नंद बाबा और उनके ग्वाल-बालों ने जब सुना कि यादवों का दल—जिसके आगे-आगे स्वयं श्रीकृष्ण थे—आया है, तो वे अत्यंत उत्साहित होकर उनके दर्शन के लिए उपयुक्त भेंटों के साथ वहाँ पहुँचे। जैसे ही वृष्णियों ने नंद बाबा को देखा, तो मानो उनके प्राण ही लौट आए हों। वर्षों बाद अपने प्रियजनों से मिलने की उत्कंठा में वे सब उन्हें गले लगाकर अपने स्नेह का आदान-प्रदान करने लगे। वसुदेवजी ने नंद बाबा को स्नेहपूर्वक आलिंगन किया। कंस के अत्याचारों की स्मृति और अपने पुत्र को गोकुल में सौंपने का दृश्य उनकी आँखों के सामने आ गया, जिससे वे भावविभोर हो उठे। श्रीकृष्ण और बलराम ने अपने माता-पिता को गले लगाया और चरणवंदना की, किंतु प्रेमाश्रुओं के कारण वे बोल नहीं सके। श्री यशोदा और नंद बाबा ने अपने पुत्रों को अपने आसन पर बैठाया और दोनों हाथों से उन्हें आलिंगन किया। अपने पुत्रों को पाकर वे सारे दुःख भूल गए। रोहिणी और देवकी ने भी व्रज की रानी यशोदा को गले लगाया। पुरानी सखा-संबंध की स्मृति से उनकी वाणी भी भर आई, और वे कह उठीं, “हे व्रजेश्वरी! तुम्हारी अटूट मैत्री को कौन विस्मृत कर सकता है? इंद्र का राज्य भी पाकर और छोड़कर भी, इस उपकार का प्रतिदान नहीं दिया जा सकता।” उन्होंने आगे कहा, “हमने देखा है कि तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें प्रसन्नता, समृद्धि और सुरक्षा दी—जैसे पलकें आँखों की रक्षा करती हैं। सत्पुरुषों को किसी स्वर्ग की चिंता नहीं होती, क्योंकि उन्होंने अपना कर्तव्य पूर्ण कर लिया है।” इधर, गोपियाँ जब अपने प्रिय श्रीकृष्ण के दर्शन को पहुँचीं, तो बार-बार अपनी पलकें कोसने लगीं कि वे उनके दर्शन में बाधा बन रही हैं। अपनी आँखों से श्रीकृष्ण को आलिंगन कर उन्होंने उन्हें अपने हृदय में बसा लिया—ऐसा प्रेम और भक्ति उन्हें मिली, जो योगियों को भी दुर्लभ है। फिर श्रीकृष्ण एकांत में गोपियों के पास आए, उन्हें गले लगाया, उनका हालचाल पूछा और मुस्कराते हुए बोले, “क्या तुम्हें हमारी मित्रता याद है? हम अपने कार्य में लगे शत्रु-विनाश के लिए यहाँ से दूर रहे। क्या तुम्हें कभी हमारे प्रति कोई शिकायत हुई? वास्तव में, सृष्टिकर्ता ही सबका मिलन और वियोग कराता है—जैसे वायु बादलों, तृण, रूई और धूल को इकट्ठा कर फिर बिखेर देता है।” वे बोले, “मुझमें जो भक्ति है, वही अमरत्व का मार्ग है। सौभाग्य से तुम्हारा प्रेम मुझमें जाग्रत हुआ, जिससे सभी विघ्न दूर हो गए। मैं ही सभी प्राणियों का आदि, अंत, बाह्य और अंतर्यामी हूँ—जैसे आकाश, जल, पृथ्वी, वायु और प्रकाश पंचमहाभूतों का आधार हैं। इस प्रकार, आत्मा और परमात्मा के द्वारा सब प्राणी एक-दूसरे में स्थित हैं; ज्ञानीजन मुझमें और परमात्मा में ही सबको देखते हैं।” श्रीकृष्ण के इस आत्मज्ञान से ओत-प्रोत उपदेश को सुनकर गोपियाँ अपने व्यक्तिगत अस्तित्व से ऊपर उठ गईं। वे बोलीं, “भगवान के वे चरण, जिनका ध्यान योगीजन अपने हृदय में करते हैं और जो संसार-सागर से पार ले जाने वाले हैं, वे हमारे हृदय में सदैव प्रकट रहें, चाहे हम गृहस्थी में ही क्यों न रहें।” इसी प्रकार, वृष्णि और ग्वालों का मिलन और गोपियों के साथ श्रीकृष्ण की यह भेंट पूर्ण हुई—यह श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध का बहुमूल्य अध्याय है। इसके पश्चात्, श्रीशुकदेवजी ने कहा—श्रीकृष्ण ने गोपियों को आशीर्वाद देकर, अपने मित्र युधिष्ठिर और अन्य पांडवों का हालचाल पूछा। जब भगवान