यमुना के तट पर, प्रचेताओं ने एक बार फिर एकत्र होकर अपने मन को श्रीकृष्ण में स्थिर किया और उनकी प्रतीक्षा में कृष्ण के गुणों का गान करने लगे। लेकिन जब उनकी उत्कंठा और विरह ने क्रोध का रूप लिया, तो उन्होंने अपने मुख से अग्नि और वायु प्रकट की, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे प्रलयकालीन अग्नि से पृथ्वी को निर्जन करने वाले हों। उनके इस विकराल रूप को देखकर वृक्ष भस्म होने लगे। तभी ब्रह्मा जी वहां प्रकट हुए और अपनी मधुर वाणी से बार्हिष्मत के पुत्रों को शांत किया। ब्रह्मा जी की आज्ञा से, जो वृक्ष शेष बचे थे, वे भयभीत होकर अपनी पुत्री को प्रचेताओं को सौंपने लगे, जैसा स्वयंभू मनु ने निर्देश दिया था। ब्रह्मा जी के आदेश से प्रचेताओं ने उस कन्या, मारीषा को स्वीकार किया, जिनसे एक महान अपराध के कारण सृष्टि के प्रजापति उत्पन्न हुए। कालचक्र के चलते जब चाक्षुष मन्वंतर का अंत हुआ और सृष्टि के प्रारंभ का समय आया, तब प्रजापति दक्ष ने, नियति के वश होकर, इच्छित जीवों की उत्पत्ति की। दक्ष का तेज ऐसा था कि वे अपने तेज से सभी को मात देते थे और अपने कर्मों से दक्ष—कुशल—कहलाए। आदिशक्ति ने स्वयं उन्हें जीवों की सृष्टि और पालन के लिए नियुक्त किया, और उन्हें तथा अन्य प्रजापतियों को समस्त प्राणियों का अधिपति बनाया। इसी बीच, वृंदावन की गोपियाँ श्रीकृष्ण के लिए विरह में तड़प रही थीं। वे आपस में कहने लगीं—"हे प्रिय, तुम्हारे जन्म से व्रज की शोभा बढ़ गई है; लक्ष्मी सदा यहाँ वास करती हैं। तुम्हारे भक्त चारों ओर तुम्हें खोज रहे हैं, क्योंकि उनका जीवन तुम्हीं से चलता है। शरद् की रात में, तुम्हारी दृष्टि कमल के हृदय की शोभा भी चुरा लेती है। हम तुम्हारी दासियाँ हैं, हे वरदाता, क्या तुम्हें हमें यहीं छोड़ देना उचित है? हे परमेश्वर, जल के विष से, नागरूप असुर से, तूफान, बिजली, अग्नि, इंद्र के पुत्र और हर ओर के संकटों से तुमने बार-बार हमारी रक्षा की है। तुम केवल गोपियों के प्रिय नहीं, समस्त जीवों के अंतर्यामी हो। ब्रह्मा के अनुरोध पर, संसार की रक्षा के लिए तुम सात्वत वंश में प्रकट हुए हो। हे वृष्णिवंशश्रेष्ठ, तुम्हारे चरण जो शरणागत को संसार के भय से मुक्त करते हैं, वे हमारे सिर पर रखो। तुम्हारे करकमल समस्त इच्छाएँ पूर्ण करते हैं। हे वीर, व्रज का दुःख दूर करने वाले, तुम्हारी मुस्कान अपने ही जनों के अभिमान को मिटा देती है; हमें अपनी दासी स्वीकार करो और अपना कमल-सा मुख दर्शाओ। जो लोग तुम्हारे चरणों में झुकते हैं, उनके पापों का नाश कर देते हो; तुम ही लक्ष्मी के निवास हो; तुम्हारे चरणों को कालिय नाग ने भी अपने फनों पर धारण किया। इन्हें हमारे वक्ष पर रखो और हमारे हृदय की वेदना दूर करो। तुम्हारी मधुर वाणी, मनोहर शब्द और हृदय को भाने वाली बुद्धि हमें मोहित कर देती है। हे कमलनयन, अपने अधरों के अमृत से हमें तृप्त करो। तुम्हारे चरित्रों की कथा दुःखियों के लिए जीवनदायिनी है, कवियों द्वारा प्रशंसित है, पापों का नाश करती है, सुनने से शुभता और समृद्धि मिलती है; जो इन्हें संसार में फैलाते हैं, वे सचमुच दानी हैं। तुम्हारी हँसी, स्नेहदृष्टि, क्रीड़ा और ध्यान सब मंगलकारी हैं; हृदय को छूने वाली गुप्त बातें हमारे मन को व्याकुल करती हैं। जब तुम व्रज में गौएँ चराते हुए निकलते हो, तुम्हारे कमल-से चरण जब पत्थर, घास और अंकुरों पर पड़ते हैं, तो हमारा मन, जो तुम्हारे बिना चैन नहीं पाता, तुम्हारे साथ ही चलता है। संध्या समय, जब तुम वन से लौटते हो, तुम्हारे नील केश, पुष्पों से सुशोभित मुख और धूल से सना रूप, बार-बार प्रकट होता है और हमारे हृदय में प्रेम जगा जाता है। तुम्हारे कमल-चरण, जो समर्पितों की इच्छाएँ पूर्ण करते हैं, लक्ष्मी द्वारा पूजित हैं, पृथ्वी के भूषण हैं, विपत्ति में ध्यान देने योग्य हैं और शांति देते