पुष्पं धवलगुञ्जाया गृहीतं मूलमेव च । मुखे तु निहितं रुद्र हरेन्नानाविषं बहु ॥ १,१८९.
अगर सफेद गुंजा का फूल और उसकी जड़ लेकर मुँह में रखा जाए, हे रुद्र, तो वह तरह-तरह के विषों को दूर कर देता है।
हस्ते बद्धं काण्डयुक्तं कण्ठे बद्धं ग्रहादिहृत् । कृष्णायान्तु चतुर्दश्यां कटिबद्धं समाहृतम् । सिंहादिश्वापदाद्भीतिं हरेच्च नीललोहित ॥ १,१८९.
अगर उसकी डंडी सहित डोरी बनाकर हाथ में बाँधी जाए या गले में पहनी जाए, तो ग्रहों के दोष दूर हो जाते हैं; और कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को कमर में बाँधने से, हे नीललोहित, शेर आदि जंगली जानवरों का डर भी मिट जाता है।
विष्णुक्रान्तामूलमीश कर्णबद्धन्तु धारयेत् । पट्टसूत्रेण भूतेश मकरादिभयं न वै ॥ १,१८९.
हे भूतों के स्वामी, विष्णुक्रान्ता की जड़ कपड़े की डोरी से कान में बाँधने से मगर और अन्य जीवों का डर नहीं रहता।
श्रीगरुडमहापुराणम् १९० हरिरुवाच । अपराजिताया मूलञ्च गोमूत्रेण समन्वितम् । पीतञ्चाशु हरत्येव गण्डमालां न संशयः ॥ १,१९०.
श्रीहरि बोले: अपराजिता की जड़ को गौमूत्र के साथ मिलाकर पीने से गंडमाला जल्दी ही ठीक हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं।
अथेन्द्रवारुणीमूलं विधिना पीतमीश्वर । जिङ्गिण्यैरण्डकं रुद्र शूकशिम्ब्या समन्वितम् । शीतोदकञ्च तत्र्यस्तं बाहुग्रीवाव्यथां हरेत् ॥ १,१९०.
हे ईश्वर, इन्द्रवारुणी की जड़ को विधि से लेकर जिंगिणी, एरण्ड, शूक और शिम्बी के साथ ठंडे पानी में डालकर सेवन करने से, हाथ और गले का दर्द दूर हो जाता है।
माहिषं नवनीतञ्च अश्वगन्धा च पिप्पली । वचा कुष्ठद्वयं लेपो लिङ्गस्रोतस्तनार्तिहृत् ॥ १,१९०.
महीस का घी, अश्वगंधा, पिप्पली, वचा और दो प्रकार की कुंठा को मिलाकर लेप बनाने से लिंग, नाड़ी और स्तनों का दर्द दूर होता है।
कुष्ठनागबलाचूर्णं नवनीतसमन्वितम् । तल्लेपो युवतीनाञ्च कुर्याद्वृत्तोजकौ शुभौ ॥ १,१९०.
कुंठा, नाग और बला का चूर्ण ताजा मक्खन में मिलाकर लेप करने से युवतियों का सौंदर्य और शरीर की गोलाई बढ़ती है।
इन्द्रवारुणिकामूलं यस्य नाम्ना सुदूरतः । निः क्षिप्यते समुत्पाट्य तस्य प्लीहा विनश्यति ॥ १,१९०.
जिस व्यक्ति के नाम से दूर से पुकारकर इन्द्रवारुणी की जड़ उखाड़कर फेंक दी जाती है, उसकी प्लीहा की बीमारी नष्ट हो जाती है।
पुनर्नवायाः शुक्लाया मूलं तण्डुलवारिणा । पीतं विद्रधिनुत्स्याच्च नात्र कार्या विचारणा ॥ १,१९०.
श्वेत पुनर्नवा की जड़ को चावल के पानी के साथ पीने से फोड़े-फुंसी ठीक हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।
कदलीदलक्षारन्तु पानीयेन प्रसाधितम् । तस्यादनाद्विनश्यन्ति उदरव्याधयोऽखिलाः ॥ १,१९०.
