श्रीशुकदेव जी ने कहा— हे कुरुश्रेष्ठ, भगवान बलराम जी अपने प्रिय मित्रों से मिलने के लिए उत्सुक होकर रथ पर सवार हुए और नंद के गोकुल पधारे। वहाँ ग्वाले और ग्वालिनियाँ, जो बहुत समय से उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं, उन्हें देखकर हर्ष से भरकर बलराम जी को गले लगाकर देर तक नहीं छोड़ा। फिर बलराम जी ने अपने माता-पिता को प्रणाम किया, जिन्होंने उन्हें गोद में बिठाकर, गले लगाकर, आँखों से आँसू बहाते हुए आशीर्वाद दिया— ‘‘हे दाशार्ह, हे जगन्नाथ! तुम और तुम्हारे भ्राता सदैव हमारी रक्षा करो।’’ इसके बाद बलराम जी ने वहाँ उपस्थित वृद्ध ग्वालों का आदरपूर्वक अभिवादन किया, सबकी आयु, मित्रता और संबंध के अनुसार यथोचित सम्मान दिया। फिर वे ग्वालों के बीच बैठ गए, जहाँ सभी ने हँसी-मज़ाक, हाथ मिलाने और अन्य आत्मीय व्यवहारों के साथ उनका स्वागत किया और हालचाल पूछा। बलराम जी ने भी अत्यंत स्नेह से, गले रुंधी वाणी में, सबके और उनके परिवारों के कुशल-क्षेम पूछे, क्योंकि वे जानते थे कि सबका भार श्रीकृष्ण, कमलनयन भगवान, पर ही है। ग्वाले बोले— ‘‘हे राम, क्या तुम्हारे सभी कुटुम्बी-संबंधी सकुशल हैं? क्या तुम अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ हमें याद करते हो? सौभाग्य से दुष्ट कंस का वध हुआ, तुम्हारे मित्र मुक्त हुए और शत्रुओं को परास्त कर तुमने सुरक्षित किले में निवास किया।’’ ग्वालिनियाँ बलराम जी को देखकर हर्षित होकर पूछने लगीं— ‘‘क्या नगर की स्त्रियों के प्रिय श्रीकृष्ण सुखपूर्वक रहते हैं? क्या वे अपने माता-पिता और संबंधियों को याद करते हैं? क्या वे कभी एक बार भी अपनी माता को देखने आएँगे? या फिर वे हमारी सेवा को स्मरण करते हैं?’’ वे आगे बोलीं— ‘‘हे दाशार्ह, जिनके लिए तुमने अपनी माता, पिता, भाई, पति, पुत्र और यहाँ तक कि बहनों—सबसे प्रिय संबंधियों—को छोड़ दिया, वही श्रीकृष्ण हमें अचानक छोड़कर चले गए और हमारे स्नेह के बंधन तोड़ दिए। ऐसी दशा में स्त्रियाँ उनके वचन पर कैसे विश्वास करें? नगर की चतुर स्त्रियाँ भी, न जाने क्यों, उनके चंचल और कृतघ्न स्वभाव को जानते हुए भी, उनकी मनोहर कथाओं, मुस्कान, चितवन और साँसों के जादू में मोहित होकर, उन पर रीझ जाती हैं।’’ फिर वे बोलीं— ‘‘हमें श्रीकृष्ण की बातें छोड़कर कुछ और कहना चाहिए। समय तो उनके बिना हमारे लिए जैसे-तैसे कट ही जाता है, यदि उनके लिए भी वैसा ही कटता हो।’’ किन्तु श्रीकृष्ण की चंचल बातें, मनोहर चितवन, गतियाँ और स्नेहिल आलिंगन याद करके वे ग्वालिनियाँ रोने लगीं। तब भगवान बलराम, जो मन को बहलाने की अनेक विधाओं में निपुण थे, श्रीकृष्ण का संदेश देकर उन्हें सांत्वना देने लगे। बलराम जी ने वहाँ दो मास—मधु और माधव—वृंदावन में व्यतीत किए और रात्रियों में गोपियों को आनंदित किया। पूर्णिमा की चाँदनी में, रात में खिले कमलों की सुगंध से महकती बयार में, वे यमुना तट के उपवनों में गोपियों के साथ विहार करने लगे। उसी समय वरुण के भेजे से वरुणी देवी एक वृक्ष की खोखल से प्रकट हुईं और उनके आने से सारा