इन शास्त्रों में एक अद्भुत ज्ञान का प्रवाह है, जिसमें विविध प्रतीकों और उनके स्थान के अनुसार फल बताए गए हैं। सबसे पहले, जब सिंह वृषभ के स्थान पर होता है, तो शुभता, सौभाग्य और धन की प्राप्ति होती है। यदि कुत्ता वृषभ के स्थान पर हो, तो बल और समृद्धि की इच्छा उत्पन्न होती है। वृषभ को उसके स्थान पर देखना यश, संतोष और सुख देता है, जबकि गधा उस स्थान पर दिखे तो बड़ा लाभ होता है। हाथी वृषभ के स्थान पर हो तो स्त्रियों, हाथियों और अन्य के साथ मिलन मिलता है, और यदि कौवा उस स्थान पर हो तो स्थान और मन के साथ मिलन होता है। गधे के स्थान पर ध्वज दिखाई दे तो रोग, दुख और अन्य विपत्तियाँ आती हैं, और यदि धुएँ के रंग का कोई हो तो चोरों आदि से भय होता है। सिंह गधे के स्थान पर हो तो सम्मान, समृद्धि और विजय मिलती है, लेकिन कुत्ता उस स्थान पर हो तो कष्ट और धन की हानि होती है। वृषभ गधे के स्थान पर हो तो सुख और प्रियजनों से मिलन होता है, जबकि गधा अपने स्थान पर हो तो दुख और पीड़ा का संकेत है। हाथी गधे के स्थान पर हो तो सुख और पुत्रों की प्राप्ति होती है, कौवा उस स्थान पर हो तो झगड़ा और रोग आता है। हाथी के स्थान पर ध्वज दिखे तो स्त्रियों पर विजय, समृद्धि और सुख मिलता है, और धुएँ के रंग का कोई हो तो धन और अन्न से मिलन होता है। सिंह हाथी के स्थान पर हो तो विजय और सिद्धि मिलती है, कुत्ता उस स्थान पर हो तो स्वास्थ्य और अत्यधिक सुख मिलता है। वृषभ हाथी के स्थान पर हो तो राजकीय सम्मान, आदर और धन प्राप्त होता है, गधा उस स्थान पर हो तो पहले कष्ट और फिर सुख मिलता है। हाथी अपने स्थान पर हो तो खेतों, अन्न, सुख आदि में समृद्धि आती है, कौवा हाथी के स्थान पर हो तो धन और अन्न की प्रचुरता होती है। कौवे के स्थान पर ध्वज दिखे तो कार्यों का नाश होता है, धुएँ के रंग का कोई हो तो दुख और विपत्ति आती है। सिंह कौवे के स्थान पर हो तो झगड़ा और कष्ट होता है, कुत्ता उस स्थान पर हो तो घर के नाश का भय और अन्य संकट आते हैं। वृषभ कौवे के स्थान पर हो तो पद के खोने का डर होता है, गधा उस स्थान पर हो तो धन की हानि और पराजय मिलती है। हाथी कौवे के स्थान पर हो तो धन, यश आदि मिलता है, कौवा अपने स्थान पर हो तो विदेश यात्रा और ऐसे ही अनुभव होते हैं। इसके बाद, भैरव देवी से कहते हैं कि वे वायु की विजय, विजय का चिह्न, विदेश में विजय और चार शुभ वायु—वायु, अग्नि, जल और इंद्र—के बारे में बताएंगे। वायु बाएँ या दाएँ होने पर प्रचुर होती है, अग्नि ऊपर जाती है, और वरुण (जल) नीचे स्थित होता है। महेन्द्र (इंद्र) बीच में रहता है; शुक्ल पक्ष में वह बाएँ, कृष्ण पक्ष में दाएँ रहता है, और उदय तीन दिन तक रहता है। यदि पहले तिथि से क्रम उल्टा हो जाए तो हानि होती है; यदि उदय सूर्य के मार्ग पर हो और चंद्रमा अस्त हो