केले के पत्तों की राख का चूर्ण पानी में मिलाकर पीने से पेट की सभी बीमारियाँ नष्ट हो जाती हैं।
कदल्या मूलमादाय गुडाज्येन समन्वितम् । अग्निना साधितं जग्धमुदरस्थक्रिमीन्हरेत् ॥ १,१९०.
केले की जड़ को गुड़ और घी के साथ आग पर पकाकर खाने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
नित्यं निम्बदलानाञ्च चूर्णमामलकस्य च । प्रत्यूषे भक्षयेच्चैव तस्य कुष्ठं विनश्यति ॥ १,१९०.
नीम की पत्तियों और आँवला का चूर्ण रोज सुबह खाने से कुष्ठ रोग नष्ट हो जाता है।
हरीतकीविडङ्गञ्च हरिद्रा सितसर्षपाः । सोमराजस्य मूलानि करञ्जस्य च रौन्धवम् । गोमूत्रपिष्टान्येतानि कुष्ठरोगहराणि वै ॥ १,१९०.
हरड़, विडंग, हल्दी, सफेद सरसों, सोमराज की जड़ें और करंज का रौंधव, इन सबको गौमूत्र में पीसकर लगाने से कुष्ठ रोग दूर होता है।
एकश्च त्रिफलाभागस्तथा भागद्वयं शिवा । सोमराजस्य बीजानां जग्धं पथ्येन दद्रुनुत् ॥ १,१९०.
एक भाग त्रिफला, दो भाग शिवा और सोमराज के बीज, इन्हें उचित आहार के साथ खाने से दाद ठीक हो जाता है।
अम्लतक्रं सगोमूत्रं क्वथितं लवणान्वितम् । कांस्यघृष्टं खरं लेपात्कुष्ठदद्रुविनाशनम् ॥ १,१९०.
खट्टा मट्ठा, गौमूत्र, नमक डालकर कांसे पर रगड़कर जो खुरदुरा लेप बनता है, उसे लगाने से कुष्ठ और दाद नष्ट हो जाते हैं।
हरिद्रा हरितालश्च दूर्वागोमूत्रसैन्धवम् । अयं लेपो हन्ति दद्रुं पामानं च गरं तथा ॥ १,१९०.
हल्दी, हरताल, दूब, गौमूत्र और सेंधा नमक का लेप दाद, खुजली और विष को नष्ट करता है।
सोम राजस्य बीजानि नवनीतयुतानि च । मधुनास्वादितानि स्युः शुक्लकुष्ठहराणि वै । तक्रान्नपानतो रुद्र नात्र कार्या विचारणा ॥ १,१९०.
सोमराज के बीज ताजा मक्खन और शहद के साथ मिलाकर, मट्ठा या चावल के पानी के साथ खाने से, हे रुद्र, श्वेत कुष्ठ दूर होता है; इसमें कोई संदेह नहीं।
श्वेतापरा जितामूलं वर्तितं चास्य वारिणा । तल्लेपो रुद्र मासेन शुक्लकुष्ठविनाशनः ॥ १,१९०.
श्वेत अपराजिता की जड़ को पानी में पीसकर एक महीने तक लेप करने से, हे रुद्र, श्वेत कुष्ठ नष्ट हो जाता है।
माहिषं नवनीतञ्च सिन्दूरं समरीचकम् । पामा विलेपनान्नश्येद्दुर्नामा वृषभध्वज ॥ १,१९०.
महीष का घी, मक्खन, सिंदूर और अमरीचक — जब इनका लेप चर्मरोग में किया जाए, हे वृषध्वज, तो दुरनाम नामक व्याधि नष्ट हो जाती है।
विशुष्कगाम्भारीमूलं पक्वं क्षीरेण संयुतम् । भक्षितं शुक्लपित्तस्य विनाशकरमीश्वर ॥ १,१९०.
