श्रीशुकदेवजी द्वारा सुनाई गई इस कथा का दूसरा अध्याय आरंभ होता है, जिसमें श्रीनारदजी, भक्ति देवी की पीड़ा दूर करने के लिए प्रयत्न करते हैं। नारदजी बड़े स्नेह से भक्ति से कहते हैं—“बेटी, व्यर्थ क्यों शोक करती हो? चिंता से व्याकुल क्यों हो? श्रीकृष्ण के चरणकमलों का स्मरण करो, तुम्हारा सारा दुःख दूर हो जाएगा।” फिर भक्ति देवी पूछती हैं—“वही श्रीकृष्ण, जिन्होंने द्रौपदी को कौरवों की विपत्ति से बचाया था, और गोपांगनाओं की रक्षा की थी, वे अब कहाँ हैं?” नारदजी समझाते हैं—“भक्ति, तुम तो श्रीकृष्ण को प्राणों से भी प्रिय हो। जब भी तुम पुकारती हो, वह भगवान तो नीच से नीच के घर भी चले आते हैं।” नारदजी आगे कहते हैं—“सत्ययुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग में सत्य, ज्ञान और वैराग्य ही मुक्ति का साधन थे; परंतु कलियुग में केवल भक्ति ही ब्रह्म से एकत्व प्रदान करती है। इसी निश्चय से परमात्मा ने तुम्हें, जो उन्हीं के समान चैतन्य और परमानंदमयी हो, रचा और श्रीकृष्ण की प्रिया बनाकर संसार में भेजा।” “तुमने विनम्र होकर पूछा था—‘मैं क्या करूँ?’ तब श्रीकृष्ण ने आदेश दिया—‘मेरे भक्तों का पालन करो।’ तुमने वह आज्ञा स्वीकार की, और प्रसन्न होकर हरि ने तुम्हें मुक्ति को दासी के रूप में दिया, और ये दो—ज्ञान और वैराग्य—तुम्हारे साथ कर दिए।” “वैकुण्ठ में तो तुम अपने स्वरूप से पालन करती हो, परंतु पृथ्वी पर भक्तों का पालन करने के लिए अपनी छाया-रूप में प्रकट होती हो। मुक्ति, ज्ञान और वैराग्य के साथ तुम पृथ्वी पर आईं और कृतयुग से द्वापर के अंत तक आनंदपूर्वक रहीं। परंतु कलियुग में, पाखंड से पीड़ित होकर मुक्ति नष्ट हो गई और तुम्हारे आदेश से शीघ्र ही वैकुण्ठ लौट गई।” “यहाँ मुक्ति आती-जाती रहती है, जैसा तुम स्मरण करती हो; और ये दोनों, जिन्हें तुमने अपने पुत्र बना लिया है, तुम्हारे ही पास रहते हैं। परंतु कलियुग में उपेक्षा के कारण ये दोनों पुत्र दुर्बल और वृद्ध हो गए हैं। फिर भी चिंता मत करो, मैं कोई उपाय सोचूँगा।” नारदजी कहते हैं—“सुन्दरी, कलियुग जैसा कोई युग नहीं; उसी युग में मैं तुम्हें प्रत्येक घर में, सब लोगों में स्थापित करूँगा। अन्य कर्तव्यों को छोड़कर, महान उत्सवों को प्रधानता दूँगा, और उस समय हरि की सेवा नहीं करूँगा, न ही तुम्हें संसार में फैलाऊँगा।” “जो जीव तुम्हारे साथ कलियुग में रहते हैं, वे पापी भी क्यों न हों, वे निर्भय होकर कृष्ण के मंदिर पहुँचेंगे। जिनके हृदय में सदा प्रेमरूपिणी भक्ति भरी रहती है, उन्हें अशुद्ध प्राणी सपने में भी हानि नहीं पहुँचा सकते।” “भूत, प्रेत, राक्षस, यहाँ तक कि असुर भी, जिनके मन में भक्ति है, उन्हें स्पर्श से भी परास्त नहीं कर सकते। न तप से, न वेद से, न ज्ञान या कर्म से हरि मिलते हैं—केवल भक्ति से; गोपियाँ इसका प्रमाण हैं।” “हजारों जन्मों के बाद ही भक्ति के प्रति प्रेम जागता है; परंतु कलियुग में—भक्ति, भक्ति, केवल भक्ति से—कृष्ण