भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, “हे पार्थ! जो लोग अपने शरीर के पंचतत्त्वों को कष्ट देते हैं और साथ ही उस परमात्मा को भी, जो शरीर में निवास करता है, उन्हें तुम असुर-संस्कार वाला जानो। अब भोजन, यज्ञ, तप और दान—इन सबका भी तीन प्रकार का भेद है, जिसे सुनो। भोजन हर किसी को प्रिय होता है, पर वह भी तीन प्रकार का है। सात्त्विक लोग उस भोजन को प्रिय मानते हैं, जो आयु, पवित्रता, बल, स्वास्थ्य, सुख और संतोष को बढ़ाता है—जो स्वादिष्ट, स्निग्ध, स्थिर और हृदय को प्रिय होता है। राजसिक लोगों को तीखा, खट्टा, नमकीन, बहुत गरम, तीव्र, शुष्क और जलन पैदा करने वाला भोजन अच्छा लगता है, परंतु वह पीड़ा, शोक और रोग को जन्म देता है। तमसिक लोगों को बासी, बेस्वाद, सड़ा-गला, जूठा और अशुद्ध भोजन प्रिय होता है। यज्ञ भी तीन प्रकार के होते हैं। जो शास्त्रानुसार, फल की इच्छा के बिना, केवल ‘कर्म है, करना चाहिए’ के भाव से किया जाए, वह सात्त्विक यज्ञ है। जो यज्ञ फल की कामना से या दिखावे के लिए किया जाता है, वह राजसिक है। जो यज्ञ शास्त्र के विपरीत, बिना मंत्र, बिना श्रद्धा, बिना भोजन-वितरण के किया जाए, वह तमसिक है। तप भी तीन प्रकार का है—शारीरिक, वाणी का और मन का। देवताओं, द्विजों, गुरुजनों और ज्ञानीजनों की पूजा, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—ये शारीरिक तप हैं। वाणी का तप है—ऐसी वाणी बोलना, जिससे किसी को क्लेश न हो, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो, और वेदों का नियमित अध्ययन। मन का तप है—मन की शांति, कोमलता, मौन, आत्मसंयम और स्वभाव की पवित्रता। ये तीनों तप जब श्रद्धा से, फल की इच्छा छोड़े बिना किए जाएं, तो वे सात्त्विक हैं। यदि आदर, मान या दिखावे के लिए या कपट से किए जाएं, तो वे राजसिक और अस्थिर हैं। यदि अज्ञानवश, अपने या दूसरों को कष्ट पहुँचाने के लिए किए जाएं, तो वे तमसिक हैं। दान भी तीन प्रकार का है। जो दान उचित स्थान, उचित समय और योग्य व्यक्ति को, बिना किसी प्रत्युपकार की आशा के, केवल ‘दान देना चाहिए’ इस भाव से दिया जाए, वह सात्त्विक है। जो दान प्रत्युपकार की इच्छा से या अनिच्छा से दिया जाए, वह राजसिक है। जो दान अनुचित स्थान, अनुचित समय या अयोग्य व्यक्ति को, अपमान या अवमानना के साथ दिया जाए, वह तमसिक है। भगवान आगे कहते हैं, ‘ॐ तत् सत्’—यह ब्रह्म का त्रिविध नाम है, जिससे ब्राह्मण, वेद और यज्ञ आदि प्राचीन काल में स्थापित हुए। इसलिए वेदज्ञ लोग यज्ञ, दान और तप प्रारंभ करते समय ‘ॐ’ उच्चारण करते हैं। ‘तत्’ शब्द बोलकर वे लोग, जो मोक्ष की इच्छा रखते हैं, बिना फल की इच्छा के यज्ञ, तप और दान करते हैं। ‘सत्’ का अर्थ है—सत्य, शुभता और श्रेष्ठता; उत्तम कर्मों के लिए भी ‘सत्’ शब्द का प्रयोग होता है। यज्ञ, तप, दान में दृढ़ता भी ‘सत्’ है। परंतु जो भी यज्ञ, दान या तप श्रद्धा के बिना किया जाए, वह ‘असत्’ है—न यहाँ फल देता है, न परलोक में। अब अर्जुन प्रश्न करता है, “हे हृषीकेश! मैं संन्यास और त्याग का यथार्थ भेद जानना चाहता हूँ।” श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं, “ज्ञानीजन कामना से किए जाने वाले कर्म का त्याग ही संन्यास कहते हैं, और सारे कर्मों के फलों के परित्याग को विद्वान त्याग कहते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि कर्म ही दोष है, इसलिए त्याग देना चाहिए, जबकि अन्य कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप—इनका त्याग नहीं करना चाहिए। अब मैं तुम्हें त्याग का अंतिम निर्णय सुनाता हूँ। त्याग भी तीन प्रकार का है। यज्ञ, दान और तप—इनका कभी त्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये महान पुरुषों को भी शुद्ध करने वाले हैं। परंतु इन्हें भी आसक्ति और फल की इच्छा छोड़कर करना चाहिए—यही मेरा श्रेष्ठ मत है। जो नियत कर्म का त्याग मोहवश करता है, वह तमसिक त्याग है। जो कर्म केवल कष्ट के डर से या शरीर की पीड़ा के भय से छोड़ दिया जाए, वह राजसिक त्याग है—ऐसे त्याग से त्याग का फल नहीं मिलता। किन्तु जो नियत कर्म केवल ‘करना चाहिए’ इस भाव से, आसक्ति और फल की इच्छा छोड़कर किया जाए, वह सात्त्विक त्याग है। शुद्धचित्त, बुद्धिमान और संदेह रहित व्यक्ति न तो अशुभ कर्म से घृणा करता है, न शुभ कर्म में आसक्त होता है—ऐसा त्यागी सात्त्विक है। शरीरधारी के लिए सम्पूर्ण कर्मों का पूरी तरह त्याग संभव नहीं, पर जो व्यक्ति कर्म के फलों का त्याग करता है, वही सच्चा त्यागी है। जो त्याग नहीं करते, उन्हें तीन प्रकार के फल—प्रिय, अप्रिय और मिश्रित—मिलते हैं, परन्तु त्यागियों को कभी नहीं। अब हे महाबाहो! ज्ञान के शास्त्र में जो पाँच कारण बताए गए हैं, उनसे प्रत्येक कर्म की सिद्धि होती है—(1) शरीर, जो कर्म का आधार है; (2) कर्ता; (3) भिन्न-भिन्न इंद्रियां; (4) विभिन्न प्रकार की चेष्टाएं; और (5) परमात्मा, जो पाँचवाँ कारण है। जो भी कर्म मन, वाणी या शरीर से किया जाता है—चाहे वह धर्मयुक्त हो या अधर्मयुक्त—इन पाँच कारणों से ही होता है। जो व्यक्ति अल्पबुद्धि के कारण केवल आत्मा को ही कर्ता मानता है, वह भ्रमित है और सत्य को नहीं देखता। जो व्यक्ति अहंकार से रहित है, जिसकी बुद्धि निर्मल है—वह यदि इन सबको भी मार डाले, तो न मारता है, न बंधता है।” इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यज्ञ, भोजन, तप, दान, त्याग और संन्यास के गूढ़ रहस्य विस्तार से समझाए, जिससे अर्जुन का संशय दूर हो सके और वह धर्ममार्ग पर अडिग रह सके।