हैं; इन्हें हमारे वक्ष पर रखो और हमारे दुःख हर लो। तुम्हारे अधर, जिन पर बांसुरी की मधुर ध्वनि गूँजती है, प्रेम बढ़ाते हैं, दुःख मिटाते हैं और अन्य सभी आकर्षणों को भुला देते हैं; हमें अपने अधरों का अमृत दो। जब तुम दिन में वन में विचरते हो, जो तुम्हें नहीं देख पाते, उनके लिए एक पल युग के समान हो जाता है; तुम्हारे घुँघराले केश और सुंदर मुख को देखने की लालसा में उनकी पलकें भी बाधक बन जाती हैं। हमने पति, पुत्र, परिवार, भाई और संबंधी सब छोड़ दिए; हम तुम्हारे पास आ गईं, हे अचल! तुम्हारे गीतों से मोहित होकर, कौन स्त्री रात में घर लौट सकती है? गुप्त वार्ताएँ, हृदय में उठता प्रेम, तुम्हारा मुस्कानयुक्त मुख, स्नेहदृष्टि और चौड़े वक्ष की छटा बार-बार हमारे मन को व्याकुल और मोहित कर देती है। हे व्रजवासियों के कल्याण के स्वरूप, तुम्हारी उपस्थिति ही सब दुःखों का हरण और जगत् का कल्याण करती है। कृपया, अपने प्रियजनों के विरह से पीड़ित हृदयों से स्वयं को थोड़ा भी दूर कर लो, क्योंकि तुम्हारी अनुपस्थिति ही विरह की वेदना की औषधि है। हे प्रिय, हम तुम्हारे सुंदर कमल-चरणों को अपने वक्ष पर सावधानी से रखते हैं, फिर भी उनके कठोरता से डरती हैं। क्या इसी कारण तुम वन में विचरते हो? क्या तुम्हारे चरणों को तीखे कंकड़ों से पीड़ा नहीं होती? हमारा मन, जो तुम्हारे जीवन से पोषित है, तुमसे कभी अलग नहीं होता। इसी प्रकार, गोपियों का यह विरह-गीत पूर्ण हुआ, जिसे 'गोपियों का गीत' कहा जाता है—यह श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध के तैंतीसवें अध्याय का अंत है, जो परम विरक्तों की अमूल्य निधि है। इधर, जब श्रीकृष्ण ने अपने पार्थिव शरीर का परित्याग किया, तो राम के पत्नियाँ, वासुदेव की पत्नियाँ, हरि के पुत्र प्रद्युम्न की पत्नियाँ और स्वयं श्रीकृष्ण की पत्नियाँ, जिनमें रुक्मिणी भी अग्रणी थीं, सबने अग्नि में प्रवेश कर, अपनी आत्मा को प्रिय के साथ एकाकार कर लिया। अर्जुन, अपने प्रिय मित्र श्रीकृष्ण के वियोग से व्याकुल होकर, उनके गुणों और उपदेशों को स्मरण कर स्वयं को सांत्वना देने लगे। उन्होंने अपने उन संबंधियों का विधिपूर्वक अंतिम संस्कार किया, जिनका वंश समाप्त हो गया था। जिस द्वारका को श्रीकृष्ण त्याग चुके थे, वह समुद्र की लहरों में क्षणभर में डूब गई, केवल भगवान का दिव्य निवास शेष रह गया। वहीं, भगवान मधुसूदन सदा विराजमान रहते हैं, स्मरण करने मात्र से समस्त दोषों का नाश करते हैं और सभी मंगलों में सर्वाधिक मंगलकारी हैं। अर्जुन ने शेष बची स्त्रियों, बालकों और वृद्धों को लेकर इन्द्रप्रस्थ पहुंचाया और वहाँ वज्र को राजा नियुक्त किया। जब पांडवों ने अपने मित्रों की मृत्यु का समाचार सुना, तो उन्होंने आपको वंश का उत्तराधिकारी बनाया और वे सभी महाप्रयाण को चले गए। जो भी श्रद्धा से भगवान विष्णु के जन्म और कर्म की कथा का श्रवण या कीर्तन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। भगवान हरि के आकर्षक अवतारों, वीर्यपूर्ण चरित्रों और बाल्यलीलाओं का श्रवण-कीर्तन करने से मनुष्य को सर्वोच्च भक्ति की प्राप्ति होती है, चाहे वह कहीं भी हो। परंतु, जो व्यक्ति अपने शरीर, अभिमान, क्रोध और वासना के वशीभूत होकर दूसरों से संघर्ष करता है, वह स्वयं को विनाश की ओर ले जाता है। पंचमहाभूतों से बने इस शरीर में अज्ञानी जीव बार-बार 'मैं' और 'मेरा' के मोह में बंधता है, जिससे उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। यदि जीव फिर से दुष्ट मार्ग पर चलता है, केवल इंद्रियों और उदर की तृप्ति के लिए प्रयत्न करता है, तो वह पुनः उसी अंधकार में गिरता है, जिसमें पहले था। इस प्रकार, ये दिव्य घटनाएँ और उपदेश श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित हैं, जो श्रद्धा से सुनने और मनन करने पर जीवन का कल्याण करती हैं।