राजा द्रुपद के दरबार में, युधिष्ठिर ने विनम्रता से कहा, “हे कुरुनन्दन, मैं भी अभी तक अविवाहित हूँ, भीमसेन भी अविवाहित हैं, और आपकी रत्न-तुल्य पुत्री अर्जुन द्वारा प्राप्त की गई है। हमारा आपस में यह वचन है, राजन, कि हम जो भी प्राप्त करते हैं—चाहे वह भोजन हो या कुछ और—साझा करते हैं। हम इस नियम का उल्लंघन नहीं करना चाहते। यदि हम बिना विचार के कोई कार्य करेंगे, तो धर्म की बड़ी हानि होगी। अतः धर्म के अनुसार कृष्णा हम सबकी रानी बने, और हम सब बारी-बारी से अग्नि के समक्ष उसका हाथ ग्रहण करें।” फिर युधिष्ठिर ने आगे कहा, “कुरुवंश में एक पुरुष के लिए अनेक पत्नियाँ होना तो सुना गया है, किंतु एक स्त्री के अनेक पति हों, ऐसा कहीं नहीं सुना। न वैदिक धर्म में, न संसार में, ऐसा आचरण धर्मसम्मत माना गया है। आप धर्मनिष्ठ हैं, फिर भी ऐसा विचार क्यों कर रहे हैं, कौन्तेय? धर्म अत्यंत सूक्ष्म है और हमें उसका मार्ग स्पष्ट नहीं दिखता। अतः हमें प्राचीनों द्वारा स्थापित मार्ग का ही अनुसरण करना चाहिए। मैं कभी असत्य नहीं बोलता, न मेरे मन में अधर्म के प्रति कोई झुकाव है; मेरी माता भी ऐसा ही कहती हैं, और यही मेरे हृदय की भावना है।” फिर युधिष्ठिर ने बताया, “रुद्र के आश्रम में, मैंने स्वयं व्यास जी से यह सुना था कि यही दृढ़ धर्म है—इसे निस्संदेह अपनाइए और इसमें कोई संदेह न रखिए। हे कुन्तीपुत्र, आप, माता कुन्ती और मेरे पुत्र धृष्टद्युम्न—तीनों आपस में विचार करें, और कल प्रातः हम उसी के अनुसार कार्य करेंगे।” सभी ने एकत्र होकर इस विषय में चर्चा की। उसी समय, महर्षि व्यास, द्वैपायन, वहाँ आ पहुँचे। पांडव, माता कुन्ती और द्रौपदी ने उठकर महात्मा व्यास का आदरपूर्वक स्वागत किया। व्यास जी ने सबका कुशल-क्षेम पूछा और स्वर्णमय आसन पर विराजमान हुए। उनके संकेत पर सभी श्रेष्ठ पुरुष भी अपने-अपने आसनों पर बैठ गए। कुछ समय पश्चात, राजा द्रुपद ने मधुर वाणी में व्यास जी से पूछा, “हे महात्मन, एक स्त्री के अनेक पतियों के विषय में धर्म में उलझन क्यों है? कृपा कर यथार्थ बताइए। यह आचरण धर्म और शास्त्र के विरुद्ध प्रतीत होता है; मैं सबका मत सुनना चाहता हूँ। मेरे विचार में यह धर्म के विरुद्ध है, क्योंकि संसार में, या शास्त्रों में, एक स्त्री के अनेक पति नहीं होते। न ही पूर्वजों ने ऐसा आचरण किया, न ही विद्वानों को ऐसा करना चाहिए। अतः मैं यह कृत्य नहीं करूँगा, क्योंकि मुझे इसमें धर्म सन्दिग्ध लगता है। बड़े भाई द्वारा छोटे के पत्नी से संबंध भी अनुचित है।” फिर भी, उन्होंने स्वीकार किया कि धर्म सूक्ष्म है और वे स्वयं भी निश्चित नहीं कर सकते कि क्या धर्म है और क्या अधर्म। “हम जैसे लोग यह निर्णय नहीं कर सकते कि कृष्णा पाँचों