जब अनेक मतों में परस्पर भिन्नता उत्पन्न हुई और उनके कारण भ्रम फैल गया, तब विचारों की विविधता और कारणों के भेद से, फल भी अनिश्चित हो गए। इसी प्रकार मतभेद रखने वाले विद्वानों द्वारा अनेक शास्त्रों की रचना हुई। समय के साथ, विशेषकर द्वापर युग में, आयु में कमी और धर्म के ह्रास के कारण ये शास्त्र बिखर गए। मंत्रों, ब्राह्मणों की व्यवस्था, स्वरों और अक्षरों में परिवर्तन के कारण, कुछ शास्त्र तो सामान्य रहे, पर जहाँ मतभेद था, वहाँ उनमें भी बदलाव आ गया। कुछ लोगों ने नये मार्ग प्रस्तुत किए, तो कुछ ने उनका विरोध किया। पहले एक ही आध्वर्यव शाखा थी, परंतु बाद में वह भी दो भागों में बँट गई। आध्वर्यव की विभिन्न विधियों के कारण उसमें भी भारी भ्रम उत्पन्न हुआ। द्वापर युग में यह यज्ञ-विधान सदा ही मतभेदों के साथ भ्रमित रूप में किया जाने लगा। द्वापर युग में तो यह किसी प्रकार चलता रहा, परंतु कलियुग में यह पूरी तरह नष्ट हो गया। कलियुग में अकाल, मृत्यु और रोगों की पीड़ा बढ़ गई। इन कष्टों से उत्पन्न वैराग्य के कारण लोग दुख से मुक्ति का मार्ग खोजने लगे। द्वापर युग में जब लोग दोषों को देखने लगे, तब अज्ञानता भी बढ़ी। इसी युग में शास्त्रों के पालन में भी अनेक बाधाएँ उत्पन्न हुईं। अर्थशास्त्र और तर्कशास्त्र में भी मतभेद फैल गए। स्मृति-शास्त्रों में भी विभाजन और अलग-अलग परंपराएँ बन गईं। कठिनाई से ही सही, लोग मन, वचन और कर्म से अपनी जीविका चलाने लगे। लोभ सामान्य हो गया, व्यापार ही मुख्य आजीविका बन गई, और सत्य स्वरूप का कोई निश्चित ज्ञान नहीं रहा। वर्ण और आश्रमों की व्यवस्था भी नष्ट होने लगी, कामना और क्रोध बढ़ गए। ऐसे समय में व्यासजी ने वेदों को चार भागों में विभाजित किया, ताकि ज्ञान बचा रहे। द्वापर में धर्म तो था, पर वह अपने गुणों से विहीन हो गया। अब सुनो, द्वापर के अंत और तिष्य (कलियुग प्रारंभ) में क्या होता है। तब हिंसा, ईर्ष्या, असत्य, छल और तपस्वियों की हत्या बढ़ जाती है। यह धर्म का पूर्ण पतन है, धर्म अत्यंत क्षीण हो जाता है। कलियुग में तो प्राणघातक रोग, सतत भूख और भय व्याप्त रहते हैं। तिष्य युग में स्मृति का कोई प्रमाण नहीं रह जाता। कलियुग में तो कुछ वृद्ध लोग बाल्यावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। ब्राह्मणों के कर्मों में दोष के कारण जनसमाज में भय फैल जाता है। तिष्य में सभी प्राणियों में आसक्ति और लोभ भर जाता है। जब हज़ार वर्ष पूर्ण होते हैं, तब मनुष्यों की अधिकतम आयु वही रह जाती है। फिर पुरुष, क्षत्रिय और सामान्य जन एक-एक करके पतन को प्राप्त होते हैं। कलियुग में लोग केवल सोने, बैठने और खाने के लिए ही जीते हैं। उस समय सद्गुणहीन लोग समाज में बढ़ जाते हैं। शूद्र ब्राह्मणों का आचरण अपनाते हैं, और ब्राह्मण शूद्रों का आचरण करने लगते हैं। युग के अंत में सेवकों की भी उचित देखभाल नहीं होती। हे श्रेष्ठ ऋषि, युग के अंत में छल-कपट में निपुण लोग ही दिखाई देंगे। जंगली पशु बलशाली हो जाते हैं, और गौओं की संख्या घट जाती है। उस घोर अंधकार में दान-आधारित धर्म भी दुर्लभ हो जाता है। उस समय भूमि भी बहुत कम फल देती है, यद्यपि कहीं-कहीं वह अधिक फलदायी भी होती है। इस प्रकार, युगों के परिवर्तन के साथ धर्म, समाज और जीवन की दशा निरंतर गिरती चली जाती है।