प्रत्यक्ष हो जाते हैं। जो भक्ति के विरोधी हैं, वे तीनों लोकों में डूब जाते हैं; एक बार दुर्वासा भी भक्त का अपमान करके दुःख भोग चुके हैं।” “अब व्रत, तीर्थ, योग, यज्ञ, ज्ञान-चर्चा की आवश्यकता नहीं—केवल भक्ति ही मुक्ति देती है।” सूतमुनि कहते हैं—इस प्रकार नारद द्वारा अपना स्वरूप सुनकर, सब मंगलों से युक्त भक्ति देवी बोलीं—“नारद, धन्य हो! तुम्हारा मुझ पर प्रेम अडिग है। मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगी, सदा तुम्हारे हृदय में रहूँगी। हे करुणामय ऋषि, तुम्हारे द्वारा मेरा दुःख क्षण में दूर हो गया। मेरे दोनों पुत्र चेतना-शून्य हैं; कृपा कर उन्हें जगाओ, उन्हें जगाओ।” भक्ति के वचन सुनकर नारदजी दया से भर गए और अपनी अँगुलियों से दोनों को जगाने लगे। उन्होंने उनके कानों के पास मुँह ले जाकर ऊँचे स्वर में पुकारा—“हे ज्ञान, शीघ्र जागो! हे वैराग्य, जागो!” नारदजी वेद, वेदांत और गीता का बार-बार पाठ कर उन्हें जगाने का प्रयास करते हैं, और कठिनाई से वे दोनों किसी प्रकार उठते हैं। दोनों अपनी आँखें खोल नहीं पाते, बगुले की तरह जम्हाई लेते हैं, उनके शरीर भूख से दुर्बल और सूखी लकड़ी जैसे शुष्क हो गए हैं। दोनों को फिर से सोते और कुपोषित देख, नारदजी सोच में पड़ जाते हैं—क्या किया जाए? वे चिंतन करते हैं—आखिर यह निद्रा और ऐसी वृद्धावस्था कैसे आई? ऐसा विचारते हुए, भृगुपुत्र नारद गोविंद का स्मरण करने लगते हैं। उसी समय आकाश से एक वाणी आती है—“हे मुनि, शोक मत करो। तुम्हारा प्रयास सफल होगा, इसमें संदेह नहीं। इसी प्रयोजन के लिए, हे देवर्षि, पुण्यकर्म करो। पुण्य से विभूषित श्रेष्ठजन तुम्हारे कार्य की घोषणा करेंगे। जब वह पुण्यकर्म होगा, तब इन दोनों की निद्रा और वृद्धावस्था तत्काल दूर हो जाएगी, और भक्ति सर्वत्र फैल जाएगी।” यह आकाशवाणी सभी ने सुनी और नारदजी चकित हो गए—“मुझे यह ज्ञात नहीं था!” वे बोले—“देववाणी से भी यह बात रहस्य में रखी गई है। वह उपाय क्या है, कौन सा कर्म करना चाहिए, जिससे इनका उद्देश्य सिद्ध हो?” वे सोचते हैं—“पुण्यात्मा कहाँ मिलेंगे, वे उपाय कैसे बताएँगे? मुझे यहाँ क्या करना चाहिए, जैसा आकाशवाणी ने कहा?” सूतमुनि कहते हैं—फिर नारदजी ने दोनों को वहीं स्थिर किया और तीर्थ-तीर्थ जाकर, मार्ग में महान ऋषियों से पूछने लगे। यह समाचार सबने सुना, परंतु विचार के बाद कोई उत्तर न दे सका। कुछ ने असंभव कहा, कुछ ने कठिन बताया, कुछ मौन हो गए, और कुछ तो वहाँ से चले गए। तीनों लोकों में बड़ा कोलाहल मचा, सब आश्चर्यचकित हो गए; वेद, वेदांत और गीता के घोष से सब जाग्रत हुए। जब भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का त्रिवेणी रूप नहीं जागा, तो लोग कानों में कान डालकर कहने लगे—“अब कोई अन्य उपाय नहीं है।” इस प्रकार श्रीनारदजी के प्रयत्न, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की दशा, और कलियुग में भक्ति की महिमा का अद्भुत प्रसंग सम्पन्न होता है।