राजा सगर को संतान नहीं थी, जिससे वे अत्यंत चिंतित रहते थे। उन्होंने महान ऋषि वशिष्ठ को अपने घर आमंत्रित किया, उनका यथोचित सम्मान किया और फिर अपने पुत्र-संतान की चिंता का कारण उनसे निवेदन किया। राजा की बात सुनकर वशिष्ठ मुनि ने ध्यानपूर्वक विचार किया और फिर राजा से बोले, "हे राजन्, सदैव अपनी रानियों सहित ऋषियों का आदर-सत्कार करते रहो।" ऐसा उपदेश देकर वशिष्ठ अपने स्थान को लौट गए। कुछ समय बाद, तपस्या के भंडार वशिष्ठ मुनि पुनः राजर्षि सगर के घर पधारे। राजा ने उनका विधिवत पूजन किया। संतुष्ट होकर वशिष्ठ बोले, "हे भाग्यशाली राजन्, कोई वर मांगो।" राजा ने पुत्रों की कामना प्रकट की। तब वशिष्ठ ने कहा, "तुम्हारी एक रानी से वंश बढ़ाने वाला एक पुत्र होगा और दूसरी रानी से साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे।" वरदान देकर वशिष्ठ चले गए। समय आने पर राजा सगर के हजारों पुत्र उत्पन्न हुए। राजा ने अनेक यज्ञ, विशेषकर अश्वमेध यज्ञ, बड़े दान के साथ संपन्न किए। एक अश्वमेध यज्ञ में राजा ने विधिपूर्वक दीक्षा ली और अपने पुत्रों को सैन्य सहित यज्ञीय अश्व की रक्षा के लिए नियुक्त किया। इसी बीच इंद्र ने वह अश्व चुरा लिया। सगर के पुत्रों ने उसे बहुत खोजा, किंतु उस समय घोड़ा नहीं मिला। वे साठ हजार राजपुत्र, जो युद्ध-कला में निपुण थे, खोजते-खोजते राक्षसों को भी देखते रहे। अश्व को खोजते हुए वे पाताल लोक तक जा पहुँचे, किंतु मायावी राक्षसों को वे देख न सके। राजा के पुत्र घोड़े की खोज में इधर-उधर भटकते रहे, किंतु अश्व नहीं मिला। वे देवताओं के लोक, पर्वत, सरोवर, वन—सभी स्थानों में गए, फिर भी घोड़े का पता न चला। राजा ने जब यज्ञ की सभी शुभ विधियाँ पूरी कीं और आचार्यों से आशीर्वाद लिया, तब भी जब यज्ञ का सुंदर पशु नहीं दिखा, तो वे अत्यंत चिंतित हो उठे। सगर के सभी पुत्र समुद्रों के समान चारों ओर खोजते हुए देवताओं के लोक पहुँचे, किंतु वहाँ भी अश्व नहीं मिला। वे पुनः पृथ्वी पर लौटे, पर्वतों व वनों में खोजा, परन्तु घोड़ा नहीं मिला। तभी एक दिव्य वाणी हुई— "हे समुद्रों के समान पुत्रों, वह अश्व पाताल में बंधा है, अन्यत्र नहीं।" यह सुनकर सगर के पुत्र पाताल जाने की इच्छा से संपूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से खोदने लगे। भूख से व्याकुल वे दिन-रात सूखी पृथ्वी खाते हुए शीघ्र ही पाताल पहुँच गए। जब राक्षसों ने सुना कि सगर के बलशाली और पराक्रमी पुत्र, समुद्रों के समान, पाताल पहुँच गए हैं, तो वे भयभीत होकर कपिल मुनि के पास भाग गए। कपिल, महान ऋषि, पाताल में विश्राम कर रहे थे। प्राचीन काल में उन्होंने देवताओं के लिए अद्भुत कार्य किया था। देवकार्य पूर्ण कर वे थककर, देवताओं से बोले, "मुझे शयन के लिए स्थान दो।" देवताओं ने उन्हें पाताल लोक दिया। कपिल मुनि ने कहा, "जो मुझे अज्ञानवश जगाएगा, वह तुरंत भस्म हो जाएगा।" वे बोले, "यदि मैं सोया न भी रहूँ, तो भी स्वप्नवत ही हूँ।" ऐसा कहकर वे पाताल में शयन करने लगे। कपिल मुनि की शक्ति जानकर मायावी राक्षसों ने समुद्रों (सगर पुत्रों) के विनाश का उपाय सोचा। युद्ध से डरकर वे शीघ्रता से कपिल मुनि के पास पहुँचे और यज्ञीय अश्व को उनके सिरहाने बांध दिया। फिर वे दूर खड़े होकर चुपचाप देखने लगे कि आगे क्या होता है। सगर के सभी पुत्र पाताल में प्रवेश कर वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने अश्व बंधा और एक पुरुष शयन करते देखा। उन्होंने उसे ही घोड़े का चोर और यज्ञ का विध्वंसक समझा। वे बोले, "इस महान पापी को मारकर अश्व लेकर राजा के पास चलें।" कुछ ने कहा, "केवल अश्व ले चलें, इससे क्या लेना?" परन्तु अन्य क्षत्रिय वीर बोले, "हम शासक हैं।" फिर उन्होंने उस पुरुष को उठाया, कठोर वचन कहे और क्षत्रिय बल का घमंड करते हुए पैरों से कपिल मुनि को ठोकरें मारीं। तब महान क्रोध से भरकर कपिल मुनि ने उन पर दृष्टि डाली और अपने कोप से उन्हें भस्म कर दिया। वहीं सगर के समस्त पुत्र तत्काल अग्नि में जलकर भस्म हो गए। राजा सगर, जो यज्ञ में दीक्षित थे, इस घटना से अनजान रहे। तब नारद ने राजा सगर को कपिल मुनि की स्थिति और अश्व की दशा बताई। उन्होंने राक्षसों के क्रूर कर्म और सगर पुत्रों के विनाश का वृत्तांत सुनाया। यह सुन राजा अत्यंत व्याकुल हो उठे और समझ नहीं पाए कि अब क्या करना चाहिए। राजा सगर का एक अन्य पुत्र था, जिसका नाम असमंजस था। वह मूर्खतावश नगर के बच्चों को जल में फेंक देता था। जब नगरवासियों ने एकत्र होकर राजा को उसके दुष्कर्मों की सूचना दी, तो सगर क्रोधित हुए और आज्ञा दी— "इस असमंजस को देश निकाला दो; उसने क्षत्रिय धर्म का परित्याग कर बच्चों की हत्या की है।" राजा की आज्ञा सुनकर मंत्रीगण शीघ्रता से असमंजस को वन में भेज आए। इस प्रकार सगर के समस्त पुत्र ब्रह्मा के शाप से पाताल में नष्ट हो गए। अब केवल एक पुत्र वन में रह गया था। राजा सगर सोचने लगे— "अब मेरे लिए कौन सा मार्ग शेष रह गया है?