श्री गरुड़ महापुराण के आचारकाण्ड के प्रथम भाग में रत्नों के परीक्षण और उनके गुणों का विस्तार से वर्णन किया गया है। जैसे किसी पद्मराग मणि में दोष आ जाने से उसकी कीमत घट जाती है, वैसे ही रत्नों के मूल्य का निर्धारण उनके गुण-दोष के अनुसार ही होता है। रत्नों की उत्पत्ति के वर्णन में कहा गया है कि सिहली युवतियों के कोमल हाथों की कोंपलें, नवांकुरों के सिरे, नव विकसित अन्न, मूंगे की शाखाएँ—ये सब समुद्र के समीप फैली भूमि की शोभा में सम्मिलित हैं, जो लहरों की झाग के समान उज्ज्वल और सुंदर प्रतीत होती है। वहाँ नील कमल के समान, मयूर के कंठ जैसी, हलधर भगवान के वस्त्र जैसी, भ्रमर, धनुष, हर के कंठ, तथा अरुण पुष्पों के समान विविध रंग-बिरंगे फूल भी मिलते हैं। कुछ फूल स्वच्छ जलाशयों के जल जैसे, कुछ जल की आभा जैसे, और कुछ मयूरों के समूह की छटा जैसे होते हैं। इन फूलों में एक विशेषता है—वे अपने-अपने रंग में अद्वितीय शोभा से दीप्त रहते हैं, और मिट्टी, पत्थर तथा शिला की दरारों के भय से जुड़े रहते हैं। इन्हीं स्थानों से वे रत्न उत्पन्न होते हैं, जिनकी वहाँ प्रशंसा की जाती है। पद्मराग मणि के गुण, जब उसे धारण किया जाता है, प्रकट होते हैं। पद्मराग के तीन प्रकार के उद्गम माने गए हैं। इसके परीक्षण और परख के लिए विशेष विधियाँ बताई गई हैं। इसमें यह भी देखा जाता है कि वह अग्नि को किस हद तक सहन कर सकता है—यह परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि उसके गुणों की वृद्धि के लिए की जाती है। यदि उसकी अग्नि सहन करने की क्षमता का ठीक से ज्ञान न हो, तो जलने के दोष से उसका स्वरूप बिगड़ जाता है। ज्ञानीजन कांच, नीलकमल, करवीर, स्फटिक और बिलौर जैसे पत्थरों के साथ-साथ वैदूर्य मणि को भी पहचानते हैं। इन सबमें भार और कठोरता को सदैव समझना चाहिए। जैसे कुछ नीलमणि में तांबे जैसी आभा होती है, वैसे ही नीले पत्थर की आभा उसके मध्य में इंद्रधनुष के तेज के समान चमकती है। अत्यधिक रंग के कारण वह सौ गुना गाढ़े दूध में भी अपनी आभा बनाए रखता है। उत्तम पद्मराग मणि का मूल्य माषा के बीजों से तौलकर निर्धारित किया जाता है। इसी प्रकार, पद्मराग और इन्द्रनील के परीक्षण का अध्याय पूर्ण होता है। आगे, वैदूर्य और पद्मराग मणि के संबंध में बताया गया है कि ये कर्केता और भीष्मक नामक स्थानों में मिलते हैं। जब युग के अंत में समुद्र मंथन हुआ, तब असुर की ध्वनि से कंपन उत्पन्न हुआ, और उस ध्वनि के कारण जो खानें बनीं, वे उत्तम गुणों से युक्त हो गईं। असुरों के स्वामी के रत्न, जिनकी गर्जना मेघों के समान है, वे भी सुंदर होते हैं। पृथ्वी में पाए जाने वाले रत्नों के रंग भी पद्मराग के समान अनेक प्रकार के होते हैं। इनमें सबसे श्रेष्ठ वह है, जिसका रंग मयूर के कंठ के समान नीला हो, या फिर वह बांस की पत्ती जैसा प्रतीत हो। उत्तम वैदूर्य मणि अपने स्वामी को अन्य लोगों में विशेष तेज प्रदान करती है। पर्वतीय कांच, नव कांच और स्फटिक—ये सब धुएँ के संपर्क में आकर टूट जाते हैं। जिनमें कोई लेख या चिह्न न हो और जो हल्के हों, उन्हें नव कांच समझना चाहिए। उत्तम इन्द्रनील का मूल्य स्वर्ण मुद्राओं की संख्या से आंका जाता है। प्रत्येक रत्न के लिए, उसकी सभी जातियों को, यदि वे समान रंग की हों, भली-भांति समझना चाहिए। विवेकी मनुष्य को यह भेद सदैव सावधानीपूर्वक देखना चाहिए, क्योंकि यह आसानी से पहचाना जा सकता है। रत्नों के उपयोग में कुशल और अकुशल दोनों प्रकार के लोग रहते हैं, और उचित-अनुचित प्रकार से उन्हें बाँधा जाता है। जो रत्न पहले थे, जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे—वे सब रत्न कंगन में सावधानीपूर्वक जड़े जाते हैं। जो रत्न पूर्वकाल में थे, उनकी खानें समुद्र के तट के समीप पाई जाती थीं। स्वर्ण के संबंध में मनु ने बताया है कि एक स्वर्ण मुद्रिका का भार सोलह माषा होता है। एक सूत्र चार माषा का होता है और एक माषा पाँच कृष्णल का होता है। इस प्रकार, गरुड़ महापुराण में रत्नों की उत्पत्ति, गुण, परीक्षण, मूल्य और उनके विविध रूपों का विस्तारपूर्वक एवं श्रद्धापूर्वक वर्णन किया गया है।