इन शास्त्रीय श्लोकों के अनुसार, बारह देवताओं का एक समूह है, जिन्हें ‘सुधामान’ कहा जाता है। इनके नाम हैं—विश्वधा, विश्वकर्मा, मानस, विराजस, अवध्य, अव्रति, देव, वसुर, धिष्ण्य, विभावसु, रथोर्मी, केतुमान, प्रतर्दन, सुदान, वसुदान, सुमञ्जस, और विशाव। ये सभी अत्यंत शुभ माने जाते हैं और यज्ञों में पूजन योग्य बारह अतिरिक्त देवता माने गए हैं। इसके अतिरिक्त, दिक्पति, वाक्पति, विश्व और शम्भु, अश्व, सदश्व, क्षेम और आनन्द—ये भी उसी प्रकार के पूज्य देवता हैं। ये सभी देवता उत्तम मनु के काल में विद्यमान थे। उस समय अंगिरा के पुत्र ही उत्तम मनु के वंशज माने गए और वही सात ऋषि उस युग में प्रतिष्ठित हुए। देवाम्बुज, अप्रतिम—जो दोनों अत्यंत तेजस्वी थे—और गज भी उस समय के प्रसिद्ध पुत्र थे। इस प्रकार, उत्तम मनु को तेरह पुत्र प्राप्त हुए और उनकी सृष्टि स्वारोचिष मन्वंतर की गणना में आती है। इसके बाद, चौथे चक्र में तामस मनु का काल आता है। उस युग में पुलस्त्य के पुत्र देवता बने। उस समय के ऋषि इन्द्रियों के प्रतिनिधि माने गए और स्वयं इन्द्रियां ही देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। अब सात ऋषियों के नाम सुनिए—अत्रि, जो अग्नि हैं; ज्योतिर्धामा, जो भार्गव हैं। तामस मन्वंतर में चैत, प्रियभृत्य, परीक्षि, प्रस्थल, दृढ़ेषुधि आदि ऋषि माने गए। अब पाँचवें चक्र, अर्थात् स्वारोचिष मन्वंतर की बात करें तो, उस समय अमिताभ, भूतिरय, वैकुण्ठ और सुमेधस नामक देवता थे। इनकी चार मंडलियाँ थीं, जो अत्यंत तेजस्वी थीं। इनके साथ सुमति, विराव, धामा, नाद और श्रवास भी उपस्थित थे। इन्हें स्वारोचिष मन्वंतर के अमिताभ देवताओं के रूप में जाना गया। अधृति, विधृति, दम, नियम—ये भी उसी काल के अभूतय समूह के नाम हैं। नाथ, विद्वान, अजेय, कृश, गौर, ध्रुव—ये भी उस युग में थे। मेधा, मेधा, तिथि, सत्यमेधा, दीप्तिमेधा, यशोमेधा, स्थिरमेधा, मेधजा और मेधहंता—ये सभी सुमेधस के अंतर्गत आते हैं। उसी काल में पौलस्त्य, दवबाहु, और कश्यप नामक सुधामा भी थे। वसिष्ठ के वंशज ऊर्ध्वबाहु, पर्जन्य और पौलहस्त भी उपस्थित थे। महावीर्य, सुसंभाव्य, सत्यक, हरहा और शुचि—ये सभी रैवत के पुत्र थे, जो पाँचवें मन्वंतर में जन्मे थे। इन चारों मनुओं—उत्तम, तामस, स्वारोचिष और रैवत—को प्रियव्रत के वंशज के रूप में जाना जाता है। इन युगों में आदिकालीन, भविष्य के और असंख्य दिव्य प्राणी उत्पन्न हुए, जिन्हें माताओं के नाम से भी संबोधित किया जाता है। इस प्रकार, इन श्लोकों में हर युग की दिव्य संतानों, ऋषियों और देवताओं का विस्तार से वर्णन किया गया है, जो सृष्टि के क्रम और यज्ञ की परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।