भगवान श्रीकृष्ण जब द्वारका में अपने सोलह हज़ार एक सौ आठ पत्नियों के साथ निवास करते थे, तब उनका प्रत्येक व्यवहार अद्भुत था। वे अपनी पत्नियों की ओर मुस्कुराते हुए दृष्टि डालते, उनकी भंगिमाओं से अपने अंतर के भाव प्रकट करते और भौंहों के इशारे के साथ प्रेमपूर्ण, कुशल वाणी का प्रयोग करते थे। उनकी पत्नियाँ, जो प्रेम के देवता कामदेव के बाणों से भी उन्हें आकर्षित करने का प्रयास करती थीं, फिर भी श्रीकृष्ण की इन्द्रियाँ कभी विचलित नहीं कर पाती थीं। इन सभी स्त्रियों ने लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त किया था, जिनका मार्ग स्वयं ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए भी अगम्य था। वे निरंतर प्रेम और भक्ति से श्रीकृष्ण की सेवा में रत रहती थीं, उनकी मुस्कान, दृष्टि, स्पर्श और आलिंगन की अभिलाषा से सदा उत्साहित रहती थीं। श्रीकृष्ण के पास सैकड़ों दासियाँ थीं, जो उनके स्वागत, आसन अर्पण, चरण प्रक्षालन, पान अर्पण, विश्राम, पंखा झलना, सुगंधित मालाएँ पहनाना, केश-विन्यास, शैया-व्यवस्था, स्नान और अन्य सेवाएँ करती थीं। श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख रानियाँ थीं, जिनके दस-दस पुत्र थे। सबसे पहले रुक्मिणी के पुत्रों में प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, सुदेष्ण, बलशाली चारुदेह, सुचारु, चारुगुप्त, भद्रचारु, चारुचंद्र, विचारु और चारु थे—ये सब अपने पिता के समान ही तेजस्वी थे। सत्यभामा के पुत्रों में भानु, सुभानु, स्वर्भानु, प्रभानु, भानुमान, चंद्रभानु, बृहद्भानु, रतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु थे। जाम्बवती के पुत्रों में साम्ब, सुमित्र, पुरुजित, शतजित, सहस्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान, द्रविड़ और क्रतु थे; इनमें साम्ब सबसे प्रमुख थे। नाग्नजित की पुत्री से वीरचंद्र, अश्वसेन, चित्रगु, वेगवान, वृष, आम, शंकु, वसु, श्रीमान और कुन्तिर उत्पन्न हुए। कालिंदी के पुत्रों में श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुभाहु, भद्र, एकल, शांति, दर्श, पूर्णमास और सबसे छोटे सोमक थे। मद्रा की संतानें प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊर्ध्वग, महाशक्ति, सह, ओज और अपराजित थीं। मित्रविन्दा के पुत्र व्रिक, हर्ष, अनिल, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महाश, पावन, वह्नि और क्षुधि थे। भद्रा के पुत्र संग्रामजित, बृहद्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वामायु और सत्यक थे। रोहिणी के पुत्रों में दीप्तिमान, ताम्र, तप्ता आदि थे। प्रद्युम्न और रुक्मिणी के पुत्र अनिरुद्ध का विवाह रुक्मिणी के भाई रुक्मी की पुत्री रुक्मवती से हुआ, जो भोजकट नगर की थी। श्रीकृष्ण की संतानें और पौत्रों की संख्या लाखों-करोड़ों में थी, और उनके पुत्रों की माताएँ सोलह हज़ार थीं। राजा ने पूछा—हे महर्षि! रुक्मी, जिसे श्रीकृष्ण ने पहले अपमानित किया था और जो उनसे शत्रुता रखता था, फिर भी उसने अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के पुत्र से कैसे कर दिया? कृपया मुझे वह कथा विस्तार