भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए शुकदेवजी कहते हैं कि श्रीकृष्ण, अपने भ्राता बलराम के साथ वृन्दावन में निवास कर रहे थे। उस समय उन्होंने देखा कि ग्वाले इन्द्रदेव के लिए एक यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं। सर्वज्ञ, सर्वात्मा, और सब कुछ जानने वाले श्रीकृष्ण ने विनम्रता से नन्द बाबा और अन्य वृद्धजनों के पास जाकर उनसे पूछा, “पिताजी, यह कैसी हलचल है? इसका क्या उद्देश्य है, किसके लिए किया जा रहा है, और यह यज्ञ कौन कर रहा है? मुझे यह जानने की बड़ी इच्छा है। कृपया मुझे बताइए, क्योंकि धर्मात्मा लोग अपने कार्यों को छुपाते नहीं हैं।” कृष्ण आगे कहते हैं, “जो व्यक्ति मित्र, शत्रु और तटस्थ सभी के प्रति समभाव रखता है, वही सच्चा मित्र कहलाता है। लोग कई बार जानबूझकर या अनजाने में कर्म करते हैं; बुद्धिमान के लिए कर्म सिद्धि लाता है, मूर्ख के लिए नहीं। तो यह यज्ञ किस उद्देश्य से हो रहा है? या यह केवल परंपरा के कारण किया जा रहा है? कृपया मुझे विस्तार से बताइए।” नन्द बाबा ने उत्तर दिया, “बेटा, इन्द्रदेव वर्षा के स्वामी हैं। बादल उन्हीं का स्वरूप हैं, वे ही जल बरसाते हैं जिससे सभी प्राणी आनंदित होकर जीवित रहते हैं। हम सब और अन्य लोग भी उसी वर्षा के स्वामी इन्द्र की पूजा करते हैं, घी और अन्य सामग्री से यज्ञ करते हैं। इसी से जो अन्न प्राप्त होता है, उसी से लोग धर्म, अर्थ और काम के लिए जीवन यापन करते हैं। जो व्यक्ति इस परंपरागत धर्म को इच्छा, लोभ, भय या द्वेष के कारण छोड़ देता है, वह कभी कल्याण को प्राप्त नहीं करता।” शुकदेवजी कहते हैं कि नन्द बाबा और अन्य व्रजवासियों की बातें सुनकर श्रीकृष्ण ने इन्द्र के प्रति असंतोष उत्पन्न करते हुए अपने पिता से कहा, “प्राणी कर्म से जन्म लेता है और कर्म से ही नष्ट होता है। सुख-दुख, भय और निर्भयता—सब कर्म से ही उत्पन्न होते हैं। यदि कोई स्वामी दूसरों के कर्म का फल देता है, तो वह भी कर्ता पर ही निर्भर है; जो कर्म नहीं करता, उस पर उसका कोई अधिकार नहीं। जब लोग अपने कर्म के अनुसार फल पाते हैं, तो इन्द्र की क्या आवश्यकता है? सब जीव अपनी प्रकृति के अनुसार ही कर्म करते हैं—देवता, असुर, मनुष्य—सबका यही स्वभाव है। मित्र, शत्रु या तटस्थ—सभी के लिए कर्म ही गुरु और स्वामी है। इसलिए, अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करते हुए, उसी का पूजन करना चाहिए जिससे हमारा जीवन चलता है। जो अपने जीविकोपार्जन के लिए एक मार्ग होते हुए भी दूसरे मार्ग पर आश्रित होता है, उसे कभी कल्याण नहीं मिलता, जैसे पतिव्रता नारी को पर-पुरुष से नहीं मिलता। ब्राह्मण को ब्रह्म से, क्षत्रिय को भूमि की रक्षा से, वैश्य को व्यापार से, और शूद्र को द्विजों की सेवा से जीवन यापन करना चाहिए। खेती, व्यापार, गौ-रक्षा, ब्याज पर धन देना और संगीत—ये चार प्रकार की जीविका हैं, जिनमें हम सदा गौ-रक्षा में लगे रहते हैं।” कृष्ण ने आगे समझाया, “सत्व, रज और तम—ये तीनों ही सृष्टि, पालन और संहार के कारण हैं। रजोगुण से ही बादल जल बरसाते हैं, जिससे सभी प्राणी पोषित होते हैं। फिर इन्द्र क्या कर सकते हैं? हम तो न नगर, न गांव, न घर—हम तो सदा वनों, पर्वतों और जंगलों