अब मैं आपको अग्नि पुराण के इन श्लोकों का भावपूर्ण, क्रमबद्ध और श्रद्धामय हिन्दी कथा रूप सुनाता हूँ— सृष्टि के आरंभ में, यह बताया गया है कि सबसे पहली योनि वह है, जिसमें सभी देवता, मनु आदि, पशु, पक्षी, चौपाये और सर्प आदि चार प्रकार के जीव उत्पन्न होते हैं। पाँचवीं योनि स्थावर—अर्थात् जड़, वृक्ष, लता आदि—की है। छठी योनि अप्सराओं, पिशाचों, राक्षसों, यक्षों, गंधर्वों और इन्द्र से संबंधित है। आठवीं योनि को सौम्य, प्राणेश्वर और ब्रह्मा की कहा गया है। ये आठों पृथ्वी तत्त्व के क्षेत्र माने गए हैं। फिर बताया गया कि संहार या प्रलय मूल प्रकृति और महत् तत्त्व में होता है। भोग, ब्रह्मा और कारण—इन सबकी अनुभूति जाग्रत अवस्था, लोकों आदि के माध्यम से होती है। साधक को चाहिए कि वह इन सबका निरोध—अर्थात् बन्धनों का अंत—अपने मंत्र से ध्यानपूर्वक करे। इसके लिए विशेष मंत्रों का उच्चारण, हाथ के संकेत (मुद्राएँ) और श्वास-प्रश्वास की विधि बताई गई है। जैसे—'ॐ हां ह्रूं हां, सूत्रों के निरोध के लिए, हूँ फट्' आदि मंत्रों के साथ हाथी अंकुश की मुद्रा और श्वास का संयोजन किया जाता है। फिर 'ॐ ह्रूं ह्रां ह्रूं' मंत्र के साथ नीचे से ऊपर प्राण को रोककर, और 'ॐ ह्रं हां' मंत्र के साथ श्वास को छोड़ते हुए, उत्पत्ति की मुद्रा में, सब बन्धनों का अंत किया जाता है। इसके उपरांत, अर्घ्य अर्पण, शुद्धिकरण और तीन-तीन बार उपस्थित और तृप्ति के लिए आहुति दी जाती है। 'ॐ हां ब्रह्मणो नमः' मंत्र से ब्रह्मा का आवाहन, पूजन और तृप्ति कराई जाती है, और कहा जाता है—'हे ब्रह्मा, इस क्षेत्र में मैं इस साधक का मोक्ष के लिए दीक्षा करता हूँ।' अब अनुष्ठान के नियमों की जानकारी दी जाती है, और रक्षक देवी वागीश्वरी का हृदय में आवाहन किया जाता है। वागीश्वरी देवी की छह रूपों में—इच्छा, ज्ञान, क्रिया आदि—पूजा कर तृप्त किया जाता है। वागीश्वरी ही सभी योनियों में स्पंदन का कारण हैं। हृदय-पात्र और बीजाक्षर के साथ, 'हूं फट्' तक के मंत्र से देवी का आवाहन होता है। फिर, साधक के हृदय में अग्नि की चिनगारी जैसी चैतन्य का प्रवेश होता है। यह चैतन्य, निरोध की स्थिति में, बन्धनों से बँधा हुआ, सबसे बड़े के द्वारा विभाजित किया जाता है—'ॐ हां हूं हः हूं फट्; ॐ हं स्वाहा' मंत्रों के साथ। फिर अपने मंत्र के द्वारा, श्वास के साथ, उसे भीतर एकीकृत किया जाता है—'ॐ हां ह्रूं हां, आत्मन को नमः'। माता-पिता और चैतन्य के संयोग की कल्पना की जाती है। ब्रह्मा आदि के क्षेत्रों का त्याग कर, शिव के लोक की ओर ले जाया जाता है, और गर्भाधान के लिए सभी योनियों में एक साथ प्रवेश कराया जाता है। बाएँ हाथ की मुद्रा से वागीश्वरी देवी के गर्भ में—'ॐ हां हां हां, आत्मन को नमः'—मंत्र के साथ प्रवेश कराया जाता है। फिर पांच प्रकार से पूजा और तृप्ति की जाती है। अन्य योनियों में, हृदय में शरीर का शुद्धिकरण किया जाता है, और यहाँ पुत्रोत्पत्ति का कोई विशेष विधान नहीं है, क्योंकि कभी-कभी कन्या शरीर भी उत्पन्न हो सकता है। कभी-कभी चूड़ाकर्म या अन्य दिव्य अंगों की स्थापना की जाती है, और सिर के द्वारा जन्म की क्रिया की जाती है, सभी देहधारियों से भिन्न होकर। इसी प्रकार, उनके क्षेत्र में शिव-मंत्र के साथ ध्यान किया जाता है; भोग की कल्पना कवच-मंत्र से, और अस्त्र-मंत्र से इन्द्रिय विषय के रूप में की जाती है। फिर, मोह की अवस्था, उसकी अव्यक्तता और संहार की स्थिति का ध्यान किया जाता है। शिव के द्वारा धाराओं की शुद्धि और तत्वों के विवेक का कार्य हृदय में किया जाता है। साधक को चाहिए कि वह पाँच-पाँच की पाँच आहुति क्रमशः गर्भाधान आदि से दे, जिससे माया से उत्पन्न मल, कर्म आदि के बन्धनों की निवृत्ति हो। हृदय की शुद्धि के बाद, सौ आहुति देनी चाहिए; मल की शक्ति के संयम से बन्धनों से मुक्ति होती है। 