से बताइये। श्री शुकदेव जी बोले—योगीजन भूत, भविष्य, वर्तमान, इन्द्रियातीत, दूर या छिपी हुई बातों को स्पष्ट रूप से जानते हैं। जब रुक्मवती का स्वयंवर हुआ, तब स्वयं कामदेव-स्वरूप प्रद्युम्न को उसने पति रूप में चुना। प्रद्युम्न ने एकाकी रथ से वहाँ उपस्थित समस्त राजाओं को युद्ध में पराजित कर रुक्मवती का हरण किया। यद्यपि रुक्मी को श्रीकृष्ण से पुरानी शत्रुता थी, फिर भी उसने अपनी बहन रुक्मिणी को प्रसन्न करने के लिए अपनी पुत्री का विवाह उसके पुत्र प्रद्युम्न से कर दिया। इसी प्रकार कृतवर्मा के पुत्र ने रुक्मिणी की कन्या—जो विशाल नेत्रों वाली और सुंदर थी—से विवाह किया। रुक्मी ने अपनी पौत्री रोचना का विवाह भी अनिरुद्ध से कर दिया, यद्यपि शत्रुता बनी रही, लेकिन बहन के प्रेमवश उसने यह संबंध स्वीकार किया। इस शुभ अवसर पर रुक्मिणी, बलराम, श्रीकृष्ण, साम्ब, प्रद्युम्न आदि सभी भोजकट नगर पहुँचे। विवाह के उपरांत कलिंगराज के नेतृत्व में कुछ घमंडी राजा रुक्मी को उकसाने लगे कि वह बलराम से पासे (जुए) में जीतकर दिखाए। बलराम जी को चुनौती दी गई, यद्यपि वे पासे का खेल नहीं जानते थे, फिर भी खेल आरंभ हुआ। पहले बलराम ने सौ, फिर हजार, फिर दस हजार मुद्राएँ दाँव पर लगाईं, और रुक्मी ने उन्हें हरा दिया। कलिंगराज ने बलराम का उपहास करते हुए दाँत निकालकर हँसी उड़ाई, जिसे बलराम सह नहीं सके। फिर रुक्मी ने एक लाख मुद्राएँ दाँव पर लगाईं, और इस बार बलराम जीत गए, परंतु रुक्मी ने छल से कहा—‘मैं ही जीता हूँ।’ इससे बलराम अत्यंत क्रोधित हो उठे और दस लाख मुद्राएँ दाँव पर लगाईं; इस बार भी बलराम ने निष्पक्ष रूप से विजय प्राप्त की, लेकिन रुक्मी फिर भी छल करता रहा और गवाह बुलाने को कहा। तभी आकाशवाणी हुई—‘बलराम ही विजयी हैं, रुक्मी झूठ बोल रहा है।’ फिर भी रुक्मी और अन्य दुष्ट राजा बलराम का उपहास करते रहे और बोले—‘तुम ग्वाले हो, वन में घूमते हो, राजा लोग ही पासा खेलते और धनुष-बाण चलाते हैं।’ इस प्रकार अपमानित होकर बलराम ने सभा में गदा उठाई और रुक्मी को मार डाला। फिर कलिंगराज को पकड़कर उसके दाँत तोड़ दिए, जो पहले बलराम का उपहास कर रहा था। अन्य राजा, जिनके हाथ, जाँघें और सिर बलराम की गदा से घायल हो गए थे, भयभीत होकर वहाँ से भाग गए। रुक्मी के मारे जाने पर श्रीकृष्ण ने, यह सोचकर कि कहीं रुक्मिणी और बलराम के बीच स्नेह न टूट जाए, न तो बलराम के कार्य की निंदा की, न ही प्रशंसा की। फिर अनिरुद्ध और उसकी पत्नी को सुंदर रथ पर बिठाकर, श्रीकृष्ण, बलराम और यादवगण भोजकट से कुशस्थली (द्वारका) लौट आए, सब कार्य संपन्न कर, श्रीमधुसूदन की छत्रछाया में। इसके बाद राजा ने पूछा—हे महामुनि! यदुवंशी श्रीकृष्ण ने बाणासुर की पुत्री ऊषा से विवाह किया था, और उस समय श्रीहरि और शंकर के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। कृपया वह कथा भी विस्तार से सुनाइये। श्री शुकदेव जी बोले—प्रहलाद के पुत्र महान् बलि, जिन्होंने वामन रूप में श्रीहरि को पृथ्वी दान दी थी, उनके सौ पुत्रों में बाण सबसे बड़ा था। बाणासुर सदैव शिवजी का भक्त था, सम्मानित, दानी, बुद्धिमान, सत्यनिष्ठ और व्रत में अडिग था।