एक बार, किसी ने अपने जीवन में बहुत दुःख और कष्ट देखे थे। ऐसे में उसके मन में यह प्रश्न उठा कि वहाँ धर्म की क्या स्थिति है? इसी कारण उसका हृदय संदेह से कांप उठा। वह अपने गुरु से विनती करता है, ‘‘हे महर्षि! आप समर्थ हैं, कृपया मेरे मन से यह संदेह दूर करें। ज्ञान की नौका से मुझे संसार सागर से पार कर दें, क्योंकि मैं मोह के कीचड़ में डूबता-उतराता जा रहा हूँ।’’ अब कथा आगे बढ़ती है। व्यासजी कहते हैं, ‘‘हे महाबाहु! जो प्रश्न तुमने मुझसे पूछे हैं, वही प्रश्न मैंने पहले नारदजी से पूछे थे, और नारदजी ने मुझे जो उत्तर दिया, वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ।’’ नारदजी कहते हैं, ‘‘व्यासजी, आज मैं तुम्हें क्या बताऊँ? बहुत समय पहले यही संदेह मेरे मन में भी उठा था और मैं भी भारी असमंजस में पड़ गया था। तब मैं अपने पिता, परम तेजस्वी ब्रह्माजी के पास गया और उनसे वही उत्तम प्रश्न पूछा, जो आज तुमने मुझसे पूछा है। मैंने पूछा, ‘हे पिता! यह सम्पूर्ण जगत् कहाँ से उत्पन्न हुआ? क्या इसका सृजन आपने किया है, या वास्तव में यह विष्णु का कार्य है? या फिर यह रुद्र द्वारा रचा गया है, हे विश्वात्मा? कृपया सत्य बताइए—किसकी पूजा करनी चाहिए, कौन सर्वश्रेष्ठ स्वामी है?’ ‘हे ब्रह्मन्! कृपा करके मेरे सारे संदेह दूर करें, क्योंकि मैं इस दुःखमय, मिथ्या-जैसे संसार में डूबा हुआ हूँ। मेरा चित्त संदेह से विचलित है—न तीर्थों में, न देवताओं में, न अन्य किसी साधन में मुझे शांति मिलती है। जब तक परम सत्य का ज्ञान न हो, तब तक शांति कैसे मिले? मन तो अनेक दिशाओं में भटकता है, एकाग्र नहीं होता। मैं किसका स्मरण करूँ, किसकी पूजा करूँ, किसका आश्रय लूँ, किसका सम्मान करूँ, किसकी स्तुति करूँ? हे प्रभो, मैं नहीं जानता—आप ही सबके स्वामी हैं।’’ नारदजी आगे कहते हैं, ‘‘तब ब्रह्माजी, जो जगत् के पितामह हैं, ने मुझे उत्तर दिया, ‘हे सत्यवती के पुत्र! तुमने जो प्रश्न किया है, वह अत्यंत कठिन है। हे बालक! यह प्रश्न अत्यंत श्रेष्ठ है, परंतु इसे समझना बड़ा दुष्कर है। न तो तुम, न ही स्वयं विष्णु, इसे निश्चयपूर्वक बता सकते हो। जो लोग आसक्त हैं, वे इस रहस्य को नहीं जान सकते; केवल वे ही जान सकते हैं, जो राग-द्वेष से रहित, निर्लिप्त और विरक्त हैं।’’ ‘‘बहुत समय पहले, जब केवल एक महासागर था और सब जड़-चेतन नष्ट हो गए थे, केवल तत्त्व शेष थे, तब मैं कमल से उत्पन्न हुआ। मैंने न सूर्य देखा, न चंद्रमा, न वृक्ष, न पर्वत—कुछ भी नहीं। मैं कमल के भीतर बैठकर विचार करने लगा—‘मैं इस विशाल सागर में क्यों उत्पन्न हुआ हूँ? मेरा रक्षक, स्वामी, स्रष्टा या संहारकर्ता कौन है?’ पृथ्वी भी स्पष्ट दिखाई नहीं देती थी, क्योंकि सब ओर जल ही जल था। यह कमल, जो कीचड़ और वृद्धि का प्रतीक है, कैसे उत्पन्न हुआ? आज मैं इसकी जड़ और कीचड़ देख पा रहा हूँ। निश्चित ही, इसकी जड़ में पृथ्वी होगी। ‘‘मैंने जल में उठकर हजार वर्षों तक पृथ्वी की खोज की, पर वह नहीं मिली। तभी आकाश से एक देह-रहित वाणी सुनाई दी—‘तप करो, तप करो।’ तब मैंने कमल पर बैठकर हजार वर्षों तक कठोर तपस्या की। फिर वही वाणी पुनः सुनाई दी—‘सृजन करो!’ मैं उलझन में पड़ गया—किसका सृजन करूँ, क्या करूँ? ‘‘इसी समय, दो भयंकर दैत्य—मधु और कैटभ—प्रकट हुए। उनसे भयभीत होकर मैं समुद्र की ओर भागा। मैं उनका सामना नहीं कर सका, तो जल के भीतर चला गया। वहाँ मैंने एक अद्भुत पुरुष को देखा—उनका शरीर मेघ के समान श्याम, पीतांबर धारण किए, चार भुजाएँ, वनमाला से शोभायमान, शेषनाग की शय्या पर विराजमान, शंख, चक्र, गदा और पद्म आदि आयुधों से सुशोभित, वे महान विष्णु थे। ‘‘वे योगनिद्रा से आविष्ट, अचल, अविनाशी थे—शेषनाग की कुंडलियों पर शयन कर रहे थे। उन्हें देखकर मेरे मन में यह विचार आया—‘अब मैं क्या करूँ?’ तब मुझे देवी की याद आई, जो निद्रा स्वरूपा हैं, और मैंने उनकी स्तुति की। ‘‘वे शुभ देवी विष्णु के शरीर से निकलकर आकाश में प्रकट हुईं—उनका रूप अनिर्वचनीय था, वे दिव्य आभूषणों से सुसज्जित थीं। विष्णु के शरीर से निकलकर वे आकाश में चमक उठीं। उनके प्रभाव से जनार्दन (विष्णु) निद्रा से मुक्त हुए और उनका अदम्य स्वरूप जागृत हुआ। फिर विष्णु ने पाँच हजार वर्षों तक उन दैत्यों से महान युद्ध किया और अंततः उन्हें मार गिराया। उस स्थान को शुद्ध करके, वहीं रुद्र भी आ पहुँचे, जहाँ हम दोनों उपस्थित थे। ‘‘हम तीनों ने वहाँ उस मनोहर, शांत देवी के दर्शन किए। हमने उनकी स्तुति की, तब वे परम शक्ति देवी हमसे बोलीं। उनकी करुणा भरी दृष्टि से हम प्रसन्न और शुद्ध हो गए। देवी ने कहा, ‘हे सृष्टिकर्ताओं! अपने-अपने कार्यों को मन लगाकर करो। बड़े दैत्य मारे जा चुके हैं—अब सृजन, पालन करो और अपने-अपने धामों में निश्चिंत होकर निवास करो। अपनी-अपनी शक्तियों से चार प्रकार के जीवों की सृष्टि करो।’ ‘‘देवी के मधुर, कोमल वचनों को सुनकर हमने उनसे कहा, ‘हे माता! हम इन जीवों की सृष्टि कैसे करें? अभी पृथ्वी फैली नहीं है, चारों ओर केवल जल ही जल है। न कोई जीव हैं, न गुण, न सूक्ष्म तत्त्व, न इंद्रियाँ।’ हमारी बात सुनकर देवी मुस्काईं और उनका मुखमंडल तेजस्वी हो गया। ‘‘अचानक आकाश से एक दिव्य विमान प्रकट हुआ। देवी ने कहा, ‘हे देवगण! निर्भय होकर जैसे चाहो, उस विमान में प्रवेश करो।