धर्मराज यम और सावित्री के संवाद में, यमराज धर्म के गूढ़ रहस्यों को विस्तार से समझाते हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति देवता की मूर्ति, योग्य गुरु या ब्राह्मण को देखकर भी आदर न करे, तो वह दोष का भागी बनता है। यदि कोई द्विज, क्रोधवश, प्रणाम करने वाले को आशीर्वाद न दे, तो उसे भी दोष लगता है। गौहत्या और ब्रह्महत्या को विशेष रूप से घोर पाप माना गया है। सावित्री ने जिज्ञासा से पूछा—“इन पापों में अधिक और कम का क्या अंतर है? कृपया मुझे समझाइए।” यमराज ने उत्तर दिया, “पुत्री, अधिक, कम और अत्यधिक में क्या अंतर है, और वेद के अनुसार दोनों में समानता कहाँ है, यह समझना चाहिए। प्राचीनकाल में जो ब्राह्मण वेदज्ञान और मंत्र देते थे, उनके लिए विशेष महत्व बताया गया है। माता को पिता से सौ गुना श्रेष्ठ कहा गया है, और पिता भी माता से सौ गुना बड़ा है। गुरु और गुरु-पत्नी दोनों का अत्यंत सम्मान करना चाहिए। ब्राह्मण शिव के समान हैं और उनकी शक्ति विष्णु के बराबर है। समस्त जल गंगा के समान है और सभी द्विज व्यास के समान माने गए हैं। यदि कोई गुरु की हत्या करता है, तो वह सामान्य हत्या से चार गुना अधिक पाप का भागी होता है। इस प्रकार गुरु-हत्या का भेद भी स्पष्ट किया गया है। वेद में कहा गया है कि अपनी पत्नी ही सब प्रकार से योग्य है। अब तक जो सामान्य बातें बताई गईं, अब विशेष बातें सुनो। यदि कोई शूद्र, ब्राह्मणी के पास जाता है, तो उसे सौ ब्रह्महत्या के बराबर पाप लगता है। यदि कोई ब्राह्मण शूद्र स्त्री के पास जाता है, तो वह केवल चांडाल की पति बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का भोजन त्याज्य है, और उसके द्वारा दी गई तर्पण भी मल-मूत्र के समान अपवित्र मानी जाती है। करोड़ों जन्मों तक संचित पुण्य—पूजा, संध्यावंदन, तपस्या से अर्जित—सब नष्ट हो जाते हैं यदि ब्राह्मण मद्यपान करे, मल खाए या चांडालिन का पति बने। गुरु-पत्नी, राज-पत्नी, सौत की माता, अपनी माता, सहोदरा के पति की पत्नी, मामा की पत्नी, पिता की पत्नी, शिष्या, शिष्य की पत्नी, या बहन के पुत्र की प्रिया—इनमें से किसी के भी पास जाने वाला पुरुष सबसे अधम कहलाता है। वह किसी भी धार्मिक कर्म में अयोग्य और समाज में अछूत होता है, वेदों में भी उसकी घोर निंदा की गई है। जो अशुद्ध होकर या संध्यावंदन न करके संध्योपासना करता है, वह भी दोषी है। वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर्य, गणपत्य—इन सभी के लिए भी नियम हैं। चार अंजलि जल की मर्यादा तक, जो दान की सीमा है, वही स्वीकार्य है। कुरुक्षेत्र में नारायण क्षेत्र, हरि का निवास, पुष्कर, सूर्य क्षेत्र, प्रभास, रासमंडल, सरस्वती के तट, वृंदावन—इन सभी पवित्र स्थानों में या कहीं भी, जो लोभवश दान स्वीकार करता है, वह दोषी है। जो शूद्र के लिए यज्ञ करता है, या गाँव के लिए यज्ञ करता है, उसे भी दोष बताया गया है। जो शूद्रों के लिए भोजन बनाकर जीविका चलाता है, वह ‘रसोईया’ कहलाता है। चांडालिन के पति की पहचान पहले ही बताई जा चुकी है; अब अन्य दोषों की बात सुनो। यमराज आगे कहते हैं—“पुण्य कर्म स्वर्ग का बीज है, और पाप कर्म नरक का कारण। जो पुरुष वेश्या के हाथ का भोजन खाता है, या कोई पतिव्रता स्त्री वेश्या के घर का भोजन ग्रहण करती है, वे सौ वर्षों तक समय के बंधन में फँसकर अंततः शूद्र बन जाते हैं।” इस प्रकार यमराज ने धर्म के गूढ़ रहस्यों को सावित्री के समक्ष विस्तारपूर्वक प्रकट किया।