आइए, इन पवित्र श्लोकों के अनुसार आयुर्वेद की दिव्य शिक्षा को एक सजीव कथा के रूप में समझते हैं। संसार की समस्त द्रव्यों में रस (स्वाद), वीर्य (ऊष्मा या शीतलता), और विपाक (पाचन के बाद का प्रभाव) का आधार द्रव्य ही है। द्रव्य के भीतर ये गुण रूप बदलते रहते हैं, परंतु द्रव्य स्वयं स्थिर रहता है और सभी पदार्थों का मूल आधार भी वही है। वीर्य तीन प्रकार का माना गया है—शीतल, उष्ण और लवण। रस के परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं, परंतु विशेष रूप से तीक्ष्णता प्रधान होती है। चिकित्सा के चार प्रमुख अंग हैं—वैद्य, औषधि, रोगी और परिचारक। इन चारों में से कोई भी यदि विपरीत हो जाए, तो चिकित्सा सफल नहीं होती। चिकित्सा करते समय क्षेत्र (स्थान), ऋतु (मौसम), आयु, अग्नि (पाचनशक्ति), प्रकृति, औषधि, शरीर, मन, बल और रोग—इन सबका भली-भांति ज्ञान होना चाहिए। मिश्रित गुणों वाला क्षेत्र सामान्य माना गया है। आयु की दृष्टि से सोलह वर्ष तक बाल्यावस्था, सत्तर वर्ष तक मध्यावस्था, और उसके बाद वृद्धावस्था कही गई है। शरीर में कफ, पित्त और वात का प्रादुर्भाव सामान्यतः क्रमशः होता है, और वृद्धावस्था में बिना क्षार, अग्नि या शल्य के उपचार ही उचित माने गए हैं। जो व्यक्ति दुर्बल है, उसके लिए पौष्टिक चिकित्सा, स्थूल के लिए शोधन चिकित्सा, और मध्यम काया वालों के लिए रक्षण—ये तीन प्रकार की शारीरिक स्थितियाँ मानी गई हैं। बल का ज्ञान दृढ़ता, व्यायाम और संतोष से करना चाहिए; जो व्यक्ति स्थिर, अत्यंत ऊर्जावान और साहसी है, वही बलवान कहलाता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रकृति के विपरीत आहार-विहार करता है, फिर भी उसे संतोष मिलता है, तो उसे समस्थिति (संतुलन) कहा गया है। गर्भवती स्त्री यदि कफवर्धक आहार लेती है, तो कफप्रधान प्रकृति का शिशु जन्म लेता है; इसी प्रकार वात या पित्तवर्धक आहार से वैसी ही प्रकृति का शिशु उत्पन्न होता है, और संतुलित आहार से संतुलित प्रकृति का। जो व्यक्ति दुबला, शुष्क, कम बालों वाला, चंचल चित्त, अधिक बोलने वाला, और स्वप्न में गति देखता है, वह वातप्रधान माना जाता है। जो समय से पहले सफेद बालों वाला, गोरा, शीघ्र पसीना आने वाला, शीघ्र क्रोधी, बुद्धिमान, और स्वप्न में प्रकाशमान वस्तुएँ देखने वाला है, वह पित्तप्रधान है। जिसका मन स्थिर, वाणी कोमल, स्वर स्पष्ट और सुखद, केश चिकने, और जो स्वप्न में जल या पत्थर देखता है, वह कफप्रधान माना गया है। यदि किसी में दो या तीन दोषों के लक्षण हों, तो उसे मिश्रित प्रकृति कहा जाता है; किंतु जिसमें कोई एक दोष प्रधान हो, वही मुख्य प्रकृति मानी जाती है। पाचनशक्ति चार प्रकार की होती है—मंद, तीक्ष्ण, विषम और सम। ये कफ, पित्त, वात की प्रधानता या संतुलन से उत्पन्न होती हैं। सम अग्नि में पोषण आवश्यक है; विषम में वात का शमन करना चाहिए; तीक्ष्ण में पित्त का शमन; मंद में कफ का शोधन उचित है। सभी रोगों की जड़ अजीर्ण (अपच) है, जो पाचनाग्नि का नाश करता है। इसके लक्षण हैं—गुरुता, अम्लता, विघात—और ये चार प्रकार के होते हैं। अजीर्ण से हैजा, हृदय की थकावट आदि रोग होते हैं; ऐसे में वचा, लवण और जल से वमन कराना चाहिए। अम्लता से वीर्यनाश, चक्कर, मूर्छा और प्यास होती है; ऐसे में ठंडा जल और वातशामक औषधियाँ लेनी