भगवद्भागवतपुराण के इन दिव्य श्लोकों में अक्रूर की श्रीकृष्ण-दर्शन की उत्कट अभिलाषा और उनका ब्रज में आगमन विस्तार से वर्णित है। अक्रूर के हृदय में उस प्रभु के चरणों का स्मरण हो रहा था, जिनके चरण ब्रह्मा, शिव, अन्य देवता, स्वयं लक्ष्मीजी, ऋषि-मुनि और सात्वतगण पूजते हैं। वे चरण, जिन पर गोपियों के वक्षस्थल का केसर लगा रहता है, और जो अपने सखा-संगियों के साथ वन-वन गऊ चराते विचरते हैं। अक्रूर सोचते हैं—क्या आज मैं अपने नेत्रों से मुकुंद का वह सुन्दर मुख देख पाऊँगा, जिसकी कपोलें, नासिका, लाल कमल के समान नेत्र, मन्द मुस्कान और घुँघराले बालों से घिरा मुख, मृगों के घूमने से भी शोभायमान रहता है? वे आशा करते हैं—शायद आज मेरे नेत्रों को साक्षात् विष्णु के दर्शन का फल मिलेगा, जिन्होंने पृथ्वी का भार उतारने के लिए अपनी इच्छा से मानव रूप धारण किया है, जो सौन्दर्य के परम आश्रय हैं। वे जिस प्रभु के दर्शन को आतुर हैं, वे अहंकार और द्वैत से रहित हैं, किन्तु अपने तेज से अज्ञान का अन्धकार दूर कर देते हैं। अपनी माया से वे समस्त प्राणियों के हृदय, इन्द्रिय और बुद्धि में अनुभव किए जाते हैं। उनकी वाणी, शुभ गुणों, कर्मों और जन्म से युक्त, सम्पूर्ण अमंगल का नाश करती है, जगत को जीवन, पवित्रता और पावनता प्रदान करती है; जो व्यक्ति उनकी वाणी में रुचि नहीं रखते, वे केवल सुन्दर शव के समान हैं। वे सात्वत वंश में अवतरित हुए हैं, देवताओं के हर्ष का कारण बने हैं, और उनकी कीर्ति से व्रज भूमि गूंजती है, जहाँ देवता उनके पुण्य कर्मों का गान करते हैं। अक्रूर सोचते हैं—आज मैं प्रभु के उस रूप का दर्शन करूँगा, जो महान पुरुषों का लक्ष्य, त्रिलोक का आनन्द, नेत्रों का उत्सव, और लक्ष्मीजी का वांछित निवास है। जब वे रथ से उतरेंगे, तो मैं स्वयं उन चरणों का वरण करूँगा, जिन्हें योगीजन भी अपने हृदय में धारण करते हैं। उनके साथ उनके मित्र और वनवासी भी नतमस्तक होंगे। शायद प्रभु स्वयं अपने कमल जैसे कर से मेरे सिर पर स्पर्श करें, जैसे वे समयरूपी सर्प से भयभीत शरणागतों को अभय देते हैं। उनके उसी स्पर्श से विश्वामित्र और बलि को तीनों लोकों की प्रभुता मिली थी, या वे खेल-खेल में व्रजांगनाओं की थकान दूर करते थे। अक्रूर को विश्वास है कि अच्युत—जो सबका अंतःकरण जानने वाले हैं—उन्हें कंस का दूत होने के कारण भी शत्रु की दृष्टि से नहीं देखेंगे, क्योंकि वे यथार्थदर्शी हैं, भीतर-बाहर सब देखते हैं। शायद वे मुझे, जो उनके चरणों में गिरकर हाथ जोड़ूँगा, कोमल, हंसमुख और करुणा से पूर्ण दृष्टि से देखेंगे; और उसी क्षण मेरे सारे पाप नष्ट हो जाएंगे, और मैं निर्भय, महान आनन्द से भर जाऊँगा। तब मेरे स्वजन, मेरे परम मित्र, मेरे इष्टदेव, मुझे अपने विशाल भुजाओं में भर लेंगे; उसी क्षण वे मुझे पावन कर देंगे और मेरे कर्मजन्य बन्धन छिन्न हो जाएंगे। जब मैं हाथ जोड़कर दण्डवत् होऊँगा और उनके अंगों का स्पर्श पाऊँगा, वे, हे अक्रूर, मुझसे बात करेंगे; यदि मनुष्य-शरीर पाकर भी हमें उनका सम्मान न मिले, तो वह जन्म व्यर्थ है। प्रभु के लिए कोई प्रियतम, कोई शत्रु, कोई अप्रिय या उपेक्षित नहीं है; वे कल्पवृक्ष की भाँति, जो भी उनके पास आता है, उसे अनुग्रह करते हैं। इसी बीच, वृष्णिवंश के श्रेष्ठ, कृष्ण ने मुस्कराते हुए, अक्रूर को आलिंगन किया, उन्हें घर के भीतर ले गए, जहाँ उनके स्वागत का समुचित प्रबंध था, और कंस के कारण उत्पन्न कष्टों के विषय में पूछा। शुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार कृष्ण का चिन्तन करते हुए, श्वफल्कपुत्र अक्रूर रथ पर सवार होकर गोकुल पहुँचे, जैसे सूर्य पश्चिम की ओर पर्वत तक पहुँचता है। वहाँ अक्रूर ने देखा कि गोकुल में उन्हीं प्रभु के चरणचिह्न