'स्वाहा' से समाप्त होने वाले मंत्र को अस्त्र की तरह प्रयोग कर, पाँच-पाँच की पाँच आहुति दी जाती है; माया के अंत वाले बन्धन के लिए अस्त्र-मंत्र सात बार जपना चाहिए। विधान के अनुसार, अनुष्ठानिक चाकू से—'ॐ हूं, निरोध की कुण्डली के बन्धन को, हूं फट्'—मंत्र के साथ बन्धन काटना चाहिए। दोनों हाथों से और बाण-मंत्र के साथ बन्धन को हटाया जाता है। फिर, घृत से भरा हुआ चमचा लेकर, सहायक अस्त्र-मंत्र से जलाना और मुख्य अस्त्र-मंत्र से भस्म करना चाहिए। तत्पश्चात, पाँच आहुति देकर अंकुश जैसे बन्धनों की निवृत्ति की जाती है—'ॐ हः, अस्त्र को, हूं फट्'—मंत्र के साथ। फिर आठ अस्त्र-आहुतियों से प्रायश्चित्त किया जाता है। इसके बाद, सृष्टिकर्ता का आवाहन कर, पूजन और आहुति दी जाती है। 'ॐ हां, शब्द और स्पर्शरूप शुद्ध ब्रह्मण, स्वाहा'—मंत्र से तीन आहुति देकर अधिकार प्रदान किया जाता है, क्योंकि हे ब्रह्मन्, आप ही वे हैं जो यज्ञ-पशु के समस्त पापों को भस्म कर देते हैं। अब साधक को फिर से बन्धन में नहीं रहना चाहिए, शिव का आदेश घोषित किया जाता है। फिर सृष्टिकर्ता को मुक्त कर, दाहिने मार्ग से शांति से विदा किया जाता है। संहार-मुद्रा और अपनी श्वास का संयम कर, अमृत के समान शुद्ध जल की बूँद वाले पात्र का पूजन किया जाता है। उस जल-बूँद को लेकर, 'उद्भव' नामक श्वास के साथ उसे सूत्र से जोड़ना चाहिए। उस अमृत तुल्य जल-बूँद का पुनः पूजन कर, शिष्य के पोषण के लिए गुरु उसे उसके सिर पर स्थापित करता है। फिर उसे 'शिव' मंत्र के साथ माता-पिता को प्रदान करता है—'वौषट्' तक। इस प्रकार, अनुष्ठान पूर्ण होता है और निरोध शुद्ध हो जाता है। इसके उपरांत, ईश्वर कहते हैं—अब शुद्ध और शुद्ध किए गए दोनों तत्त्वों का संयोग, दीर्घ और ह्रस्व स्वर के प्रयोग से, ध्वनि की गूंज के साथ किया जाए। 'ॐ हां ह्रूं हां'—इन मंत्रों के साथ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, बुद्धियाँ, तीन गुण, अहंकार और चतुर्विंशतितत्त्व पुरुष—इन सबका ध्यान किया जाता है। इन पच्चीस तत्त्वों को आधार में स्थित मानकर, 'ख' से 'य' तक के अक्षरों सहित, उनका ध्यान करना चाहिए। पचास और छियासठ—इनके नाम लोकों के अनुसार जाने जाते हैं, उतने ही रुद्र वहाँ माने गए हैं। इन रुद्रों के नाम इस प्रकार हैं—अमरेश, प्रभाव, नैमिष, पुष्कर, पाड़ी, डंडी, भावभूति, और आठवाँ अष्टम। फिर नकुलीश, हरिश्चंद्र, श्रीशैल, अन्वीश, अस्नातिकेश, महाकाल, मध्यमा, केदार, भैरव, दूसरी आठ की गणना, फिर गया, कुरुक्षेत्र, खलान आदि स्थान। विमल, अट्टहास, महेन्द्र, भीम, वस्वापदा, रुद्रकोटि, महाबलशाली और सूर्यविहीन। गोकर्ण, भद्रकर्ण, स्वर्णाक्ष, स्थाणु, अजेेश, सर्वज्ञ, तेजस्वी, सूद, नांतर, सुभाहु, मत्त स्वरूप, विशाल, जटिल, रौद्र, पिंगलाक्ष, कालदंष्ट्रि, विदुर, घोर, प्राजापत्य, हुताशन, कामरूपी, काल, कर्ण, भयानक, मतंग, पिंगल, धातृरूप हर, शंकुकर्ण, विधान, श्रीकंठ और चंद्रशेखर। इस प्रकार, अग्नि पुराण के इन श्लोकों में सृष्टि की विविध योनियों, बन्धनों की निवृत्ति, मंत्र-विधि, तत्त्वों का ध्यान, और रुद्रों की महिमा का विस्तार से वर्णन हुआ है, जो साधक को मोक्ष-मार्ग की ओर अग्रसर करता है।