूजा क्यों नहीं की?'
उदकेनाप्यभावेन द्रव्याणामर्चितः प्रभुः । यो ददाति स्वकं लोकं स त्वया किं न चार्चितः ॥ १,२२९.
केवल जल से या अन्य वस्तुओं के अभाव में भी प्रभु की पूजा हो जाती है; जो अपना लोक देने वाले हैं, उन्हें तूने क्यों नहीं पूजा?
न तत्करोति सा माता न पिता नापि बान्धवः । यत्करोति हृषीकेशः सन्तुष्टः श्रद्धयार्चितः ॥ १,२२९.
माँ, पिता या कोई संबंधी वह नहीं कर सकता जो हृषीकेश, श्रद्धा से पूजे जाने पर, प्रसन्न होकर करता है।
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान् । विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः ॥ १,२२९.
जो मनुष्य अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार आचरण करता है, वही परम पुरुष विष्णु की पूजा करता है; और कोई मार्ग तुष्टि देने वाला नहीं है।
न दानैर्विविधैर्दत्तैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः । तोषमेति महात्मासौ यथा भक्त्या जनार्दनः ॥ १,२२९.
विविध दान, फूलों या चंदन-लेपन से वह महान आत्मा जनार्दन उतना प्रसन्न नहीं होते, जितना भक्ति से होते हैं।
सम्पदैश्वर्यमाहात्म्यैः सन्तत्या न च कर्मणा । विमुक्तैश्चैकता लभ्या मूलमाराधनं हरेः ॥ १,२२९.
धन, ऐश्वर्य, महिमा, संतान, कर्म या यहाँ तक कि मुक्ति भी, हरि की पूजा से मिलने वाली एकता को नहीं दे सकते।
श्रीगरुडमहापुराणम् २३० सूत उवाच । आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥ १,२३०.
सूत ने कहा— सब शास्त्रों को देखकर और बार-बार विचार कर यही निष्कर्ष निकला है कि सदा नारायण का ही ध्यान करना चाहिए।
किं तस्य दानैः किन्तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः । यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः ॥ १,२३०.
जो मनुष्य बिना किसी और विचार के सदा नारायण का ध्यान करता है, उसे दान, तीर्थ, तप या यज्ञ की क्या आवश्यकता है?
षष्टिस्तीर्थसहस्राणि षष्टिस्तीर्थशतानि च । नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ १,२३०.
साठ हजार तीर्थ और साठ सौ तीर्थ भी नारायण को प्रणाम करने के सोलहवें हिस्से के बराबर भी नहीं हैं।
प्रयश्चित्तान्यशेषाणि तपः कर्माणि यानि वै । विद्धि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम् ॥ १,२३०.
सभी प्रायश्चित्त, तप और कर्मों में, जान लो कि श्रीकृष्ण का स्मरण सबसे श्रेष्ठ है।
कृतपापेऽनुरक्तिश्च यस्य पुंसः प्रजायते । प्रायश्चित्तन्तु तस्यैकं हरेः संस्मरणं परम् ॥ १,२३०.
जिस मनुष्य का मन पाप में आसक्त हो गया है, उसके लिए एकमात्र सर्वोत्तम प्रायश्चित्त हरि का स्मरण ही है।
मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः । सोऽपि स्वर्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः ॥ १,२३०.
जो मनुष्य एक क्षण भी बिना विचलित हुए नारायण का ध्यान करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त कर लेता है— फिर जो पूरी तरह उन्हीं में लीन है, उसका क्या कहना।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु योगस्थस्य च योगिनः । या काचिन्मनसो वृत्तिः सा भवत्यच्युताश्रयात् ॥ १,२३०.
जो योगी योग में स्थित है, उसके लिए जाग्रत, स्वप्न या गहरी नींद में मन की जो भी वृत्ति होती है, वह सब अच्युत में ही स्थित हो जाती है।
उत्तिष्ठन्निपतन्विष्णुं प्रलपन्विविशंस्तथा । भुञ्जञ्जाग्रच्च गोविन्दं माधवं यश्च संस्मरेत् ॥ १,२३०.
जो उठते, लेटते, बोलते, घर में प्रवेश करते, खाते या जागते समय गोविंद या माधव का स्मरण करता है—
स्वेस्वे कर्मण्यभिरतः कुर्याच्चित्तं जनार्दने । एषा शास्त्रानुसारोक्तिः किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥ १,२३०.
जो अपने-अपने कर्म में लगे रहते हुए भी मन को जनार्दन में लगाता है, वही शास्त्र का सार है— और अधिक शब्दों की क्या आवश्यकता है?
ध्यानमेव परो धर्मो ध्यानमेव परं तपः । ध्यानमेव परं शौचं तस्माद्ध्यानपरो भवेत् ॥ १,२३०.
ध्यान ही सबसे बड़ा धर्म है, ध्यान ही सबसे बड़ा तप है, ध्यान ही सबसे बड़ी पवित्रता है; इसलिए मनुष्य को ध्यान में ही लगे रहना चाहिए।
नास्ति विष्णोः परं ध्थेयं तपो नानशनात्परम् । तस्मात्प्रधानमत्रोक्तं वासुदेवस्य चिन्तनम् ॥ १,२३०.