की पत्नी बने। मैं असत्य नहीं बोलता, न ही अधर्म के प्रति मेरा मन झुकता है; मेरा मन स्थिर है, और मुझे इसमें कोई अधर्म नहीं दिखता।” व्यास जी ने तब कहा, “पुराणों में यह प्रसिद्ध है कि गौतमी, जिसे जातिला कहते हैं, सात ऋषियों के साथ रही थीं। इसी प्रकार, तपस्या से शुद्ध आत्मा वाली एक ऋषिकन्या, प्रचेतसों के दस पुत्रों के साथ एकत्र हुई थी। और गुरु का आदेश धर्म कहा गया है; माता सभी गुरुओं में श्रेष्ठ है। माता कुन्ती ने भी कहा था—‘जो मिला है, वह भिक्षा के रूप में खाओ।’ अतः मैं इसे ही परम धर्म मानता हूँ।” युधिष्ठिर ने भी कहा, “जैसा धर्मात्मा युधिष्ठिर ने कहा, वैसे ही मैंने अर्जुन को प्रेरित किया—‘भाइयों के साथ मिलकर खाओ।’ मुझे असत्य का भय था—मैं असत्य से कैसे मुक्त हो सकता था?” व्यास जी ने उन्हें आश्वस्त किया, “हे पुण्यात्मा, तुम असत्य और सनातन धर्म दोनों से मुक्त रहोगे। अब मैं सब कुछ स्पष्ट करूँगा, हे पांचाल, ध्यान से सुनो।” व्यास जी ने आगे कहा, “जैसा यह धर्म स्थापित है, वैसा ही सनातन है, और जैसा कुन्तीपुत्र ने कहा, वही धर्म है—इसमें कोई संदेह नहीं। फिर उन्होंने राजा द्रुपद का हाथ पकड़कर महल में प्रवेश किया। पांडव, कुन्ती और धृष्टद्युम्न भी वहाँ पहुँचे और प्रतीक्षा करने लगे। व्यास जी ने उस महान आत्मा राजा को बताया कि एक पत्नी के अनेक पतियों के लिए धर्म की स्थापना कैसे हुई थी।” फिर उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में, एक राजकन्या ने कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं से पाँच पतियों का वर प्राप्त किया था। व्यास जी ने राजा को सांत्वना दी, “हे राजन, तुम्हारी चिंता व्यर्थ है कि मेरी पुत्री के पाँच पति होंगे; क्योंकि उसी समय उसकी माता ने वर माँगा था कि मेरी पुत्री के पाँच पति हों। याज और उपयाज नामक धर्मनिष्ठ ऋषियों ने उनकी तपस्या से यह सुनिश्चित किया कि कृष्णा को पाँच पति मिलें—इससे तुम्हारा वंश सुखी होगा।” फिर व्यास जी ने आगे कहा, “इस संसार में तुमसे श्रेष्ठ कोई नहीं है, तुम्हारे शत्रु भी तुम्हें जीत नहीं सकते। अब और भी सुनो कि कैसे यह कन्या पाँच पतियों की पत्नी बनी। पूर्वजन्म में यह कन्या नलायनी थी, जिसने अपने वृद्ध, कुष्ठरोगी पति मुद्गल्य की सेवा की थी। वह पति अत्यंत दुर्बल, चिड़चिड़े, ईर्ष्यालु, शीघ्र क्रोधित, दुर्गंधयुक्त, झुर्रियों और सफेद बालों वाला था। वह वृद्ध, कुरूप, सड़े हुए नाखून और त्वचा वाला था, और यह सती स्त्री उसकी सेवा करती थी, उसके जूठे भोजन को ग्रहण करती थी, और उस महान ऋषि की सेवा में रत रहती थी।” इस प्रकार व्यास जी ने सबको धर्म का गूढ़ रहस्य समझाया और राजा द्रुपद व अन्य सभी के मन में जो संदेह था, उसे शांत किया।