महोदधिरिवाहं स प्रपंचो वीचिसऽन्निभः। इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः
मैं महा-सागर के समान हूँ, यह संसार लहर की तरह है; जिसे यह ज्ञान है, उसके लिए न तो त्याग है, न ग्रहण—केवल लय है।
अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद् विश्वकल्पना। इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः
मैं शुक्ति के समान हूँ, जगत की कल्पना चाँदी के जैसी है; जिसे यह ज्ञान है, उसके लिए न तो त्याग है, न ग्रहण—केवल लय है।
अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि। इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः
मैं सब प्राणियों में हूँ या सब प्राणी मुझमें हैं—इस प्रकार का ज्ञान रखने वाले के लिए न तो त्याग है, न ग्रहण और न ही लय।
जनक उवाच॥ मय्यनंतमहांभोधौ विश्वपोत इतस्ततः। भ्रमति स्वांतवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता
जनक बोले—मेरे इस अनंत महासागर रूपी स्वरूप में, संसार की नाव अपने ही मन के झोंके से इधर-उधर डोलती रहती है; मुझे इससे कोई असहिष्णुता नहीं है।
मय्यनंतमहांभोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः। उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः
मेरे इस अनंत महासागर रूपी स्वरूप में, संसार की लहर अपने स्वभाव से उठती और गिरती है; वह उठे या डूबे, मुझे न कोई लाभ है न हानि।
मय्यनंतमहांभोधौ विश्वं नाम विकल्पना। अतिशांतो निराकार एतदेवाहमास्थितः
मेरे इस अनंत महासागर रूपी स्वरूप में, संसार केवल एक कल्पना है; मैं पूर्ण शांत, निराकार उसी में स्थित हूँ।
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरंजने। इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्तितः
आत्मा न तो भावों में है, न भाव उस अनंत निर्मल में हैं; इसी कारण मैं आसक्तिहीन, निराश, शांत उसी में स्थित हूँ।
अहो चिन्मात्रमेवाहं इन्द्रजालोपमं जगत्। इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना
अहो! मैं केवल शुद्ध चैतन्य हूँ; यह संसार तो जादू के खेल जैसा है। फिर मेरे लिए कहाँ, किस तरह कोई त्याग या ग्रहण की कल्पना हो सकती है?
अष्टावक्र उवाच॥ तदा बन्धो यदा चित्तं किन्चिद् वांछति शोचति। किंचिन् मुंचति गृण्हाति किंचिद् दृष्यति कुप्यति
अष्टावक्र बोले—जब मन कुछ चाहता है, दुखी होता है, कुछ छोड़ता है, कुछ पकड़ता है, भेद देखता है या क्रोधित होता है—यही बंधन है।
तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वांछति न शोचति। न मुंचति न गृण्हाति न हृष्यति न कुप्यति
मुक्ति तब है जब मन न तो कुछ चाहता है, न दुखी होता है, न छोड़ता है, न पकड़ता है, न हर्षित होता है, न क्रोधित।
तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं काश्वपि दृष्टिषु। तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु
जब मन किसी भी दृष्टि में आसक्त होता है, वही बंधन है; जब मन सब दृष्टियों में आसक्तिहीन रहता है, वही मुक्ति है।
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा। मत्वेति हेलया किंचिन्मा गृहाण विमुंच मा
जब 'मैं' नहीं रहता, वही मुक्ति है; जब 'मैं' रहता है, वही बंधन है। यह जानकर, कुछ भी न पकड़ो, न छोड़ो—even लापरवाही से भी नहीं।
अष्टावक्र उवाच॥ कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा। एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती
अष्टावक्र बोले—कर्म और अकर्म के द्वंद्व कब शांत होते हैं और किसके लिए? यह जानकर, यहाँ वैराग्य से रहो, त्याग में लगे रहो, और किसी व्रत से बंधे न रहो।
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्। जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमः गताः
किसी विरले धन्य पुरुष के लिए, केवल संसार की चेष्टाएँ देखकर ही, जीवन की इच्छा, भूख, जिज्ञासा और सब अशांति मिट जाती है।
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितं। असरं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति
यह सब अस्थिर है, तीन प्रकार के दुखों से भरा है, सारहीन, निंदनीय और त्याज्य है—यह निश्चित कर लेने पर मन शांत हो जाता है।
कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणां। तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात्
कौन सा समय, कौन सी अवस्था या कौन सा अवसर है जहाँ मनुष्यों के लिए द्वंद्व नहीं हैं? उन्हें अनदेखा कर, जैसा उचित हो वैसा आचरण कर, सिद्धि प्राप्त होती है।
ना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा। दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः
ऋषियों, साधुओं या योगियों के मत से नहीं—यह देखकर, जो वैराग्य को प्राप्त हो जाता है, कौन ऐसा है जो शांत न हो जाए?