विष्णु से बढ़कर कोई ध्यान का विषय नहीं है, उपवास से बड़ा कोई तप नहीं है; इसलिए यहाँ मुख्य बात वासुदेव का चिंतन ही बताई गई है।
यद्दुर्लभं परं प्राप्यं मनसो यन्न गोचरम् । तदप्यप्रार्थितं ध्यातो ददाति मधुसूदनः ॥ १,२३०.
जो वस्तु दुर्लभ, परम और मन की पहुँच से बाहर है, वह भी बिना माँगे, जो ध्यान करता है उसे मधुसूदन दे देते हैं।
प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् । स्मरणादेव तद्विष्णोः संपूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥ १,२३०.
यदि कोई भूल से यज्ञ या कर्म में गलती कर बैठे, तो श्रुति कहती है कि केवल विष्णु का स्मरण करने से वह पूरा हो जाता है।
ध्यानेन सदृशो नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् । आगामिदेहहेतूनां दाहको योगपावकः ॥ १,२३०.
पाप कर्मों को शुद्ध करने के लिए ध्यान के समान कोई उपाय नहीं है; योग की अग्नि भविष्य के शरीर के कारणों को भी जला देती है।
विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिमत्रैव जन्मनि । प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मा च योऽचिरात् ॥ १,२३०.
जिस योगी का समाधि सिद्ध हो गया है और जिसके कर्म योगाग्नि में जल गए हैं, वह इसी जन्म में शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
यथाग्निरुद्यतशिखः कक्षं दहति वानिलः । तथा चित्तस्थिते विष्णौ योगिना सर्वकिल्बिषम् ॥ १,२३०.
जैसे प्रज्वलित अग्नि जंगल को जला देती है, वैसे ही जब योगी का मन विष्णु में स्थित हो जाता है, तो उसके सारे पाप भस्म हो जाते हैं।
यथाग्नियोगात्कनकममलं संप्रजायते । संप्लुष्टो वासुदेवेन मनुष्याणां सदा मलः ॥ १,२३०.
जिस तरह आग में पड़कर सोना शुद्ध हो जाता है, वैसे ही वासुदेव के द्वारा मनुष्यों का पाप भी सदा जलकर नष्ट हो जाता है।
गङ्गास्नानसहस्रेषु पुष्करस्नानकोटिषु । यत्पापं निलययाति स्मृते नश्यति तद्धरौ ॥ १,२३०.
गंगा में हजार बार स्नान करने या पुष्कर में करोड़ों बार डुबकी लगाने पर भी जो पाप नहीं जाता, वह हरि का स्मरण करते ही मिट जाता है।
प्राणायामसहस्नैस्तु यत्पापं नश्यति ध्रुवम् । क्षणमात्रेण तत्पापं हरेर्ध्यानात्प्रणश्यति ॥ १,२३०.
हजार प्राणायाम करने से जो पाप निश्चित रूप से नष्ट होता है, वह पाप हरि का ध्यान करने से एक ही क्षण में समाप्त हो जाता है।
कलिप्रभावाद्दुष्टोक्तिः पाषण्डानां तथोक्तयः । न क्रामेन्मानसं तस्य यस्य चेतसि केशवः ॥ १,२३०.
कलियुग के प्रभाव से पाखंडियों की बुरी बातें और उनकी शिक्षा, उस व्यक्ति के मन को छू भी नहीं सकती, जिसके हृदय में केशव बसते हैं।
सा तिथिस्तदहोरात्रं स योगः स च चन्द्रमाः । लग्नं तदेव विख्यातं यत्र संस्मर्यते हरिः ॥ १,२३०.
जिस दिन, जिस रात, जिस योग या जिस चंद्रमा में हरि का स्मरण होता है, वही तिथि, वही रात, वही योग, वही चंद्रमा और वही लग्न सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं।
सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चार्थजडमूकता । चन्मुहूर्तं क्षणो वापि वासुदेवो न चिन्त्यते ॥ १,२३०.
जिस घड़ी या पल वासुदेव का चिंतन नहीं किया जाता, वही सबसे बड़ी हानि है, वही बड़ा दोष है, और वही धन के प्रति जड़ता और मूर्खता है।
कलौ कृत युगं तस्य कलिस्तस्य कृते युगे । हृदि नो यस्य गोविन्दो यस्य चेतसि नाच्युतः ॥ १,२३०.
जिसके हृदय में गोविंद नहीं हैं, जिसके मन में अच्युत नहीं हैं, उसके लिए कलियुग भी सतयुग जैसा और सतयुग भी कलियुग जैसा हो जाता है।
यस्याग्रतस्तथा पृष्ठे गच्छतस्तिष्ठतोऽपि वा । गोविन्दे नियतं चेतः कृतकृत्यः सदैव सः ॥ १,२३०.
जो व्यक्ति चलते, फिरते, आगे-पीछे या खड़े रहते हुए भी सदा गोविंद में मन लगाए रहता है, उसने अपने सभी कर्तव्य पूरे कर लिए हैं।