में रहते हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम गौओं, ब्राह्मणों और पर्वत के लिए यज्ञ करें, और जो सामग्री इन्द्र के लिए रखी है, उसी से यह यज्ञ करें।” फिर श्रीकृष्ण ने विस्तार से यज्ञ की विधि बताई—“विविध प्रकार के पकवान, खीर, सूप, पूड़ी, मालपुए, और घी-दूध से बने व्यंजन तैयार करें। वेद-शास्त्र में निपुण ब्राह्मणों द्वारा विधिपूर्वक अग्निहोत्र करें, उन्हें उत्तम भोजन और गौ-दान दें। घुड़सवार, चांडाल, पतित आदि को भी यथायोग्य दान दें। गौओं को जौ खिलाकर पर्वत को अर्पण करें। सब लोग स्नान करके, सुंदर वस्त्र पहनकर, गंध लगाकर, गौओं, ब्राह्मणों, अग्नि और पर्वत की परिक्रमा करें। यही मेरा मत है, यदि आपको उचित लगे, तो ऐसा ही करें—यह यज्ञ गौओं, ब्राह्मणों, पर्वत और मुझे भी प्रिय है।” इस प्रकार श्रीकृष्ण ने न केवल कर्म और स्वधर्म का मर्म बताया, बल्कि व्रजवासियों को भी उनके जीवन के वास्तविक आधार—गौ, ब्राह्मण और गोवर्धन पर्वत—की महिमा से परिचित कराया। इससे पूर्व, शुकदेवजी ने यही भी बताया कि भगवान अपने भक्तों के अपराध क्षमा कर देते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि माया के कारण जीव उनका वास्तविक स्वरूप नहीं पहचान पाते। जब व्रजवासी अपने अपराध को याद करते हैं, तो भी वे कृष्ण के दर्शन की इच्छा से डिगते नहीं, चाहे कंस का भय क्यों न हो। वे विचार करते हैं कि यदि सुख-दुख का कारण ग्रह हैं, तो आत्मा का उससे क्या संबंध? ग्रह तो केवल अन्य ग्रहों पर ही प्रभाव डालते हैं, आत्मा तो अजन्मा है। इसी प्रकार, यदि कर्म ही सुख-दुख का कारण है, तो आत्मा का उससे क्या लेना-देना? शरीर तो केवल चमड़ी है, आत्मा तो चेतन है, फिर क्रोध किस पर करें? यदि काल ही सुख-दुख का कारण है, तो आत्मा का उससे क्या संबंध? काल और आत्मा दोनों एक ही तत्व के हैं। जैसे अग्नि की गर्मी या हिम की ठंडक स्वयं में नहीं होती, वैसे ही द्वैत भी किसी अन्य में नहीं होता। कोई भी, कहीं भी, किसी भी प्रकार से, परमात्मा के लिए द्वैत नहीं उत्पन्न कर सकता। जन्म-मरण का चक्र भी उसी तरह है जैसे मैं हूँ, इसलिए जो जागृत है, वह पंचभूतों से नहीं डरता। इसी सर्वोच्च भक्ति के आधार पर, जो प्राचीन ऋषियों ने अपनाई थी, मैं भी मुकुंद के चरणों की सेवा से इस अगम्य अंधकार को पार कर लूंगा। भगवान कहते हैं, “जिसने सब कुछ त्याग दिया, थकान से रहित, वस्त्र और धन से रहित, पृथ्वी पर संन्यासी की तरह विचरते हुए, और दुष्टों द्वारा तिरस्कृत होने पर भी अपने कर्तव्य में अडिग रहते हुए, उस मुनि ने यह उपदेश दिया।” वास्तव में, किसी के सुख-दुख का कारण स्वयं आत्मा ही है; मित्र, शत्रु और तटस्थ—ये सब संसार की अज्ञानता से उत्पन्न हैं। इसलिए, हे प्रिय, अपने पूरे मन से बुद्धि को मुझमें स्थिर करके मन को वश में करो, यही योग का सार है। जो भी इस ब्रह्मनिष्ठ मुनि द्वारा गाया गया यह गीत मन लगाकर धारण करता, सुनता या गाता है, वह संसार के द्वंद्वों से प्रभावित नहीं होता। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कर्म, स्वधर्म, भक्ति और आत्मज्ञान की गूढ़ बातें व्रजवासियों को समझाईं और उन्हें सच्चे अर्थ में धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।