वन सुरभित हो उठा। बलराम जी ने मदिरा की उस मधुर गंध को पवन के साथ सूंघा और गोपियों सहित वहाँ पहुँचे। उन्होंने अपनी जीभ से उस मधु का आस्वादन किया। गंधर्वगण गान करने लगे, सुन्दर स्त्रियों से घिरे बलराम जी, हाथीसमूह के स्वामी के समान, इन्द्र की भाँति क्रीड़ा करने लगे। आकाश में नगाड़े बज उठे, पुष्पवर्षा होने लगी और गंधर्व तथा ऋषि बलराम जी के कार्यों की स्तुति करने लगे। गोपियाँ उनके चरित्र गा-गाकर उन्हें और भी आनंदित करती रहीं। मदिरा के प्रभाव से बलराम जी की आँखें डगमगाने लगीं, वे वन-वन भ्रमण करने लगे। उनके गले में सुंदर वनमाला, कान में एक कुंडल, शरीर पर विजयंतिमाला, मुख पर कमल-सी मुस्कान और पसीने की बूँदें ओस की तरह शोभायमान थीं। फिर उन्होंने यमुना को जलक्रीड़ा के लिए बुलाया, किंतु नशे में अपने ही वचन को भूल गए। जब यमुना नहीं आई तो क्रोधित होकर हल के फाल से उसे खींचते हुए बोले— ‘‘हे पापिनी, मैंने पुकारा और तुम नहीं आईं, अब मैं तुम्हें अपने हल से खींच लाऊँगा, जो मनमानी करती फिरती हो।’’ बलराम जी के इस प्रकार डाँटने पर भयभीत यमुना काँपती हुई उनके चरणों में गिर पड़ी और बोली— ‘‘हे राम, हे महाबाहु, मैं आपकी महिमा नहीं जानती थी। आप ही के अंश से यह पृथ्वी स्थिर है। कृपया मुझे क्षमा करें, मैं आपकी शरण में हूँ।’’ बलराम जी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की, उसे छोड़ दिया और फिर गोपियों के साथ हाथी के झुंड के राजा के समान यमुना में जलक्रीड़ा करने लगे। जलक्रीड़ा के बाद बाहर आकर उन्होंने गोपियों को सुंदर आभूषण और माला भेंट की। नीले वस्त्र, स्वर्णमाला धारण कर, सुगंधित चंदन से विभूषित होकर वे खुले आकाश के नीचे विश्राम करने लगे, जैसे इन्द्र हाथियों के बीच शोभायमान होते हैं। आज भी, हे राजन्, जिस मार्ग से बलराम जी ने यमुना को खींचा था, वह रेखा स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है, जो उनकी अपार शक्ति का संकेत है। इस प्रकार बलराम जी ने पूरी रात वृज में गोपियों के साथ, उनके माधुर्य में तन्मय होकर, आनंदपूर्वक व्यतीत की। इसके पश्चात्, जब बलराम जी नंद-व्रज में थे, करूष देश के राजा ने, यह न जानते हुए कि श्रीकृष्ण ही वासुदेव हैं, एक दूत को कृष्ण के पास भेजा। वह कहने लगा— ‘‘मैं ही वासुदेव का अवतार हूँ, दूसरा कोई नहीं। प्राणियों पर दया करके मैं अवतीर्ण हुआ हूँ। तुम अपना झूठा दावा छोड़ दो।’’ जब वहाँ के बालकों ने श्रीकृष्ण से कहा— ‘‘आप ही वासुदेव हैं, जगत्पति हैं,’’ तो श्रीकृष्ण ने स्वयं को अच्युत आत्मा के रूप में जाना। किंतु वह मूढ़ राजा, बालक के समान व्यवहार करता हुआ, श्रीकृष्ण की अलौकिक लीलाओं को न समझ सका और दूत के हाथों वैसा संदेश द्वारका भिजवाया। दूत ने द्वारका पहुँचकर सभा में प्रवेश किया और कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष राजा का संदेश सुनाया— ‘‘मैं ही वासुदेव का अवतार हूँ, दूसरा कोई नहीं। प्राणियों की करुणा से मैंने अवतार लिया है। तुम अपना मिथ्या दावा त्याग दो।’’ इस प्रकार कथा आगे बढ़ती है।