भगवद्भाव से सुनो—जब किसी मनुष्य का मन अपनी इन्द्रियों के माध्यम से सुख-दुःख में कोई भेद नहीं मानता, तब उसी क्षण वह स्वयं को, अपने ही द्वारा, सर्वथा आसक्तियों से रहित, समदृष्टि वाला, स्वीकार और त्याग से परे, परम स्थिति में स्थित देखता है। यही शुद्ध ज्ञान ही परम ब्रह्म, परमात्मा, भगवान्, और पुरुष है; वही भगवान्, जो वस्तुओं आदि के माध्यम से भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, वास्तव में एक ही है। पूर्ण योग के द्वारा योगी इसी सीमा तक यहाँ अपना अभीष्ट फल प्राप्त करता है—वह है सम्पूर्ण वस्तुओं से पूर्ण वैराग्य। वही एक ज्ञान, जब इन्द्रियाँ बाहर की ओर प्रवृत्त होती हैं, तो माया के कारण विषयों के रूप में प्रकट होता है; निर्गुण ब्रह्म ही ध्वनि आदि गुणों के साथ प्रकट होता है। जैसे महत्तत्त्व अहंकार के रूप में त्रिविध और पंचविध होकर, ग्यारह रूपों में स्वयंसिद्ध ब्रह्माण्ड के रूप में जगत् की उत्पत्ति का कारण बनता है, वैसे ही यह सब प्रकट होता है। इसे वही देख सकता है, जो श्रद्धा और भक्ति से निरन्तर योगाभ्यास करता है, जिसका मन एकाग्र है, जो आसक्त नहीं है, और जो समदृष्टि से देखता है। हे माता, यह ब्रह्मदृष्टि रूप गूढ़ ज्ञान बताया गया है, जिससे प्रकृति और पुरुष दोनों का यथार्थ भेद जाना जाता है। जैसे कोई वस्तु अनेक गुणों से युक्त होते हुए भी इन्द्रियों के भिन्न-भिन्न द्वारों से देखी जाती है, फिर भी विभाजित नहीं होती, वैसे ही भगवान् भी शास्त्रों के विविध मार्गों से प्राप्त होते हुए भी एक ही हैं। कर्म, यज्ञ, दान, तप, अध्ययन, आत्मसंयम, इन्द्रियों और मन पर विजय, तथा कर्मों के त्याग से; योग के विविध अंगों से, भक्ति के योग से, कर्मयुक्त और त्यागयुक्त धर्म से, और आत्मतत्त्व के अनुभव तथा दृढ़ वैराग्य से—इन सभी साधनों द्वारा, गुणयुक्त और निर्गुण दोनों रूपों में, जो अपने आत्मा से देखता है, वह भगवान् को प्राप्त करता है। मैंने तुम्हें भक्ति-योग के चार प्रकार बताए, और वह भी बताया, जो काल के अव्यक्त में प्रवेश करने पर जीवों में लुप्त हो जाता है। अज्ञान और कर्म से उत्पन्न जीव का यह बार-बार का जन्म-मरण चक्र है, जिसमें आत्मा प्रवेश तो करती है, परंतु अपना मार्ग नहीं जानती। यह गूढ़ ज्ञान कभी दुष्ट, अनुशासनहीन, अभिमानी, शत्रु भाव रखने वाले, या केवल बाह्य धार्मिकता दिखाने वालों को नहीं कहना चाहिए। न लोभी को, न गृहस्थ जीवन में आसक्त मन वाले को, न जो मुझमें अनन्य नहीं, न मेरे भक्तों से द्वेष रखने वालों को। किंतु जो श्रद्धावान्, भक्त, संयमी, निर्द्वेष, सर्वभूतों के प्रति मैत्रीभाव रखने वाला, सेवा में तत्पर हो—ऐसे को यह ज्ञान देना चाहिए। जो बाहर से विरक्त, शांतचित्त, निर्द्वेष, शुद्ध है, और जिसके लिए मैं सबसे प्रिय हूँ, उसे यह उपदेश देना चाहिए। हे माता, जो मनुष्य इसे श्रद्धा से एक बार भी सुनता है, या मन को मुझमें स्थिर कर इसका पाठ करता है, वह निश्चय ही मेरे मार्ग को प्राप्त करता है। अब, श्री शुकदेव जी कहते हैं—इस प्रकार भगवान् के मनोहर वचनों को सुनकर, गोपियाँ वियोगजन्य पीड़ा को त्यागकर, उनकी उपस्थिति से अपने मनोरथ पूर्ण मानकर तृप्त हो गईं। वहाँ गोविन्द ने, उन भक्तिपूर्ण, प्रफुल्लित गोपियों के मध्य, जो स्त्रियों