ने पांडवों और उनके साथियों से कुशल पूछी, तो वे सब उनके चरणों के दर्शन से पवित्र होकर हर्षित मन से उत्तर देने लगे, “हे प्रभु! आपके चरणामृत से, जो कभी-कभी आपके मुख से भी बहता है, कोई भी अमंगल नहीं रह सकता। जो इसे अपने कानों से पीता है, वह संसार के बंधन और देह की विस्मृति से मुक्त हो जाता है।” वे बोले, “हमने अपने तीनों अहंकारों को त्यागकर, समस्त कर्मों से शुद्ध होकर, आपके योग और शास्त्रों के मार्ग से अब अखंड आनंद और ज्ञान प्राप्त कर लिया है। हम आपके मायामय रूप को भी प्रणाम करते हैं, जो परमहंसों का परम पथ है।” शुकदेवजी कहते हैं—अंधक और कौरवों की स्त्रियाँ एकत्र होकर, श्रीकृष्ण की महिमा का गान करने लगीं। वे गोविंद की कथाएँ आपस में सुनाने लगीं, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं। अब मैं आपको वे कथाएँ सुनाता हूँ। द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की पत्नियों से पूछा, “हे वैदर्भी (रुक्मिणी), हे भद्रा, हे जाम्बवती, हे कौशला, हे सत्यभामा, हे कालिंदी, हे शैब्या, हे रोहिणी, हे लक्ष्मणा—आप सब बताइए, स्वयं भगवान ने किस प्रकार अपनी लीला से, सांसारिक रीति का अनुकरण कर, आपसे विवाह किया?” रुक्मिणीजी ने कहा, “जब धनुष-बाणधारी वीरों ने मुझे चेदिराज को सौंपना चाहा, तब श्रीकृष्ण ने (जिनके चरणों की धूल राजा के सैनिकों के सिर पर शोभा देती थी) मुझे ऐसे उठा लिया, जैसे सिंह बकरियों के झुंड से अपना भाग छीन लेता है। वे श्री के निवास भगवान मेरे पूज्य हैं।” सत्यभामा बोलीं, “मुझ पर मेरी सखियों के शाप का कलंक था। उसे मिटाने के लिए प्रभु ने पृथ्वी के राजा को परास्त कर, मणि भी ले आए, मेरे पिता को भयभीत कर दिया, और यद्यपि मैं किसी और को दी गई थी, फिर भी उन्होंने मुझे अपना लिया।” जाम्बवती ने कहा, “मेरे पिता ने श्रीराम के रूप में उन्हें परखा, जिन्होंने इक्कीस दिन तक युद्ध किया। अंत में, उन्हें पहचानकर, मेरे पिता ने मुझे और मणि को उनके चरणों में समर्पित कर दिया।” कालिंदी ने कहा, “मैंने प्रभु के चरणों के स्पर्श की इच्छा से तप किया था। वे मित्र बनकर आए, मेरा हाथ थामा और मैं उनके घर की दासी बन गई।” मित्रविंदा ने कहा, “मेरे स्वयंवर में प्रभु आए, सभी राजाओं को पराजित किया और मुझे ऐसे उठा ले गए जैसे हाथी अपनी प्रियनी को झुंड से अलग कर ले जाता है। मेरे भाइयों को परास्त कर, वे मुझे अपने नगर—धन की राजधानी—ले आए।” सत्या बोलीं, “मेरे पिता ने वीरों की परीक्षा के लिए सात भयंकर सींगों वाले बैल रखे। श्रीकृष्ण ने उन्हें ऐसे वश में कर लिया जैसे कोई बालक बछड़ों को बाँधता है। मुझे, दासियों और सेना सहित, उन्होंने जीत लिया।” भद्रा ने कहा, “मेरे पिता ने मेरे मामा को बुलाकर मुझे कृष्ण को समर्पित किया, जो सदा उन्हीं में लीन थे। मैं हर जन्म में उनके चरण-स्पर्श की कामना करती हूँ, क्योंकि वही मोक्ष का मार्ग है।” लक्ष्मणा ने कहा, “नारदजी से बार-बार श्रीकृष्ण की कथा सुनकर मेरा मन उन्हीं में लग गया। मेरे पिता बृहत्सेन ने मेरी इच्छा जानकर, एक मत्स्य को छिपाकर स्वयंवर की व्यवस्था की—जैसे पांडवों के समय हुआ था।” इस प्रकार, सभी दिशाओं से निपुण राजकुमार, अपने-अपने गुरुओं के साथ, मेरे पिता के नगर में आए। यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में श्रीकृष्ण, वृष्णि, ग्वालों, गोपियों और उनकी पत्नियों के अद्भुत मिलन तथा विवाह-लीलाओं की दिव्य गाथा को उजागर करती है।