सभी भक्तों ने श्रद्धा से भूमि पर दण्डवत प्रणाम किया और विनम्रता के साथ प्रभु की कृपा प्राप्त की। उसी क्षण से सत्यनारायण की पूजा का महात्म्य और उसका अनुष्ठान पूरे संसार में फैल गया। इसी समय चंद्रचूड़ नामक एक राजा थे, जो अपने प्रजा की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते थे। वे अत्यंत शांत, मधुर भाषी, अडिग और नारायण के प्रति अत्यंत भक्तिपूर्ण थे। लेकिन एक अवसर पर उनके साथ एक भयंकर और अत्यंत शक्तिशाली युद्ध छिड़ गया। चंद्रचूड़ की विशाल सेना यमपुरी की ओर चली गई। इस युद्ध में उनके पाँच हज़ार पैदल सैनिक मारे गए और स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। सौभाग्यशाली चंद्रचूड़ पर छलपूर्वक म्लेच्छों ने आक्रमण किया। तब वह राजा तीर्थयात्रा के बहाने काशी नगरी पहुँचे। काशी नगरी को उन्होंने धन-धान्य से सम्पन्न देखा, और उस अनुपम वैभव को देखकर चंद्रचूड़ अचंभित रह गए। वहाँ उन्होंने सत्यदेव के परम भक्त सदानंद के विषय में सुना और उन्हें देखा। वे बोले, “हे द्विजराज! हे महाज्ञानी सदानंद, आपको प्रणाम!” सदानंद ने उन्हें बताया कि जैसे लक्ष्मीपति जनार्दन प्रसन्न होते हैं, वैसे ही वे भक्तों को समृद्धि, संतान और सर्वत्र विजय प्रदान करते हैं। सत्यनारायण व्रत से श्रीपति अत्यंत संतुष्ट होते हैं। सदानंद ने बताया कि व्रत के लिए केले के स्तंभों से सुसज्जित एक तोरण बनवाना चाहिए। उसके मध्य में द्विजों द्वारा सुंदर वेदी का निर्माण कराना चाहिए। फिर भक्त को प्रेमपूर्वक सुगंधित द्रव्यों आदि से विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। यह सब सुनकर चंद्रचूड़ ने काशी में विधिवत् सत्यनारायण की पूजा की। उस श्रेष्ठ राजा को शत्रुओं का संहार करनेवाली एक दिव्य तलवार प्राप्त हुई। उसने साठ डाकुओं के दलों का संहार कर, उनसे अपार धन संपत्ति प्राप्त की। फिर हर पूर्णिमा को, विधिपूर्वक, वह राजा इस व्रत का अनुष्ठान करने लगा। इस व्रत के प्रभाव से वह एक लाख गाँवों का अधिपति बन गया। यहीं इस कथा के छब्बीसवें अध्याय का समापन होता है, जिसका नाम है "चंद्रचूड़ का उत्थान", जो भविष्यमहापुराण के प्रतिसर्ग पर्व में कलियुग की कथाओं के अंतर्गत आता है। इसके पश्चात, वन में लकड़ी काटनेवाले निषाद लोग सदैव लकड़ी लेकर यहाँ-वहाँ भटकते थे। कभी-कभी वे वन की लकड़ी बेचने काशी नगरी आते। वहाँ उन्होंने देखा कि हरि, द्विजों से सेवित, महान वैभव से युक्त हैं। उन्होंने देखा कि जो ब्राह्मण कभी दरिद्र था, आज वह अत्यंत धनवान हो गया है। वे आश्चर्य से पूछने लगे, “हे ब्राह्मण! तुम्हें यह संपत्ति कहाँ से मिली? तुम्हारा दुर्भाग्य कहाँ चला गया? बिना प्रभु की कृपा के किसी को सुख नहीं मिलता। आप हमें विधिपूर्वक समस्त विधि समझाइए, क्योंकि आप सदैव समानचित और उपकारी हैं।” उनके प्रश्न करने पर ब्राह्मण ने उन्हें सत्यनारायण व्रत की विधि और कथा सुनानी आरंभ की। उन्होंने कहा, “वह मेरे आश्रम में आया और सत्यनारायण की पूजा की। मैंने जो कुछ बताया, उसे सुनो, हे निषादजनों! आधा माप गेहूँ का आटा, उसमें चीनी तथा अन्य सामग्री मिलाकर तैयार करो। फिर पंचामृत से भगवान का अभिषेक कर, चंदन आदि से पूजा करो। विविध फल, फूल, धूप, दीप और जल अर्पित करो, चाहे वह छोटा हो या बड़ा। लेकिन जान लो, भगवान को वस्तुओं से उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी शुद्ध भक्ति से होती है।” इस प्रकार सत्यनारायण व्रत की महिमा और उसकी विधि का विस्तार से वर्णन हुआ।