गरुड़ महापुराण के पूर्व खंड के आचार विभाग के इस अध्याय में दान के धर्म का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि प्रतिदिन जो व्यक्ति बिना प्रतिफल की इच्छा के किसी को दान देता है, या पापों की शुद्धि के लिए विद्वान ब्राह्मण को दान देता है, अथवा संतान, विजय, धन या स्वर्ग की कामना से दान करता है, वह पुण्य प्राप्त करता है। विशेष रूप से, जब ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण को भगवान की प्रसन्नता के लिए दान दिया जाता है, तब उसका फल और भी महान होता है। इस शास्त्र में भूमि दान को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। चाहे वह गन्ना, जौ, गेहूं या धान से बोई गई भूमि हो, उसके दान से बढ़कर कोई दान न पहले कभी हुआ है, न आगे होगा। प्रतिदिन अपने हाथों से, श्रद्धा सहित, ब्रह्मचारी छात्र को दान देना चाहिए। वैशाख पूर्णिमा के दिन, सात या पाँच ब्राह्मणों को, धूप-दीप आदि से पूजन कर, वेदपाठ करवा कर अथवा स्वयं पाठ कर, दान देना चाहिए। ऐसा करने से जीवन में किए गए सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति ब्राह्मण को दान देता है, वह सभी पापों से पार हो जाता है। यदि धर्मराज के लिए संकल्प कर ब्राह्मण को दान दिया जाए, तो दाता सभी भय से मुक्त हो जाता है, और यह निश्चित है कि वह समस्त पापों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है। ब्राह्मणों का सत्कार करना, स्त्रियों और देवताओं को भोजन देना भी श्रेष्ठ माना गया है। जो ब्रह्मतेज की इच्छा रखता है, उसे दृढ़ संकल्प से ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए। जो अपने कर्मों में सफलता चाहता है, उसे विनायक की पूजा करनी चाहिए। जो संसार से मुक्ति चाहता है, उसे हरि की उपासना करनी चाहिए। पानी का दान करने वाला संतुष्टि पाता है, भोजन का दाता अनंत सुख प्राप्त करता है, भूमि का दाता सर्वस्व पाता है, और सुवर्ण का दाता दीर्घायु होता है। वस्त्र दान करने वाला चंद्रलोक को, घोड़े का दाता अश्विनीकुमारों के लोक को, वाहन या शय्या का दाता पत्नी को, और धन का दाता अभय को प्राप्त करता है। वेदज्ञान की इच्छा रखने वाले को दान देने से विद्या मिलती है और वह स्वर्ग में पूजित होता है। ईंधन दान करने वाले को प्रज्वलित अग्नि मिलती है। दान करने वाला रोगरहित, सुखी और दीर्घायु होता है। जूते या छाता दान करने वाला प्रचंड गर्मी से बच जाता है। जो अक्षय पुण्य चाहता है, उसे योग्य पात्र को दान देना चाहिए। संक्रांति आदि विशेष अवसरों पर किया गया दान अक्षय होता है। इस लोक में प्राणियों के बीच दान से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। किंतु, यदि कोई व्यक्ति मोहवश गाय, ब्राह्मण, अग्नि या देवताओं को दान देता है, तो उसका फल नहीं मिलता। और जो व्यक्ति अकाल में भोजन नहीं देता, वह भी दोषी होता है। इसी प्रकार, दान धर्म के विस्तार के पश्चात प्रायश्चित्त की विधि का भी वर्णन किया गया है। हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं प्रायश्चित्त का विधान बताता हूँ। पाँच प्रकार के पापी होते हैं और उनके साथ रहने वाला पाँचवाँ पापी कहलाता है। यदि कोई ब्राह्मण हत्या का पाप करता है, तो उसे बारह वर्ष तक वन में कुटिया बनाकर निवास करना चाहिए। वह स्वेच्छा से अग्नि में प्रवेश कर सकता है या जल में डूब सकता है। यदि वह विद्वान व्यक्ति को भोजन देता है, तो ब्रह्महत्या का पाप दूर हो जाता है। अथवा वह अपनी सारी संपत्ति वेदज्ञ ब्राह्मण को दान कर दे, तो भी पाप क्षय हो जाता है। तीन बार स्नान और तीन रात उपवास करके जब वह शुद्ध होता है, तब वह पवित्र माना जाता है। जहाँ कपाल छूटता है, वहाँ स्नान करने के बाद तथा वाराणसी में स्नान करने के बाद, दुग्ध, घृत या गोमूत्र का सेवन करने से, वह व्यक्ति उस पाप से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार, गरुड़ महापुराण के इस अध्याय में दान के महत्त्व, उसके फल और प्रायश्चित्त की विधियों का विस्तार से निरूपण किया गया है।