फलत्रिकामृतासातिक्ताभूनिम्बनिम्बजः । क्वाथः क्षौद्रयुतो हन्यात्पाण्डुरोगं सकामलम् ॥ १,१७०.
फलत्रिक, अमृता, कड़वी भूमि-निम्ब और नीम का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से पीलिया और खून की कमी दूर होती है।
त्रिवृच्च त्रिफला श्यामा पिप्पली शर्कग मधु । मोदकः सन्निपातान्तो रक्तपित्तज्वरापहः ॥ १,१७०.
त्रिवृत, त्रिफला, श्यामा, पिप्पली, शक्कर और शहद से बना लड्डू रक्त और पित्त के ज्वर तथा जटिल रोगों को दूर करता है।
वासायां विद्यमानायामाशायां जीवितस्य च । रक्तपित्ती क्षयी कासी किमर्थमवसीदति ॥ १,१७०.
जब शरीर में वासा और जीवन शक्ति बनी हुई है, तब रक्तपित्त, क्षय और खांसी से पीड़ित व्यक्ति क्यों दुर्बल हो जाता है?
आटरूपकमृद्वीकापथ्याक्वाथः सशर्करः । क्षौद्राढ्यः कासनिः श्वासरक्तपित्तनिबर्हणः ॥ १,१७०.
आटरूप, अंगूर और पथ्या का काढ़ा, शक्कर और खूब शहद मिलाकर पीने से खांसी, सांस फूलना और रक्तपित्त दूर होते हैं।
वासारसः खण्डमधुयुतः पीतोऽथरक्तजित् । सल्लकीबदरीजम्बुप्रियालाम्रार्जुनं धवः । पीतं क्षीरञ्च मध्वाढ्यं पृथक्छोणितवारणम् ॥ १,१७०.
वासा का रस और शक्कर मिलाकर पीने से रक्त विकार दूर होते हैं। सल्ली, बड़, जामुन, प्रियाल, आम, अर्जुन और धव को दूध और शहद के साथ अलग-अलग सेवन करने से भी रक्तस्राव रुकता है।
समूलफलपत्राया निर्गुण्ड्याः स्वरसैर्घृतम् । सिद्धं पीत्वा क्षयक्षीणी निर्व्यादिर्भाति देववत् ॥ १,१७०.
निर्गुंडी की जड़, फल और पत्तों के रस से बना घी पीने से क्षय से पीड़ित व्यक्ति रोगमुक्त होकर देवता के समान तेजस्वी हो जाता है।
हरीतकी कणा शुण्ठी मरिचं गुडसंयुतम् । कासघ्नो मोदकः प्रोक्तस्तृष्णारोचकनाशनः ॥ १,१७०.
हरितकी, पिप्पली, सौंठ, काली मिर्च और गुड़ से बना लड्डू खांसी को नष्ट करता है और प्यास व भूख न लगने की समस्या भी दूर करता है।
कण्टकारिगुडूचीभ्यां पृथक्त्रिंशत्पले रसे । प्रस्थं सिद्धं घृतं स्याच्च कासनुद्वह्निदापनम् ॥ १,१७०.
कंटकारी और गुडूची के रस के तीस-तीस पलें लेकर एक प्रस्थ घी में पकाने से बना घी खांसी में लाभकारी है और पाचन शक्ति बढ़ाता है।
कृष्णा धात्री शिता शुण्ठी हक्काघ्नी मधुसंयुता । हिक्काश्वासी पिवेद्भार्ङ्गो सविश्वामुष्णवारिणा ॥ १,१७०.
कृष्णा, आंवला, श्वेत शाक, सौंठ और शहद मिलाकर लेने से हिचकी और सांस फूलना दूर होता है। भारंग और विश्वा को गर्म पानी के साथ पीना चाहिए।
तैलाक्तं स्वरभेदे वा खादिरं धारयेन्मुखे । पथ्यां पिप्पलिकायुक्तां संयुक्तां नागरेण वा ॥ १,१७०.
