गरुड़ महापुराण के प्रथम खंड के आचारकाण्ड में, रत्नों और तीर्थस्थलों की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि जिस व्यक्ति के पास श्रेष्ठ रत्न होते हैं, उसे लताओं या वृक्षों से कोई भय नहीं रहता और न ही भूमि के अधिपति उसका उपहास करते हैं। जब इन रत्नों का उपयोग पितरों के तर्पण में किया जाता है, तो पितर अनेक वर्षों तक तृप्त रहते हैं और जल, अग्नि, शत्रु या चोरों का भयानक भय भी नष्ट हो जाता है। ऐसे व्यक्ति का वर्ण काई या वर्षा के मेघ के समान श्याम, पीताभ और बिना चमक के हो सकता है। इन रत्नों का मूल्य विद्वानों द्वारा स्थान और समय के अनुसार निश्चित किया जाना चाहिए। इसके बाद पुलक रत्न की परीक्षा का उल्लेख आता है। ये पवित्र स्थल, श्रेष्ठ पर्वतों, नदियों और उत्तर दिशा के अन्य स्थानों में पाए जाते हैं। दशार्ण, वागदर, मेकल, कालगा आदि क्षेत्रों में ये गुंजा बीज, काजल, मधु और मृणाल डंठल के रंग जैसे होते हैं। इनकी आकृति शंख, कमल, भौंरे और सूर्य के समान विविध होती है, और ये सूत्र में पिरोए जाते हैं। ये अत्यंत शुद्ध माने गए हैं। कभी-कभी ये कौवे, सियार, भेड़िए और गिद्ध जैसे भयानक जीवों के साथ, मांस-रक्त से सने मुख वाले रूप में भी देखे जाते हैं। इसके आगे रक्तमणि रत्न का वर्णन है। दैत्य अग्निरूप धारण कर इच्छानुसार कार्य करता है। वहाँ इन्द्रगोप कीटों से सुशोभित, तोते की चोंच के रंग के, सुंदर और पुष्ट रूप में रक्तमणि पाई जाती है। इसका मध्य भाग चंद्रमा के समान श्वेत और अत्यंत शुद्ध होता है, और वह परत नीलम के रंग जैसी होनी चाहिए। फिर स्फटिक रत्न की चर्चा होती है, जो कावेरी, विंध्य, यवन, चीन और नेपाल की भूमि में उत्पन्न होता है। इसे 'तैल' भी कहा गया है और यह आकाश के समान स्वच्छ होता है। यह अन्य रत्नों के समान नहीं है, किंतु पापों का नाश करता है। पुनः मूंगे की परीक्षा का उल्लेख आता है। केरल आदि प्रदेशों में, जब इसकी अंतड़ियों का अवशेष लिया जाता है, तो श्रेष्ठ मूंगा वह माना जाता है जो खरगोश के रक्त या गुंजा अथवा जवा पुष्प के रंग का हो। अन्य स्थानों का उत्पन्न मूंगा श्रेष्ठ नहीं माना जाता, उसका मूल्य विशेष कौशल पर निर्भर करता है। यह मूंगा संसार में धन और अन्न प्रदान करता है, विष और व्याधि के भय को दूर करता है। हे शौनक! यह स्फटिक और मूंगे का ज्ञान है। इसके पश्चात् पुण्य तीर्थों का वर्णन है। सभी तीर्थों में गंगा के तीर्थ श्रेष्ठ माने गए हैं। गंगाद्वार, प्रयाग और गंगा-सागर संगम में सेवा और पिंडदान से मनुष्य की समस्त इच्छाएँ पूर्ण होती हैं और पापों का नाश होता है। कुरुक्षेत्र महान तीर्थ है, जहाँ दान आदि से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। द्वारका नगरी भी भोग और मोक्ष प्रदान करती है। केदार समस्त पापों का नाश करता है, शम्भल ग्राम भी उत्तम है। श्वेतद्वीप, मायापुरी, नैमिष और परमपावन पुष्कर का भी उल्लेख है। विनायक तीर्थ और रामगिरि का श्रेष्ठ आश्रम भी महत्त्वपूर्ण हैं। रामेश्वर तीर्थ सर्वोच्च है और कार्तिकेय भी श्रेष्ठ माने गए हैं। उज्जयिनी में महाकाल, कुब्जक में श्रीधर हरि, महाकेशी, कावेरी, चंद्रभागा और विपाशा नदियाँ, मथुरा नगरी, शोणा नदी—ये सभी पुण्यस्थल हैं। जहाँ सूर्य, शिव, गण, देवी और हरि भी निवास करते हैं, वहाँ पूजा, श्राद्ध और पिंडदान सब अक्षय हो जाते हैं। कोकमुख, वराह, भुंडीरा (स्वामी के नाम से प्रसिद्ध), कामरूप जहाँ कामाख्या देवी विराजमान हैं, विरजा तीर्थ और श्रीपुरुषोत्तम का पावन स्थल—इन सबका भी विस्तार से स्मरण किया गया है। इस प्रकार गरुड़ महापुराण में रत्नों की परीक्षा और पुण्य तीर्थों की महिमा का सुंदर निरूपण मिलता है।