जाए, तो गुणों की वृद्धि होती है, अन्यथा बाधाएँ आती हैं। दिन-रात में सोलह परिवर्तन बताए गए हैं। जब वायु आधी पहर के मध्य में बदलती है, तो स्वास्थ्य की हानि समझनी चाहिए, क्योंकि वायु जीवों में घूमती रहती है। दाएँ नासिका में वायु हो तो भोजन और रमण के लिए शुभ है; शस्त्रधारी युद्ध में विजय पाएगा, शत्रु और कामनाओं को जीत लेगा। बाएँ ओर वायु की गति सबसे उत्तम है, सभी कार्यों में शोभा और शुभता मिलती है। महेन्द्र, वरुण और वायु के स्थानों में कोई दोष नहीं है; वायु दाएँ जाए तो सूखा, बाएँ जाए तो वर्षा होती है। फिर, धन्वंतरि कहते हैं कि वे घोड़ों की आयुर्वेदिक विद्या और उनके गुणों को बताएंगे। जिन घोड़ों की चोंच कौवे जैसी, जीभ काली, मुख वृक्ष जैसा, तालु गर्म, चेहरा उग्र, दाँत कम, सींग, कम दाँत, एक अंडकोष, जन्मजात अंडकोष, आवरण, दो खुर, थन, बिल्ली जैसे पैर, बाघ जैसा शरीर, कोढ़ या फोड़े जैसा, यम से उत्पन्न, बौना, बिल्ली जैसा, भूरे नेत्र—ऐसे दोषयुक्त घोड़े त्यागने योग्य हैं। सबसे उत्तम घोड़ा तुरुष्क जाति का है, मध्यम पाँच हाथ का, और सबसे छोटा तीन हाथ का है। जो घोड़े ठीक आकार के नहीं, छोटे कान वाले, या चित्तीदार हैं—वे कमजोर नहीं, बल्कि दीर्घायु होते हैं। अशुभ प्रभावों से रक्षा के लिए नीम की पत्तियाँ, गुग्गुल, सरसों का तेल और घी का प्रयोग करना चाहिए। तिल, वचा और हींग घोड़ों की गर्दन में बाँधना चाहिए। दो प्रकार के घाव बताए हैं: बाह्य कारणों से और आंतरिक दोषों से। वायु से हुए घाव देर से ठीक होते हैं, कफ से हुए जल्दी; पित्त से जलन, रक्त से मंद पीड़ा होती है। बाह्य कारणों जैसे शस्त्र आदि से हुए घावों की सफाई अरंडी की जड़, चित्रक और सर्वसाधारण औषधियों से दिन में दो बार करनी चाहिए। लहसुन और सेंधा नमक, या उनसे बना छाछ, तिल की खली में दही और सेंधा नमक, तथा नीम की पत्तियों से बना पेस्ट घावों की सफाई और उपचार के लिए उपयोगी है। पटोला, नीम, वचा, चित्रक, पिप्पली और अदरक को पीसकर देना चाहिए। इसे पिलाने से कीड़े, कफ और मंद वायु नष्ट होती है; नीम, पटोला, त्रिफला और खदिर भी उपयोगी हैं। इन्हें उबालकर, बुद्धिमान व्यक्ति रक्तस्राव वाले घोड़े को तीन दिन तक देता है, जिससे घोड़े का कोढ़ दूर होता है। घाव और कोढ़ के लिए सरसों का तेल लाभकारी है; लहसुन आदि की औषधियों का काढ़ा भी दिया जाता है। नासिका के उपचार के लिए तुरंत मातुलुंग या मांसी का रस, अन्य वायु के साथ मिलाकर देना चाहिए। पहले दिन दो पल देना है, फिर प्रतिदिन एक पल बढ़ाकर अंतिम दिन अठारह पल देना चाहिए। इस प्रकार, शास्त्रों में विविध प्रतीकों, वायु की गति, विजय के चिह्न, और घोड़ों की चिकित्सा का गूढ़ और हितकारी वर्णन मिलता है, जो जीवन में शुभता, स्वास्थ्य और विजय की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है।