स्वरभंग में तिल का तेल लगाकर खदिर को मुंह में रखना चाहिए, या पथ्या को पिप्पली या अदरक के साथ मिलाकर सेवन करना चाहिए।
विडङ्गत्रिलाचूर्णं छर्दिहृन्मधुना सह । आम्रजम्बूकषायं वा पिबोन्माक्षिकसंयुतम् ॥ १,१७०.
विडंग और त्रिला का चूर्ण शहद के साथ या आम और जामुन का काढ़ा शहद मिलाकर उल्टी में पीना चाहिए।
छर्दि सर्वां प्रणुदति तृष्णाञ्चैवापकर्षति । त्रिफला भ्रममूर्छाहृत्पीता सा मधुनापि वा ॥ १,१७०.
त्रिफला को शहद के साथ पीने से सभी तरह की उल्टी, प्यास, चक्कर और मूर्छा दूर होती है।
पञ्चगव्यं हितं पानादपस्मारग्रहादिनुत् । कूष्माण्डकरसो वाज्यं सयष्टिकं तदर्थकृत् ॥ १,१७०.
पंचगव्य पीने से अपस्मार और भूत-प्रेत के रोगों में लाभ होता है। कुम्हड़ा का रस और चावल भी इसमें उपयोगी हैं।
ब्राह्मीरसवचाकुष्ठशङ्खपुष्पीभिरेव च । पुराणं सेव्यमुन्मादग्रहापस्मारद्घृनुतम् ॥ १,१७०.
ब्राह्मी, वचा, कुष्ठ और शंखपुष्पी से मिला पुराना घी उन्माद, भूत-प्रेत और अपस्मार में उपयोगी है।
अश्वगन्धाकषाये च कल्के क्षीरे चतुर्गुणे । घृतपक्वन्तु वातघ्नं वृष्यं मां साय पुत्रकृत् ॥ १,१७०.
अश्वगंधा का काढ़ा या उसका कल्क, चार गुना दूध में घी डालकर पकाया जाए, तो यह वात को शांत करता है, वीर्यवर्धक है और पुत्र की प्राप्ति में सहायक है।
नीलीमुण्डीरिकाचूर्णं मधुसर्पिः समन्वितम् । छिन्नाक्वाथं पिबन्हन्ति वातरक्तं सुदुस्तरम् ॥ १,१७०.
नीली और मुंडी का चूर्ण, शहद और घी के साथ मिलाकर, छिन्ना के काढ़े के साथ सेवन करने से, कठिन से कठिन वातरक्त भी नष्ट हो जाता है।
सगुडाः पञ्च पथ्याश्च कुष्टार्शोवातसादनाः । गडचीस्वरसं कल्कं चूर्णं वा क्वाथमेव वा ॥ १,१७०.
गुड़ के साथ पांच पथ्य औषधियाँ कुष्ठ, बवासीर और वात रोगों के लिए लाभकारी हैं; इनका रस, कल्क, चूर्ण या काढ़ा किसी भी रूप में लिया जा सकता है।
वातरक्तान्तकं कालागुडूचीक्वाथकल्कतः । कुष्ठव्रणादिशमनं शृतमाज्यं सदुग्धकम् ॥ १,१७०.
काला गुडूची का काढ़ा और कल्क वातरक्त का अंत करता है; घी और दूध में पकाकर लेने से यह कुष्ठ, घाव और ऐसे अन्य रोगों को शांत करता है।
त्रिफलागुग्गुलुर्वातरक्तमूर्छापहारकः । ऊरुस्तम्भविनाशाय गोमूत्रेण च गुग्गुलुः ॥ १,१७०.
त्रिफला और गुग्गुलु वातरक्त और मूर्छा को दूर करते हैं; गुग्गुलु को गोमूत्र के साथ लेने से जांघों की जकड़न भी मिटती है।
शुण्ठीगोक्षुरकक्वाथः सामवातार्तिशूलनुत् । दशमूलामृतैरण्डरास्नानागरदारुभिः ॥ १,१७०.
सूखी सौंठ और गोक्षुर का काढ़ा वात और सामवात के दर्द को दूर करता है; साथ ही दशमूल, अमृता, एरण्ड, रास्ना, नागर और दारु के साथ भी यह लाभकारी है।
क्वाथो हन्ति माहशोथं मरीचगुडसंयुतः । कासघ्नो मोदकः प्रोक्तस्तृष्णारोचकनाशनः ॥ १,१७०.
