श्रीकृष्ण, जो स्वयं में संतुष्ट और अखंड थे, उन्होंने रासलीला के समय गोपियों के साथ प्रेम का आनंद लिया। इस लीला के माध्यम से उन्होंने प्रेमियों की व्याकुलता और स्त्रियों के चित्त की चंचलता को प्रकट किया। उस समय, जब ये घटनाएँ घट रही थीं, सभी गोपियाँ अचंभित होकर वन में कृष्ण को ढूँढती फिर रही थीं। उन्हीं में से एक गोपी, जिसे कृष्ण अन्य गोपियों को छोड़कर अपने साथ ले गए थे, स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानने लगी। उसने सोचा, "अब जब मेरे प्रियतम ने उन सब गोपियों को छोड़ दिया है, और केवल मेरी पूजा कर रहे हैं, तो मैं सबसे महान हूँ।" वन के एक स्थान पर पहुँचकर वह अभिमान से भरकर केशव से बोली, "अब मुझसे और नहीं चला जाता, आप मुझे जहाँ चाहें वहाँ ले चलिए।" कृष्ण ने स्नेहपूर्वक कहा, "तो मेरे कंधे पर चढ़ जाओ।" परंतु जैसे ही उसने यह चाहा, कृष्ण वहाँ से अदृश्य हो गए। अब वह गोपी अकेली रह गई और विरह में विलाप करने लगी, "हाय नाथ! मेरे प्रिय, मेरे जीवन! आप कहाँ हैं, कहाँ हैं, हे बलवान? हे सखा, अपनी दासी को दर्शन दीजिए!" शुकदेव जी कहते हैं कि जब अन्य गोपियाँ कृष्ण के मार्ग की खोज में भटक रही थीं और उन्हें पता नहीं था कि कृष्ण कहाँ गए, तब उन्होंने अपनी उस सखी को देखा, जो अपने प्रिय के वियोग में अत्यंत व्याकुल और भ्रमित थी। जब उन्होंने उस सखी से सुना कि कैसे उसके अभिमान के कारण माधव ने उसे छोड़ दिया और वह अपमानित हुई, तो वे सभी आश्चर्यचकित हो गईं। इसके बाद, जब तक चाँदनी रात रही, वे गोपियाँ कृष्ण की खोज में वन में भटकती रहीं। परंतु जब अंधकार छा गया, तो वे लौट आईं। उनके मन, वाणी, कर्म—सब कृष्ण में ही लीन हो गए थे। वे केवल कृष्ण के गुणों का गान करती रहीं और अपने घर-बार को भूल गईं। पुनः वे सब यमुना के तट पर एकत्र हुईं, कृष्ण के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए, कृष्ण का ही कीर्तन करने लगीं। राजन्, उस समय वे गोपियाँ, अपने क्रोध में, मानो अपने मुँह से अग्नि और वायु छोड़ने लगीं, जैसे प्रलयकाल के अंत में संहारक अग्नि पृथ्वी को बंजर कर देती है। जब उन वृक्षों को भस्म होते देखा, तब ब्रह्मा जी वहाँ आए और बर्हिष्मत के पुत्रों को ज्ञान देकर शांत किया। फिर जो वृक्ष शेष बचे थे, वे भयभीत होकर अपनी कन्या प्रचेताओं को ब्रह्मा जी के आदेश से सौंपने लगे। ब्रह्मा के निर्देश से प्रचेताओं ने मारिषा को पत्नी रूप में स्वीकार किया, और उसी से, एक महान अपराध के कारण, प्रजापति का जन्म हुआ। जब चाक्षुष मन्वंतर का अंत आया और सृष्टि के प्रारंभ का समय आया, तब समय के प्रवाह में प्रेरित होकर दक्ष ने अपनी इच्छा से प्रजा की रचना की। वह दक्ष, अपने तेज से सबको प्रकाशित करने वाले, अपने कर्मों से दक्ष कहलाए। आदि-पुरुष ने उन्हीं को और अन्य प्रजापतियों को सृष्टि और प्रजा की रक्षा के लिए नियुक्त किया। अब गोपियाँ कृष्ण-विरह में तड़पती हुईं कृष्ण से कहने लगीं, "हे कृष्ण! आपके जन्म से व्रजभूमि धन्य हो गई है, लक्ष्मी सदा यहाँ निवास करती हैं। हमारे जीवन आप पर ही निर्भर हैं, आपके भक्त चारों ओर आपकी खोज में हैं। हे प्रिय, आपके शरद ऋतु की रातों में कमल की सुंदरता को भी चुरा लेने वाली दृष्टि से हम मोहित हो जाती हैं। हम आपकी दासियाँ हैं, हमें यहाँ मारना क्या उचित है?" "आपने हमें बार-बार जल के विष, सर्प रूपी दैत्य, तूफान, बिजली, अग्नि, इंद्र के पुत्र और अनेक संकटों से बचाया है। आप केवल गोपियों के प्रिय नहीं, समस्त जीवों के अंतर्यामी हैं। ब्रह्मा के अनुरोध पर आप सतवत वंश में प्रकट हुए, संसार की रक्षा