आचरण खंड के इन अध्यायों में, श्री गरुड़ महापुराण में देवी दुर्गा और भगवान सूर्य की पूजा विधि का विस्तार से वर्णन किया गया है। कथा आरंभ होती है नवरात्रि के नवें दिन की पूजा से। प्रातःकाल, साधक को चाहिए कि वह 'ह्रीं दुर्गे रक्षिणि' मंत्र के साथ मां दुर्गा की आराधना करे। इस पूजा में वह देवी से प्रार्थना करता है कि हे मां, इस अर्पण और दान के द्वारा मेरी सभी इच्छाएँ पूर्ण हों। इसके पश्चात देवी के मंगल, विजय, लक्ष्मी, शिवा और नारायणी—इन रूपों का क्रमशः स्मरण किया जाता है। देवी के अठारह भुजाएँ मानी जाती हैं, जिनमें वह ढाल, घंटा, दर्पण और तर्जनी धारण करती हैं। अन्य हाथों में शक्ति, गदा, भाला, खोपड़ी, बाण और अंकुश सुशोभित हैं। आगे, भगवती की महिमा के लिए एक विशेष मंत्र और जप का विधान बताया गया है। इस मंत्र में देवी चामुंडा का आह्वान किया जाता है, जो श्मशान में निवास करती हैं, हाथ में खोपड़ी लिए हुए, महाभूत पर आरूढ़, अनेक वाहन और गणों से घिरी हुई, कालरात्रि स्वरूपिणी हैं। उनके अनेक भुजाएँ हैं, वे घंटियों, डमरू और नूपुरों से सुसज्जित हैं, उनका अट्टहास गूंजता है, वे भयंकर शब्द करती हैं, उनके शरीर पर रक्त और मांस का लेप है, जीभ लपलपाती है, वे महादानवी, विकराल दांतों वाली, भयानक, बिजली की भांति चमकती हैं। वे करभद्र सिंहासन पर विराजमान हैं, खोपड़ियों की माला पहने, जटाजूट में चंद्रमा सुशोभित है। उनका अट्टहास, कर्कश ध्वनि, विकराल दंत, अंधकार फैलाने वाली, विघ्न विनाशिनी, शीघ्र कार्य सिद्धि के लिए आह्वान किया जाता है। मंत्र में विविध देवियों—ब्रह्माणी, महेश्वरी, कौमारी, वाराही, ऐंद्रि, चामुंडा, वैष्णवी, हिमवत् वासी, कैलास पर आरूढ़—का आह्वान भी सम्मिलित है। देवी के भयंकर रूप, उनकी शक्ति, उनके विविध आयुधों, आशीर्वाद और विनाशकारी स्वरूप का अत्यंत विशद वर्णन मंत्र में किया गया है। अंत में, इस मंत्र के द्वारा समस्त दुष्ट शक्तियों, दिशाओं, उपदिशाओं, ऊपर-नीचे, सबको बांधने, नियंत्रित करने, और देवी की कृपा से कार्य सिद्धि की प्रार्थना की जाती है। यह मंत्र एक सौ आठ अक्षरों की माला के रूप में जपने योग्य है। प्रत्येक अक्षर की पूजा में उत्तम मांस और तीन प्रकार की मधुरता (स्वाद) का उपयोग करना चाहिए, या अन्यथा भी सभी कर्मों में यह उपयुक्त है। देवी का ध्यान कभी अठ्ठाईस भुजाओं वाली, तो कभी अठारह भुजाओं वाली के रूप में करना चाहिए। उनके दो हाथों में तलवार और ढाल, दो में गदा और दंड, अन्य दो में चक्र और घंटा, फिर दो में ध्वज और दंड, अन्य दो में भाला, फिर हल और मुसल, एक हाथ से वे अभय मुद्रा दिखाती हैं और दूसरे से भयानक शब्द करती हैं। समस्त