हैं, जिनकी धूलि को सब लोकपाल अपने मुकुटों पर धारण करते हैं; वे चिह्न कमल, जौ, अंकुश आदि से युक्त थे। उन चिह्नों को देखकर अक्रूर का हृदय हर्ष और श्रद्धा से भर गया, नेत्रों में आँसू आ गए, रोमांच हो आया; वे रथ से उतरकर उन पदचिह्नों में घूमते हुए पुकार उठे—"अहो! ये प्रभु के चरणों की धूल है!" देहधारियों के लिए सबसे बड़ा लाभ यही है कि वे अहंकार, भय और शोक का त्याग करें, जो हरि के चिन्हों के दर्शन, श्रवण आदि से ही संभव है। फिर अक्रूर ने देखा—कृष्ण और बलराम व्रज में गौ-दुग्ध दुहकर लौट रहे हैं, कृष्ण पीतवस्त्र, बलराम नीलवस्त्र धारण किए, दोनों के नेत्र शरदकालीन कमलों के समान। वे दोनों नवयुवक, एक श्याम, एक गौर, सौन्दर्य के साक्षात् धाम, विशाल भुजाएँ, मनोहर मुख, दिव्य रूप, और युवा गजराजों जैसी चाल और बल से युक्त थे। उनके चरणों में ध्वज, वज्र, अंकुश, कमल आदि के चिह्न थे, वे व्रजभूमि को शोभित कर रहे थे, उनकी दृष्टि हंसमुख और करुणामयी थी। वे खेल-खेल में श्रेष्ठ, पुष्पमालाओं और वनमालाओं से विभूषित, दिव्य गंध से अनुलिप्त, स्नान किए हुए और उज्ज्वल वस्त्र धारण किए हुए थे। वे दोनों आद्य पुरुष, सृष्टि के कारण और स्वामी, पृथ्वी के भार को उतारने के लिए अपने अंश से बलराम और केशव रूप में प्रकट हुए थे। वे अपनी प्रभा से चारों ओर के अंधकार को दूर कर रहे थे—एक पन्ने की पर्वत-सा श्याम, दूसरा रजत-पर्वत-सा गौर, स्वर्णाभूषणों से अलंकृत। अक्रूर प्रेम से अभिभूत होकर रथ से कूद पड़े, और श्रीकृष्ण-बलराम के चरणों में गिर पड़े। प्रभु के दर्शन से वे इतने भावविभोर हो गए कि नेत्रों से अश्रु बहने लगे, शरीर रोमांचित हो उठा, और वे अपना नाम भी न बोल सके। प्रभु कृष्ण, जिनके कर पर रथचक्र का चिह्न है, स्वयं आगे बढ़े, अक्रूर को आलिंगन किया, पास बिठाया, क्योंकि वे अपने भक्तों को अत्यंत प्रिय मानते हैं। बलरामजी ने भी प्रेम से अक्रूर को गले लगाया, हाथ पकड़कर, भाई के साथ उन्हें गृह में ले गए। वहाँ विधिपूर्वक कुशल-क्षेम पूछकर, सम्मानपूर्वक आसन दिया, उनके चरण धोए, और मधुपर्क अर्पित किया। अतिथि-सत्कार में एक गाय भेंट की, थके अंगों की सेवा की, और शुद्ध, उत्तम भोजन प्रेमपूर्वक कराया। भोजन के बाद, धर्मज्ञ बलराम ने पुनः स्नेह से हवन-सुगंध और पुष्पमालाएँ अर्पित कीं। नन्द महाराज ने भी आदरपूर्वक पूछा—"हे दाशार्ह! कंस के जीवित रहते तुम वहाँ किस प्रकार सुखी रह सकते हो? क्या हम सब क्रूर स्वामी के अधीन ग्वालों के समान नहीं हैं? वह दुष्ट, जिसने अपनी ही बहन के पुत्रों को उनकी माताओं के करुण-क्रन्दन में मार डाला—ऐसे में तुम्हारे और तुम्हारे कुल के लिए भला-चंगा रहना कैसे संभव है?" नन्दबाबा के स्नेहपूर्ण वचनों और सत्कार से अक्रूर की यात्रा की सारी थकान दूर हो गई। शुकदेवजी कहते हैं—रात्रि में अक्रूर, श्रीराम और श्रीकृष्ण द्वारा सम्मानित होकर, सुखपूर्वक शैय्या पर विराजमान हुए, और मार्ग में मन में उठी सारी कामनाएँ पूर्ण हो गईं। जब स्वयं लक्ष्मीपति प्रसन्न हों, तो कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह जाती है? फिर भी, जो प्रभु के भक्त हैं, वे कुछ नहीं चाहते। रात्रि-भोजन के पश्चात्, देवकीनंदन श्रीकृष्ण ने अपने मित्रों से कंस के व्यवहार और उसकी ताजा योजनाओं के विषय में पूछा। फिर प्रभु ने स्वयं अक्रूर का स्वागत करते हुए कहा—"प्रिय अक्रूर! आपका स्वागत है। क्या आपके परिवार और बन्धु-बांधव सब स्वस्थ और कुशल से हैं? सब प्रकार की आपदाएँ तो नहीं हैं?" इस प्रकार, अक्रूर की प्रभु-दर्शन की उत्कट लालसा, उनकी यात्रा, व्रज में श्रीकृष्ण-बलराम के साक्षात् दर्शन, और प्रभु द्वारा किया गया सत्कार—इन सबका दिव्य और भावपूर्ण वर्णन इन श्लोकों में मिलता है।