राजा युधिष्ठिर के हृदय में अत्यन्त हर्ष व्याप्त था। पुत्र के जन्म के शुभ अवसर पर उन्होंने ब्राह्मणों—धौम्य, कृपाचार्य और अन्य श्रेष्ठजनों—को बुलवाया, और उनसे शिशु की ज्योतिषी कुण्डली बनवाई। साथ ही, उन्होंने सभी मंगल-कर्मकाण्ड भी सम्पन्न करवाए। धर्मज्ञ राजा ने उस पवित्र जन्म-स्थल पर ब्राह्मणों को सुवर्ण, गौएँ, भूमि, गाँव, हाथी, घोड़े तथा उत्तम अन्न आदि दानस्वरूप प्रदान किए। ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर विनीत राजा से कहा, “हे पुरुवंश-शिरोमणि! आपके कुल में यह बालक ही वह परम पुरुष है। काल के प्रबल प्रवाह में जब श्वेत केश अन्त की ओर बढ़े, तब भगवान् विष्णु की प्रेरणा से यह बालक आपके कुल के कल्याण के लिए आया है।” उन्होंने आगे कहा, “इसलिए यह बालक संसार में ‘विष्णुरात’—अर्थात् विष्णु द्वारा रक्षित—के नाम से विख्यात होगा। इसमें तनिक भी संशय नहीं कि यह महान भक्त और महात्मा होगा।” युधिष्ठिर ने जिज्ञासा प्रकट की, “क्या यह बालक हमारे वंश के पूर्वज राजर्षियों की भाँति धर्ममय मार्ग का अनुसरण करेगा? वे राजर्षि जो पुण्यशील, सुकीर्ति-सम्पन्न और सत्पुरुषों द्वारा प्रशंसित थे?” ब्राह्मणों ने उत्तर दिया, “हे पृथापुत्र! यह बालक प्रजाओं का सच्चा रक्षक होगा—मनुष्यों में इक्ष्वाकु के समान, ब्राह्मणों का भक्त और सत्यनिष्ठ, जैसे दशरथपुत्र राम। यह दानी और शरणदाता होगा, जैसे औशीनर वंश के शिबि; अपने कुल की कीर्ति फैलाएगा, जैसे यज्ञों में दुष्यन्तपुत्र भरत। धनुषविद्या में यह दोनों अर्जुनों के समकक्ष होगा; अग्नि के समान अजेय और समुद्र के समान दुर्गम। पशुओं में सिंह के समान पराक्रमी, हिमालय के समान अडोल, पृथ्वी के समान सहिष्णु, और अपने माता-पिता के समान क्षमाशील होगा। अपने पितामह के समान निष्पक्ष, शिव के समान कृपालु, और समस्त प्राणियों के लिए शरणदाता होगा, जैसे भगवान् लक्ष्मी के लिए हैं।” ब्राह्मणों ने आगे कहा, “यह श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त होगा, सभी उत्तम गुणों से युक्त; दान में रन्तिदेव के समान और धर्म में ययाति के समान। स्थिरता में बली के समान, कृष्णभक्ति में प्रह्लाद के समान, यह अश्वमेध यज्ञ करेगा और बड़ों की सेवा करेगा। यह राजर्षियों का वंशवर्धन करेगा, धर्म के लिए पथभ्रष्टों को दण्ड देगा और पृथ्वी पर कलियुग को वश में रखेगा। जब तक्षक, ऋषिपुत्र के भेजे जाने पर, इसके मृत्यु की सूचना देगा, तब यह सब मोह त्यागकर भगवान् हरि के धाम को प्राप्त करेगा। आत्मतत्त्व की जिज्ञासा में यह व्यासपुत्र शुकदेव से सुनते हुए, गंगा के तट पर शरीर त्यागकर निडरता से परमगति को प्राप्त होगा।” राजा और ब्राह्मणों के बीच यह संवाद सम्पन्न हुआ। ब्राह्मणों को यथोचित सम्मान देकर राजा ने विदा किया। उस बालक का नाम ‘परिक्षित’ पड़ा, क्योंकि वह पूर्वजन्म की अनुभूति के कारण संसार में मनुष्यों की परीक्षा करता रहेगा। वह राजकुमार चन्द्रमा के शुक्लपक्ष के समान प्रतिदिन बढ़ता गया, और पिता द्वारा जैसे समिधा से अग्नि पोषित होती है, वैसे ही वह भी बढ़ता गया। युधिष्ठिर ने अपने सगे-सम्बन्धियों के प्रति अपराध के प्रायश्चित्त हेतु अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया, किन्तु कर-शुल्क के अतिरिक्त अन्य उपायों से धन संचय का विचार करने लगे। उनकी भावना जान, अच्युत के प्रेरणा से उनके भ्राताओं ने उत्तर दिशा से विपुल धन ला दिया। इस प्रकार एकत्रित सम्पदा से धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने तीन अश्वमेध यज्ञ किए और अत्यन्त श्रद्धा और भय के साथ भगवान् हरि की पूजा की। राजा के आमंत्रण पर भगवान् श्रीकृष्ण, ब्राह्मणों से अभिषेक कराकर, कुछ मास तक अपने मित्रों के प्रेमवश वहाँ ठहरे। फिर राजा की आज्ञा से श्रीकृष्ण, अर्जुन और यादवों के साथ द्वारका के लिए प्रस्थान कर गए। हरि की यह बाल्य-क्रीड़ा—अपने भक्त की रक्षा—व्रज के बालकों ने भी अपनी किशोरावस्था में देखी और आश्चर्यचकित होकर उसका वर्णन किया। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि परमेश्वर स्वयं मनुष्य रूप में लीलाएँ करते हैं; उनके स्पर्श से अघासुर जैसे पापी भी आत्मसाक्षात्कार की दुर्लभ स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं। जिसने एक बार भी भगवान् का ध्यान मन में किया, वह परम भक्ति-पथ को प्राप्त कर गया; तो जो मोह-रहित होकर नित्य आत्मानन्द में स्थित है, उसका क्या कहना! सूतजी बोले, “हे द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं का श्रवण किया और पुनः शुकदेव से प्रश्न किया, उनका चित्त उन पावन कथाओं में डूबा था। युधिष्ठिर ने पूछा, ‘हे ब्रह्मन्! वह जो हरि की बाल्य-क्रीड़ा थी, उसे किशोरावस्था में व्रज के बालकों ने कैसे गाया, जब वह तो भिन्न समय में हुई थी? हे महायोगी, हे पूज्य आचार्य! कृपा कर यह अद्भुत रहस्य बताइये; निश्चय ही यह हरि की माया का ही कार्य है, अन्यथा नहीं। हम तो संसार में सबसे भाग्यशाली हैं, यद्यपि नाममात्र के क्षत्रिय हैं, क्योंकि आपके मुख से निरन्तर कृष्णकथा का अमृत पीते रहते हैं।’” सूतजी बोले, “श्रोताओं के प्रश्न पर, बदरायणपुत्र शुकदेव, जिनकी इन्द्रियाँ परमात्मा में लीन थीं, स्मृति में लौटे और धीरे-धीरे उस भगवत्-भक्त राजा को उत्तर देने लगे। उन्होंने कहा, ‘हे द्विजश्रेष्ठ! जैसा आपने पूछा, मैंने भगवान् की बाल्य-लीलाएँ और अवतारों की कथाएँ विस्तार से कही हैं। चाहे कोई गिरा हुआ हो, ठोकर खाया हो, दुःखी हो, घायल हो या असहाय हो—जो भी ‘हरि को नमस्कार’ का उच्चारण करता है, वह सर्व पापों से मुक्त हो जाता है। जब अनन्त भगवान् का गुणगान होता है, तो वे श्रवण के द्वारा हृदय में प्रविष्ट होकर मनुष्यों के दुःखों को पूर्णतः धो डालते हैं, जैसे सूर्य और प्रबल वायु अंधकार और बादलों को तितर-बितर कर देते हैं।’” “जो वाणी भगवत्-तत्त्व को नहीं छूती, वह व्यर्थ और मिथ्या है; केवल वही सत्य, शुभ और पावन है, जिसमें भगवान् के गुण प्रकट होते हैं। केवल वही कथा मन को आनन्दित करती है, नित्य नवीन और आकर्षक है, वही दुःख-सागर को सुखा देती है, जिसमें भगवान् की कीर्ति का गान होता है। जो वाणी हरि की महिमा नहीं गाती, वह कौओं के स्नान-स्थल के समान है, हंसों के योग्य नहीं; जहाँ अच्युत का गुणगान होता है, वहीं शुद्ध भक्तजन रहते हैं। वह वाणी, चाहे छन्द में अपूर्ण हो, यदि उसमें अनन्त भगवान् के नाम और गुण हों, तो वह जन-जन के पापों को धो देती है; सज्जन उसे सुनते, गाते और स्मरण करते हैं।” “हे अच्युत! निष्काम कर्म और शुद्ध ज्ञान भी, यदि आपकी भक्ति से रहित हैं, तो शोभा नहीं पाते; फिर अन्य श्रेष्ठ कर्म भी, यदि भगवान् को अर्पित न हों, तो स्थायी कल्याण नहीं देते।” इस प्रकार, भगवान् की लीला, परिक्षित के जन्म और युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ से लेकर, शुकदेवजी द्वारा भगवान् के गुणगान की महिमा का यह पावन आख्यान सम्पन्न हुआ।