मरीच और गुड़ के साथ बना काढ़ा बड़ी सूजन को दूर करता है; एक विशेष लड्डू खांसी और प्यास को मिटाता है तथा भूख बढ़ाता है।
कण्टकारिगुडूचीभ्यां पृथक्त्रिंशत्पले रसे । प्रस्थसिद्धं घृतञ्चैव कासनुद्धृदि दीपनः ॥ १,१७०.
कंटकारी और गुडूची का रस, बत्तीस-तीस पले लेकर, एक प्रस्थ घी में पकाकर सेवन करने से खांसी दूर होती है और हृदय को बल मिलता है।
कृष्णाधात्रीसिताशुण्ठीमरीचसैन्धवान्वितः । क्वाथ एरण्डतैलेन सामं हन्त्यनिलं गुरुम् ॥ १,१७०.
कृष्णा, धात्री, मिश्री, सौंठ, मरीच और सैंधव का काढ़ा, एरण्ड के तेल के साथ मिलाकर लेने से भारी वात का नाश होता है।
बला पुनर्नवैरण्डबृहतीद्वयगोक्षुरैः । सहिङ्गुलवर्ण पीतं वातशूलविमर्दनम् ॥ १,१७०.
बला, पुनर्नवा, एरण्ड, दोनों बृहती और गोक्षुर, रंग के लिए हींगुल मिलाकर, पीने से वात के दर्द में राहत मिलती है।
त्रिफलानिम्बयष्टीककटुकारग्वधैः शृतम् । पाययेन्मधुना मिश्रं दाहशूलोपशान्तये ॥ १,१७०.
त्रिफला, नीम, यष्टिमधु, कटुका और अरग्वध का काढ़ा, शहद के साथ मिलाकर पिलाने से जलन और दर्द शांत होता है।
त्रिफलापः सयष्टीकाः परिणामार्तिनाशनाः । गोमूत्रशुद्धमण्डूरं त्रिफलाचूर्णसंयुतम् । विलिहन्मधुसर्पिर्भ्यां शूलं हन्ति त्रिदोषजम् ॥ १,१७०.
त्रिफला का जल और यष्टिमधु पाचन के दर्द को मिटाते हैं; शुद्ध मंडूर और त्रिफला चूर्ण को शहद और घी के साथ चाटने से त्रिदोषजन्य दर्द दूर होता है।
त्रिवृत्कृष्णाहरीतक्यो द्विचतुष्पञ्चभागिकाः । गुटिका गुडतुल्यास्ता विड्विबन्धगदापहाः ॥ १,१७०.
त्रिवृत, कृष्णा और हरितकी को दो, चार और पांच भाग लेकर, गुड़ के बराबर गोलियां बनाकर खाने से कब्ज और अन्य रोग दूर होते हैं।
हरीतकीयवक्षारपिप्पलीत्रिवृतस्तथा । घृतैश्चूर्णमिदं पेयमुदावर्ताविनाशनम् ॥ १,१७०.
हरितकी, यवक्षार, पिप्पली और त्रिवृत का चूर्ण घी के साथ सेवन करने से उदावर्त रोग नष्ट होता है।
त्रिवृद्धरीतकीश्यामाः स्नुहीक्षीरेण भाविताः । वटिका मूत्रपीतास्ताः श्रेष्टाश्चानाहभेदिकाः ॥ १,१७०.
त्रिवृत, हरितकी और श्यामा को स्नुही के दूध में भिगोकर बनाई गई गोलियां, मूत्र के साथ लेने पर कब्ज खोलने में श्रेष्ठ हैं।
त्र्यूषणत्रिफलाधन्यविडङ्गचव्यचित्रकैः । कल्कीकृतैर्घृतं सिद्धं संस्कारं वातगुल्मनुत् ॥ १,१७०.
त्र्यूषण, त्रिफला, धनिया, विडंग, चव्य और चित्रक को पीसकर, घी में पकाकर सेवन करने से वातगुल्म का नाश होता है।