एक समय की बात है, श्री गरुड़ महापुराण के आचारकाण्ड में, भगवान श्रीधर के त्रैलोक्यमोहिनी रूप की पूजा की विधि विस्तार से बताई गई है। इस पूजा में सबसे पहले शंख, कमल, निधियाँ, हिरण, शरभ और समृद्धि की उपस्थिति का स्मरण किया जाता है। पश्चिम दिशा में बाला और प्रभला, जय और विजय की पूजा का विधान है। दक्षिण-पूर्व कोने से शुरू कर, नारद आदि की भी दिशाओं के अनुसार पूजा करनी चाहिए। पूर्व दिशा में भगवान विष्णु, उनकी तपस्या और उनकी शक्ति की आराधना की जाती है। अग्नि से अनंत, पृथ्वी, धर्म, ज्ञान और वैराग्य की उत्पत्ति मानी जाती है। सत्त्व को आद्यात्मिक स्वरूप, और रजस् को मोह का रूप माना गया है। ज्ञान का सच्चा सार वही परम तत्त्व है, जो सूर्य, चंद्र और अग्नि के क्षेत्र में स्थित है। गोपीजनवल्लभ के लिए ‘स्वाहा’ से समाप्त होने वाला मंत्र घोषित किया गया है। तीनों लोकों की रक्षा करने वाला सुदर्शन चक्र, जो असुरों का शत्रु है, उसकी भी पूजा की जाती है। रुक्मिणी, सत्यभामा, सुनंदा और नाग्नजिति—इन सबका भी स्मरण और पूजन होता है। शंख, चक्र, गदा, कमल, हल और शार्ङ्ग धनुष की भी पूजा करनी चाहिए। मुकुट, हार और इन्द्र आदि के श्रेष्ठ ध्वजों के जप, ध्यान और पूजन से सभी इच्छित फल प्राप्त होते हैं। अब, मैं त्रैलोक्यमोहिनी—तीनों लोकों को मोहित करने वाली, परम पुरुष की परम प्रिय—की पूजा विधि विस्तार से बताता हूँ। इसके मंत्र हैं: ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ह्रूं ॐ नमः’, ‘ॐ श्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहिन्यै नमः’, ‘ॐ विष्णवे त्रैलोक्यमोहिन्यै नमः’। ये मंत्र तीनों लोकों को मोहित करने वाले हैं और सभी कार्य सिद्ध करते हैं। पूजा में आसन, मूर्ति-मंत्र और अग्निहोत्र से शुरू होने वाले षडंगों का भी विधान है। बाण, पाश, अंकुश, लक्ष्मी और गरुड़ का भी स्मरण किया जाता है। इस प्रकार, श्री गरुड़ महापुराण के पूर्वखण्ड के आचारकाण्ड में ‘त्रैलोक्यमोहिनी (श्रीधर) पूजन विधि’ नामक यह अध्याय है। अब मैं श्रीधर की मंगलमयी पूजा का विस्तार से वर्णन करता हूँ। ‘ॐ श्राँ हृदय को नमस्कार; ॐ श्रूं शिखा को वषट्; ॐ श्रौं तीन नेत्रों को वौषट्।’ फिर अपने हाथों से शंख, चक्र, गदा आदि के मुद्राएँ दिखानी चाहिए। इसके बाद, मंडल में स्वस्तिक से आरंभ कर उस देवता की पूजा करें। हे महादेव, इन मंत्रों को सुनो: ‘ॐ, श्रीधर के आसन के देवता यहाँ पधारें।’ फिर, धाता, गंगा, आधारशक्ति, अनंत, धर्म, वैराग्य, अधर्म, अवैराग्य, कंद, पद्म, उत्कर्षिणी, क्रिया, प्रह्वी, ईशान—इन सबको नमस्कार करें। रुद्र सहित पूजा कर, हरि को आह्वान कर यज्ञ करें। ‘ॐ ह्रीं, श्रीधर को, विष्णु को, त्रैलोक्यमोहन को नमस्कार; पधारो।’ फिर, श्री को, श्री के लिए सिर पर, श्रिम को कवच के लिए, श्रः को अस्त्र के लिए, पद्म, गदा, कौस्तुभ, पीताम्बर, नारद, इन्द्र, यम, वरुण, सोम, अनंत, सत्त्व, तमस्—इन सबको नमस्कार करें। इसके बाद, अभिषेक, वस्त्र और यज्ञोपवीत अर्पित करें। इन सबका अर्पण महान मंत्रों के साथ करें और इच्छित फल के लिए मंत्र का जप करें। फिर, एकांत में थोड़ी देर के लिए हृदय में प्रतिष्ठित देवता का ध्यान करें। श्रीधर का ध्यान करें—कोमल, मंद मुस्कान, चमकदार मकरकुंडलों से शोभित मुख। ज्ञानीजन श्रीधर को परम ब्रह्म के स्वरूप में ध्यान करें। श्रीनिवास, श्रीपति को नमस्कार, श्रीवल्लभ, शान्त और तेजस्वी को बार-बार प्रणाम। शुभाश्रय और श्रेष्ठ आश्रय को बार-बार प्रणाम। इस प्रकार रुद्र और महात्मा विष्णु की पूजा का वर्णन हुआ। जो कोई इस अध्याय का पाठ करता है, जिसमें विष्णु की पूजा का रहस्य बताया गया है, वह सब मनोरथों को प्राप्त करता है।