चाहिए। अंगों का भंग, सिर का भारीपन, और कुपथ्य भोजन से उत्पन्न विकारों में दिन में सोना व्रज्य है और उपवास करना चाहिए। उदरशूल और गुल्म, जिसमें मूत्र एवं मल का अवरोध हो, स्वेदन (स्टीम) और लवण जल पान से ठीक होते हैं। कफ, पित्त या वात से उत्पन्न गुरुता, अम्लता, और विघात में—हींग, काला नमक और पिप्पली का लेप उदर पर करना चाहिए। दिन में सोना सभी अजीर्ण को दूर करता है; किंतु अपथ्य भोजन अनेक रोगों का कारण है, अतः उसे त्यागना चाहिए। भोजन के बाद गुनगुना जल और शहद पाचन में सहायक हैं; परंतु दूध का मूली, दही या मछली के साथ सेवन वर्जित है। बिल्व, शोणा, गम्भारी, पाटला और गणिकारिका—ये पंचमूल पाचनाग्नि को प्रज्वलित करते हैं और कफ-वात का शमन करते हैं। शालपर्ण, पृष्णिपर्ण, बृहती के दो प्रकार और गोक्षुर—ये लघुपंचमूल वात-पित्त का शमन करते हैं और बलवर्धक हैं। दोनों दशमूल ज्वर, कास, श्वास, आलस्य, पार्श्वशूल आदि में अति हितकारी हैं। इन औषधीय तेलों से अभ्यंग, स्वेदन और लेप करना चाहिए—विशेषतः खालित्य (गंजापन) में। क्वाथ का जल औषधि के चार गुना और पादाभ्यंग में भी चार गुना करना चाहिए। तेल और दूध बराबर मात्रा में लें, और चूर्ण तेल के चौथाई के बराबर हो; इसे निर्दिष्ट औषधियों के साथ पकाएं। बस्ती और पान के लिए मात्रा बराबर हो; अभ्यंग के लिए खुरदरा, नस्य के लिए मृदु और अन्यानुकूल बनाएं। जिसका शरीर और इंद्रियाँ सबल हैं, जिसकी प्रकृति स्थिर है, वही स्वस्थ और दीर्घायु माना जाता है, और उसका विशेष रूप से संरक्षण करना चाहिए। जो व्यक्ति इंद्रियों से विषयों का विपरीत अनुभव करता है, वह मृत्यु के समीप है; जो वैद्य, मित्र या गुरु से विरोध करता है, या अत्यधिक मोह या द्वेष करता है, वह भी संकटग्रस्त है। यदि किसी के टखना, घुटना, ललाट, जबड़ा या गाल उखड़ जाएँ, तो उसका शीघ्र मृत्यु होना निश्चित है। यदि बाया नेत्र धँस गया हो, जीभ काली हो, नाक विकृत हो, होंठ काले और टेढ़े हों, और मुख काला हो, तो ऐसे व्यक्ति की आशा छोड़ देनी चाहिए। अब भगवान धन्वंतरि कहते हैं—मैं हित-अहित के विवेक और अनुपान के नियम बताऊँगा। लाल चावल तीनों दोषों का नाश करता है, प्यास बुझाता है, और चर्बी नहीं बढ़ाता। महाशालि अत्यंत पोषक है; कलम चावल कफ और पित्त का शमन करता है, शीतल, भारी है, और सफेद षष्ठिक चावल भी तीनों दोषों को शांत करता है। श्यामाक शुष्क, रूक्ष, वातवर्धक है, कफ-पित्त का शमन करता है; प्रियंगु, निवारा और कोरदूष भी ऐसे ही हैं। जौ, बार-बार सेवन करने से, एक बार शीतल कर के, कफ-पित्त का शमन करता है; यह बलवर्धक, शीतल, भारी और मधुर है; गेहूँ वात का नाश करता है। मूंग कसैला, मधुर, हल्का है, कफ-पित्त का शमन करता है; माष अत्यंत पोषक, बलवर्धक, भारी है, और पित्त-कफ का शमन करता है। राजमाष पौष्टिक नहीं, किन्तु कफ-पित्त का शमन करता है और वातजन्य विकारों में लाभकारी है; कुलथ कास, हिचकी, हृदयरोग, कफ, गुल्म और वात का शमन करता है। मकुष्ठक शीतल, बंधनकारी है, रक्तपित्त, ज्वर और उन्माद को शांत करता है; चना वातवर्धक है, और शुक्र, रक्त, कफ-पित्त के विकारों का नाश करता है। इस प्रकार, इन श्लोकों के माध्यम से आयुर्वेद के गूढ़ रहस्य, चिकित्सा के सिद्धांत, और आहार-विहार के नियम दिव्य कथा के रूप में हमारे सामने प्रकट होते हैं।