के लिए।" "हे वृष्णिवंश शिरोमणि! आपने अपने चरणों को शरणागतों के लिए भय से मुक्ति का आश्रय बनाया है। आपके कमल-हस्त, जो इच्छाएँ पूरी करते हैं, कृपा कर हमारे सिर पर रखें। हे वीर! आप व्रजवासियों के दुःख हरने वाले हैं, आपकी मुस्कान अपने ही लोगों का अहंकार नष्ट कर देती है। हमें अपनी दासी स्वीकार करें, अपना सुंदर कमल-सा मुख दिखाएँ।" "जो आपके आगे झुकते हैं, उनके पापों का नाश करने वाले, गाय चराने वालों के साथ चलने वाले, लक्ष्मी के निवास, आपके चरण नागराज के फनों से पूजे गए हैं, वे हमारे वक्ष पर रखें और हमारे हृदय की पीड़ा दूर करें।" "आपकी मधुर वाणी, मन को भाने वाली बातें और ज्ञान से आप हमें मोहित कर देते हैं। हे कमलनयन! हमें अपने अधरों के अमृत से तृप्त करें। आपके चरित्रों का अमृत, दुखियों के लिए जीवन है, कवियों द्वारा गाया जाता है, पापों का नाश करता है, श्रवण से शुभता और समृद्धि देता है। जो इसे संसार में फैलाते हैं, वे सबसे दानी हैं।" "आपकी हँसी, प्रेमपूर्ण दृष्टि, खेल, ध्यान, और हृदय को छू लेने वाली गुप्त बातें, हमारे मन को बार-बार विचलित कर देती हैं। जब आप व्रज में गायें चराते हैं, आपके चरण पत्थर, घास और अंकुरों पर पड़ते हैं, तब हमारे मन, विरह से पीड़ित, आपके पीछे-पीछे चलने लगते हैं।" "दिन के अंत में, जब आप वन-फूलों से सजे, नीले केशों के साथ, धूल से ढके हुए, बार-बार प्रकट होते हैं, तब हमारे हृदय में प्रेम की लहरें उठती हैं। आपके चरण, जो लक्ष्मी द्वारा पूजे जाते हैं, विपत्ति में ध्यान देने योग्य हैं, वे हमारे वक्ष पर रखें और हमारी पीड़ा हरें।" "आपके अधर, जो बांसुरी के स्पर्श से और मधुर हो गए हैं, हमारे प्रेम को बढ़ाते और दुख को हर लेते हैं, सभी सांसारिक आकर्षणों को भुला देते हैं। हे वीर! हमें अपने अधरों का अमृत दें।" "जब आप वन में विचरण करते हैं, तब जो आपको नहीं देख पाते, उनके लिए एक क्षण भी युग के समान हो जाता है। आपकी घुंघराली जटाएँ और सुंदर मुख, मंद नेत्रों वालों के लिए, उनकी पलकों के कारण छिप जाता है।" "हमने अपने पति, पुत्र, परिवार, भाई और संबंधी सब कुछ छोड़ दिया है और आपके पास आ गई हैं। आपकी वंशी की तान सुनकर, कौन सी स्त्री रात के समय घर लौट सकती है?" "आपकी गुप्त बातें, हृदय में उठती प्रेम की लहरें, मुस्कान, प्रेममय दृष्टि और आपके विशाल वक्ष की शोभा हमारे मन को बार-बार आकर्षित और मोहित करती है।" "हे व्रजवासियों के लिए शुभता के प्रतीक! आपके दर्शन से ही सब दुःख दूर होते हैं, कल्याण फैलता है। कृपा कर, अपने भक्तों के हृदय में जो विरह की ज्वाला है, उसे शांत करने के लिए, थोड़ी देर के लिए ही सही, अपने को उनसे दूर कर लें।" "हे प्रिय! हम आपके सुंदर कमल-चरणों को अपने वक्ष पर रखती हैं, यद्यपि उनके कठोरता से डरती हैं। क्या इसी कारण आप वन में विचरते हैं? क्या आपके चरणों को तीखी घास और पत्थर चुभते नहीं? हमारे मन, आपके प्राण से पोषित, आपसे कभी अलग नहीं होते।" "हे प्रिय! आपके वियोग में राम की पत्नियाँ उनके शरीर को गले लगाकर अग्नि में प्रवेश कर गईं; वासुदेव की पत्नियाँ, हरि के पुत्र प्रद्युम्न की पत्नियाँ और स्वयं रुक्मिणी के नेतृत्व में कृष्ण की पत्नियाँ भी अग्नि में प्रवेश कर गईं, और आत्मा से उनके साथ एकाकार हो गईं।" "अर्जुन, जो कृष्ण के वियोग में अत्यंत दुखी थे, उन्होंने कृष्ण के गुणों और उपदेशों का स्मरण कर स्वयं को सांत्वना दी।" यहीं इस अध्याय का, जो ‘गोपियों का गीत’ नाम से प्रसिद्ध है, श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध के दसवें भाग का एकत्रित समापन होता है।