में श्रेष्ठ रत्न थीं, रास का अद्भुत उत्सव आरंभ किया। गोपियों के उस वृत्त में श्रीकृष्ण, योगियों के स्वामी, प्रत्येक युगल के मध्य खड़े थे। वे उनके गलों में बाँहें डालकर, अपने पास खींच लेते; जो इसे देखता, उसे लगता जैसे आकाश में सैकड़ों विमान एकत्रित हो गए हों। देवता और उनकी पत्नियाँ, उत्कंठा से मोहित, यह अद्भुत लीला देखने लगे; तब आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं, पुष्पवृष्टि होने लगी, और गन्धर्वों के स्वामी अपनी पत्नियों के साथ भगवान् की पावन कीर्ति गाने लगे। रासमंडल में गोपियों के कंगन, पायल और घुँघरुओं की झंकार, उनके प्रियतमों के साथ, गूँज उठी। उन सबके बीच देवकीनंदन भगवान् ऐसे अद्भुत दीप्तिमान् थे, जैसे स्वर्णमय रत्नों के मध्य एक महान् पन्ना हो। गोपियाँ, पैरों की थाप, भुजाओं की लहर, मुस्कान, चंचल भौंहें, झूलते कुंडल गालों को छूते, पसीने से भीगे खुले केश, गाते हुए, विद्युत के समान चमक रही थीं। नृत्य करते, कंठ में प्रेम से लाली लिए, कृष्ण के स्पर्श से पुलकित, वे गीत गाने लगीं और रासस्थल को अपने गान से भर दिया। कोई गोपी, मुकुन्द के साथ, अपनी वाणी को उनकी वाणी में मिलाकर, उनके द्वारा 'बहुत अच्छा' कहे जाने पर बार-बार गाती रही, और श्रीकृष्ण ने उस पर विशेष कृपा की। कोई गोपी, नृत्य से थकी हुई, अपने ढीले कंगन और मल्लिका की माला के साथ, गदा-धारी श्रीकृष्ण के कंधे पर अपना हाथ रखकर विश्राम करने लगी। कोई ने, श्रीकृष्ण की नीलकमल-सुगंधित, चंदन-लेपित भुजा को अपनी नासिका से छुआ, हर्ष से पुलकित होकर उसे चूम लिया। कोई अन्य, अपने नृत्य से झूलते कुंडलों से सजे गाल को उनके गाल से सटाकर, स्वयं चबाया हुआ पान उन्हें अर्पित करने लगी। कोई और, नाचते-गाते, पायल और करधनी की झंकार के साथ, थककर, अपने पास खड़े अच्युत के कमल-हाथ को अपने वक्ष पर विश्राम के लिए रख ली। गोपियाँ, अच्युत को अपना प्रियतम, लक्ष्मी-पति के रूप में पाकर, उनके गले में बाँहें डालकर, गाती हुई, उनके साथ क्रीड़ा करने लगीं। कमल के कुंडल, केश, पसीने से चमकते गाल, मुख की आभा, कंगनों-पायल की ध्वनि, केशों में ढीली माला और भंवरों की गूँज के साथ, गोपियाँ भगवान् के संग नृत्य करने लगीं। इस प्रकार, आलिंगन, हाथों के स्पर्श, प्रेमपूर्ण दृष्टि, चंचल मुस्कान और हास्य से लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण ने वृज की सुंदर स्त्रियों के साथ वैसे ही क्रीड़ा की, जैसे बालक अपनी ही छाया से खेलता है। भगवान् के अंग-स्पर्श से गोपियों के इन्द्रिय-सुख की सीमा नहीं रही—उनके केश, वस्त्र, वक्षबन्ध ढीले हो गए, वे गिरे हुए आभूषण और पुष्प ठीक से समेट भी नहीं पा रही थीं। श्रीकृष्ण की इन लीलाओं को देखकर स्वर्ग की स्त्रियाँ भी मोहित हो गईं, चन्द्रमा और उसका परिवार भी विस्मित रह गया। भगवान् ने, अपनी लीला से, जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण कर, स्वयं में स्थित रहते हुए, उन सबसे क्रीड़ा की। जब अत्यधिक क्रीड़ा से वे थक गईं, तब भगवान् ने, करुणा और स्नेह से, अपने शान्त हाथ से उनके मुखमंडल को धीरे-धीरे पोंछा। ऐसी थी श्रीकृष्ण की दिव्य रासलीला—परम ज्ञान और भक्ति का अद्वितीय संगम, जहाँ योग, वैराग्य और प्रेम का परिपाक हुआ।