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः। निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः
चैतन्य का सच्चा ज्ञान पा लेने पर कौन गुरु नहीं हो जाता? वैराग्य और समता के उपाय से ही कोई संसार से पार ले जाता है।
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान् यथार्थतः। तत्क्षणाद् बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि
तू तत्वों के विकारों को केवल तत्व ही समझ, जैसी उनकी सच्चाई है; उसी क्षण बंधन से मुक्त होकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाएगा।
वासना एव संसार इति सर्वा विमुंच ताः। तत्त्यागो वासनात्यागात्स्थितिरद्य यथा तथा
वासना ही संसार है—इसलिए सब वासनाएँ छोड़ दे। वासनाओं का त्याग कर, आज ही जैसे भी हो, अपने स्वरूप में स्थित हो जा।
अष्टावक्र उवाच॥ विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलं। धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रादरं कुरु
अष्टावक्र बोले — काम, जो शत्रु है, और धन, जिसमें दुःख ही दुःख भरा है, इन दोनों को छोड़ दो। इनसे जो धर्म भी उत्पन्न होता है, उस पर भी हर जगह आसक्ति मत रखो।
स्वप्नेन्द्रजालवत् पश्य दिनानि त्रीणि पंच वा। मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसंपदः
तीन या पाँच दिन के जीवन को स्वप्न या माया की तरह देखो — मित्र, खेत, धन, घर, पत्नी, संतान और सारी संपत्ति भी वैसी ही है।
यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै। प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव
जहाँ-जहाँ इच्छा है, वहीं संसार है — यह जान लो। पक्की वैराग्यता को अपनाकर, इच्छा से मुक्त होकर सुखी बनो।
तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते। भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः
बंधन केवल इच्छा से ही होता है; उसकी समाप्ति को ही मुक्ति कहते हैं। केवल संसार से अनासक्त रहकर बार-बार संतोष मिलता है।
त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा। अविद्यापि न किंचित्सा का बुभुत्सा तथापि ते
तुम अकेले ही चेतन और शुद्ध हो; यह संसार जड़ और असत्य है। अज्ञान भी वास्तव में कुछ नहीं है, फिर भी तुम्हें यह जिज्ञासा क्यों है?
राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च। संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि
राज्य, पुत्र, पत्नी, शरीर और सुख — इन सबको लेकर जितनी भी आसक्ति रही हो, हर जन्म में ये सब खो ही गए।
अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा। एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून् मनः
धन, कामना और अच्छे कर्म — इन सबका अब क्या करना? इन संसार के रेगिस्तान में मन को कभी भी विश्राम नहीं मिला।
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा। दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्
कितने जन्मों से शरीर, मन और वाणी से दुःख और परिश्रम देने वाले कर्म किए हैं? अब आज ही वह सब छोड़ दो।
अष्टावक्र उवाच॥ भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी। निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति
अष्टावक्र बोले — उत्पत्ति, अनुत्पत्ति और परिवर्तन — ये सब स्वाभाविक हैं, ऐसा जानकर जो स्वयं अपरिवर्तित और दुःख से रहित है, वह सहज ही शांति को पा लेता है।
ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी। अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते
ईश्वर ही सबका रचयिता है, और यहाँ दूसरा कोई नहीं — ऐसा जानकर, जिसकी सारी आशाएँ भीतर ही गल गई हैं, वह शांत रहता है और कहीं भी आसक्त नहीं होता।