प्राणियों से घिरी हुई, देवी को 'जय हो, हे प्रजापति!' कहकर वंदना की जाती है। इस प्रकार, 'दुर्गा की पूजा, जप और अर्पण के मंत्रों का वर्णन' नामक यह अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण होता है। इसके पश्चात, अगला अध्याय आरंभ होता है, जिसमें भगवान सूर्य की पूजा विधि का संक्षिप्त वर्णन मांगा जाता है। श्रीकृष्ण, रुद्र से कहते हैं—हे रुद्र, अब मैं सूर्य की पूजा की विधि बताता हूँ। 'ॐ दंडिनाय नम:'—इन मंत्रों से द्वारपालों की पूजा करनी चाहिए। दक्षिण-पूर्व आदि दिशाओं में 'ॐ प्रभूताय नम:', 'ॐ विमलाय नम:', 'ॐ आधाराय नम:'—इन मंत्रों से विमला आदि की पूजा करें। पूर्व आदि दिशाओं में 'ॐ पद्माय नम:', 'ॐ वां (या रां), दीप्ता', 'ॐ वूं (या रूं), भद्रा', 'ॐ वौं (या रौं), विभूति', 'ॐ वं (या रं), वैद्युता', 'ॐ रो, सर्वतोमुखी'—इन मंत्रों से पूजा करें। मध्य में 'ॐ अर्कासनाय नम:' से पूजा करें। फिर, 'ह्रं' मंत्रों से आवाहन, स्थापना और प्रतिष्ठा करें। ध्यान में भगवान सूर्य को एकचक्र रथ पर आरूढ़, दो भुजाओं में कमल धारण किए हुए, ऐसे रूप में देखना चाहिए। इसी प्रकार सूर्य का ध्यान सदा करना चाहिए। मूल मंत्र इस प्रकार है—तीन दिन तक कमल और चक्र मुद्राएँ दिखाकर, 'ॐ अर्काय शिरसे स्वाहा', 'ॐ हुं कवचाय हुं', 'ॐ वह अस्त्राय फट्'—इन मंत्रों से पूजा करें। दक्षिण-पूर्व, उत्तर-पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम में हरा की पूजा करें। दिशाओं में रुद्र की, और श्वेत वर्ण के सोम की पूजा करें। दक्षिण में रुद्र और उसी वर्ण के गुरु की पूजा करें। दक्षिण-पूर्व में अंगारक (मंगल), जो अंगारे के समान लाल हैं, उनकी पूजा करें। उत्तर-पश्चिम में राहु की पूजा नंद्यावर्त पात्र में करें। फिर, 'ॐ सोमाय नम:', 'ॐ बृं बृहस्पतये नम:', 'ॐ अं अंगारकाय नम:', 'ॐ रं राहवे नम:'—इन मंत्रों से पूजा करें। सूर्य को मूल मंत्र से पाद्यादि अर्पित करें, और आठ हजार बार जप करें। फिर, 'ॐ तेजश्चंडाय हुं फट् स्वधा स्वाहा पौषट'—इस मंत्र से तिल और चावल में लाल चंदन मिलाकर अर्पण करें। उस पात्र को सिर पर रखकर भूमि पर घुटनों के बल जाएं। पहले गुरु मंडल की पूजा करें, फिर सभी देवताओं की 'ॐ अं गुरवे नम:' से पूजा करें। इस प्रकार सूर्य की पूजा का विधान पूर्ण होता है। यह पूजा करने से साधक विष्णु लोक को प्राप्त करता है। 'सूर्य की पूजा की विधि' नामक यह अध्याय भी यहीं समाप्त होता है। इस प्रकार, गरुड़ महापुराण के इन अध्यायों में देवी दुर्गा और भगवान सूर्य की पूजा, ध्यान, मंत्र और अर्पण की विधियों का अत्यंत श्रद्धापूर्वक, विस्तार से और क्रमबद्ध वर्णन किया गया है।