सूखी गाम्भारी की जड़ को दूध में पकाकर खाने से, हे ईश्वर, शुक्लपित्त का नाश होता है।
मूलकस्य तु बीजानि ह्यपा मार्गरसेन वै । पिष्टानि तेन लेपेन सिध्मकं रुद्र नश्यति ॥ १,१९०.
मूली के बीजों को अपामार्ग के रस के साथ पीसकर उसका लेप करने से, हे रुद्र, सिध्मक रोग नष्ट हो जाता है।
कदलीक्षारसंयुक्तहरिद्रा सिध्मकापहा । रम्भापामार्गयोः क्षार एरण्डेन विमिश्रितः । तदभ्यङ्गान्महादेव ! सद्यः सिध्म विनश्यति ॥ १,१९०.
केले की राख में हल्दी मिलाकर लगाने से सिध्मक मिटता है; और रम्भा व अपामार्ग की राख को एरण्ड के साथ मिलाकर शरीर पर मलने से, हे महादेव, सिध्मक तुरंत समाप्त हो जाता है।
कूष्माण्डनालक्षारश्च सगोमूत्रश्च तत्त्वतः । जलपिष्टा हरिद्रा च सिद्धा मन्दानलेनहि ॥ १,१९०.
कुष्माण्ड और नाल की राख, गोमूत्र के साथ, तथा जल में पीसी हुई हल्दी को मंद आँच पर पकाकर तैयार करें — ये सब उपयोगी हैं।
माहिषेण पुरीषेण वेष्टिता वृषभध्वज । अस्या उद्वर्तनं कुर्यादङ्गसौष्ठवमीश्वर ॥ १,१९०.
महीष के गोबर से शरीर को ढँककर, हे वृषध्वज, जब मालिश की जाती है, तो अंगों में दृढ़ता आती है, हे ईश्वर।
तिलसर्षपसंयुक्तं हरिद्राद्वयकुष्ठकम् । तेनोद्वर्तितदेहः स्याद्दुर्गन्धः सुरभिः पुमान् ॥ १,१९०.
तिल और सरसों के साथ हल्दी मिलाकर शरीर पर मलने से, दुर्गन्ध वाला व्यक्ति भी सुगंधित हो जाता है।
मनोहरश्चानुदिनं दूर्वाणां काकजङ्घाया । अर्जुनस्य तु पुष्पाणि जम्बूपत्रयुतानि च । सलोध्राणि च तल्लेपो देहदुर्गन्धतां हरेत् ॥ १,१९०.
दूर्वा, काकजंघा और अर्जुन के फूल, जामुन के फल और लोध्र — इन सबका लेप प्रतिदिन करने से शरीर की दुर्गन्ध दूर हो जाती है।
युक्तं लोध्रभवैर्नोरैश्चूर्णन्तु कनकस्य च । तेनोद्वर्तितदेहस्य न स्याद्ग्रीष्मप्रबाधिका ॥ १,१९०.
लोध्र, भव, नोरा और सोने का चूर्ण — इनसे शरीर की मालिश करने पर गर्मी के मौसम में परेशानी नहीं होती।
दुग्धेनोषसि सेकश्च घर्मदोषश्च नश्यति । काकजङ्घोद्वर्तनन्तु ह्यङ्गरागकरं भवेत् ॥ १,१९०.
रात में दूध का छिड़काव करने से गर्मी के दोष दूर होते हैं; काकजंघा से शरीर की मालिश करने पर सुंदर सुगंध आती है।
मधुयष्टी शर्करा च वासकस्य रसो मधु । एतत्पीतं रक्तपित्तकामलापाण्डुरोगनुत् ॥ १,१९०.
मधुयष्टि, शक्कर, वासक का रस और शहद — इनका सेवन करने से रक्तपित्त, कामला और पांडु रोग दूर हो जाते हैं।
रक्तपित्तं हरेत्पीतो वासकस्य रसो मधु । प्रातः काले तोयपानात्पीनसं दारुणं हरेत् ॥ १,१९०.
वासक का रस और शहद पीने से रक्तपित्त दूर होता है; सुबह पानी पीने से कठिन जुकाम भी मिट जाता है।